#PehlaPeriod : 'बैग से स्कर्ट छिपाते-छिपाते घर पहुंची'

पहली बार पीरियड होना किसी बुरे सपने की तरह था

#PehlaPeriod सिरीज़ की चौथी कड़ी में श्वेता, भावना, मीना और पायल अपने अनुभव बता रही हैं.

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श्वेता मिश्रा

मैं पांचवीं क्लास में थी जब मुझे पहली बार पार पीरियड्स हुए. यह किसी बुरे सपने की तरह था. मुझे ख़ून से बहुत डर लगता है. जहां तक मुझे याद है उस दिन मैंने काले रंग की जींस पहनी थी. अचानक मेरे पेट में बहुत तेज दर्द होने लगा. मैं वॉशरूम में गई तो समझ नहीं आया कि हो क्या रहा है.

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मुझे इस बारे में कुछ पता नहीं था. डर के मारे उस दिन मैं वही जींस पहने रही. अगली सुबह जब पापा और भाई बाहर चले गए तब मैंने हिम्मत जुटाकर मम्मी को बताया. मम्मी ने बहुत ही सामान्य तरीके से रिऐक्ट किया और कहा कि जब भी ऐसा हो मैं नैपकिन का इस्तेमाल करूं. उस दिन मैं दर्द और तेज ब्लीडिंग की वजह से स्कूल नहीं जा पाई.

मेरा भाई मुझे यह कहकर चिढ़ा रहा था कि मैं स्कूल न जाने के लिए बहाने बना रही हूं. मेरी मम्मी ने से डांटकर चुप कराया और पापा को आयुर्वेदिक दवाएं लेने भेजा. हालांकि सब ठीकठाक था लेकिन काफ़ी समय तक हमने इस बारे में खुलकर बात नहीं की. मम्मी मेरे लिए पैड खरीदकर लाती थीं.

शुक्र है कि मेरी मम्मी काफी कूल थीं लेकिन मेरी बुआ मुझे पूजा घर में जाने से रोकती थीं. लेकिन मैं उनकी बात नहीं सुनती थी और पूजा घर में चली जाती थी.

भावना चंद

जब मुझे पहली बार पीरियड्स हुए थे तो मैं पेट और कमर दर्द से तड़प रही थी. मां मुझे संभालने की पूरी कोशिश कर रही थीं. पापा, जो शायद समझ रहे थे कि मैं किस दर्द से गुज़र रही हू, माँ को बार-बार कह रहे थे कि चलो हॉस्पिटल ले चलते हैं. माँ कहतीं हॉस्पिटल जाकर कुछ नही होगा।

वहीं दूसरी तरफ मैं समझ ही नहीं पा रही थी कि आखिर मुझे हो क्या गया है. मेरी योनि से इतना खून क्यों बह रहा है? मुझे चोट कब लगी और जब लगी तब खून क्यों नहीं बहा, अब क्यों बह रहा है?

ब्लीडिंग इतनी थी कि हर दो-तीन घंटे में पैड बदलना करना पड़ रहा था. बहुत घबरा गई थी. ऐसा लग रहा था कि कोई मेरा बहता ख़ून देख न ले, ख़ुद से एक अजीब सी घिन आ रही थी. फिर माँ ने समझाया कि अब तुम बड़ी हो गई हो. इसके लिए तैयार हो जाओ यह तुम्हारे जीवन का हिस्सा हो गया है, इसे पीरियड्स कहते हैं.

मां ने बताया कि यह तुम्हें हर महीने होगा और हर महीने होना भी चाहिए. अगर न हो तो मुझे बताना, हम डॉक्टर के पास जाएंगे. मैं यह सुनकर भौंचक्की रह गई कि ये कौन सा दर्द है जो बिना बुलाए मेरी ज़िंदगी पर कब्ज़ा करके बैठ गया.

पीरियड्स की शुरुआत के पांच दिन सबसे ज्यादा दर्द देने वाले थे. आज उस दर्द की आदी हो गई हूं और हां, अब शर्म नही आती खुलकर बात करती हूं. पापा से भी कोई पर्दा नहीं है.

मीना कोतवाल

मैं दसवीं क्लास में थी जब क्लास में अचानक ब्लीडिंग होने लगी. मैं खड़े होकर कुछ पढ़ रही थी और स्कर्ट पर दाग लग चुका था, जिससे मैं अंजान थी. लेकिन पूरी क्लास को पता चल चुका था और सब खुसर-फुसर कर रहे थे.

छुट्टी की घंटी बजी, सब चले गये और मैं इस बात से बेख़बर बाहर निकलने लगी तो दो लड़कियों ने मुझे रोका और स्कर्ट ख़राब होने के बारे में बताया. वे ही स्टाफ़ रूम से कॉटन लेकर आईं और मेरी स्कर्ट साफ़ कराई.

मुझे याद है मेरी स्कर्ट पूरी ख़राब हो गई थी इसलिए वो अच्छे से साफ़ नहीं हो पायी थी. लड़कों की शिफ्ट शुरू होनी थी, तो वो भी स्कूल में आने लगे थे. मैं डर के मारे रोने लगी थी और अपने स्कूल बैग से अपनी स्कर्ट को छिपते-छिपाते घर पहुंची. मन में बस एक दुआ थी की भगवान आज सही से घर पहुंचा दे फिर कभी कुछ नहीं मांगूंगी.

उस वक्त मैं कपड़ा ही इस्तेमाल करती थी. बहनों ने बताया था कि कपड़ा इस्तेमाल करना चाहिये और उसे धोकर अगली बार के लिए रख देना चाहिए. नैपकिन ख़रीदने के पैसे भी नहीं होते थे और घर और दुकान से मांगने में भी शर्म आती थी.

पायल चौधरी

मुझे पहली बार पीरियड्स तब आए जब मैं नौवीं क्लास में थी. मेरी एक बड़ी बहन ने एक बार बताया था कि जब भी मेरे जननांगों से खून आए तो मैं उसे बता दूं. जब ये हुआ तब मैं उस समय वाशरूम में थी और ख़ून देखकर जोर-जोर से रोने लगी थी.

मुझे लगा कि मैंने कुछ किया है जिसकी वजह से मुझे चोट लगी है. दीदी ने मेरा रोना सुना और वाशरूम में आई. उसने मुझे सैनिटरी नैपकिन दिया और पीरियड्स के बारे में बताया. हालांकि मुझे उस समय तो दर्द नहीं हुआ लेकिन अब कभी-कभी बहुत तेज़ दर्द होता है.

मुझे लगता है कि इनके दाम कम होने चाहिए. अभी तो छह नैपकिन का पैकेट महंगा बैठता है.

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