आखिर क्यों व्हाट्सएप ने कहा कि यह भारत में खत्म हो सकता है, जानिए पूरा मामला

दिल्ली हाई कोर्ट में जिस तरह से व्हाट्सएप की ओर से बयान दिया गया है कि इन्क्रिप्शन को ब्रेक करने से भारत में व्हाट्सएप का अंत हो सकता है। व्हाट्सएप की ओर से कोर्ट में इस बयान के बाद इसपर बहस तेज हो गई है।

एक पक्ष जहां लोगों के निजता के अधिकार तो दूसरा पक्ष राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर सरकार की जरूरत पर बहस कर रहा है। दोनों के बीच किस तरह से बैलेंस बनाया जाए, इसको लेकर चर्चा तेज हो गई है।

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बता दें कि व्हाट्सएप की ओर से यह बयान व्हाट्सएप और मेटा की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया गया है जिसमे आईटी एक्ट 2021 को चुनौती दी गई है। आईटी एक्ट के रूल नंबर 4(2) को लेकर सवाल किए जा रहे हैं।

इसके तहत सोशल मीडिया कंपनियां जो मैसेजिंग सर्विस दे रही हैं उन्हें यह बताना होगा कि किसने मैसेज भेजा है, अगर कोर्ट की ओर से ऐसा करने का आदेश दिया जाता है।

हालांकि ऐसा सिर्फ उसी शर्त पर किया जा सकता है अगर यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा हो, पब्लिक ऑर्डर, रेप, यौन शोषण, बाल यौन शोषण से जुड़ा मामला हो और जिसमे कम से कम 5 साल की सजा का प्रावधान हो

वहीं इस पूरे मामले पर व्हाट्सएप का कहना है कि इस नियम को असंवैधानिक करार दिया जाना चाहिए और कंपनी द्वारा जानकारी नहीं दिए जाने पर किसी भी तरह का आपराधिक सजा का प्रावधान नहीं होना चाहिए।

लाखों यूजर्स की गोपनीयता और अभिव्यक्ति की आजादी के मौलिक अधिकार की रक्षा के लिए इस प्रावधान को असंवैधानिक करार दिया जाना चाहिए। व्हाट्सएप की ओर से कोर्ट में पेश हुए एडवोकेट तेजस कारिया ने कहा कि लोग इस ऐप का इस्तेमाल इसीलिए करते हैं क्योंकि यह निजता की गारंटी देता है और एंड टू एंड इन्क्रिप्शन का आश्वासन देता है। अगर इस नियम को तोड़ने के लिए कहा जाता है तो व्हाट्सएप खत्म हो जाएगा।

वहीं कोर्ट ने पूछा कि क्या यह नियम दुनिया के किसी और देश में लागू है। क्या इस तरह के मामलों को किसी और देश में उठाया गया। क्या दुनिया में किसी देश में आपसे जानकारी साझा करने के लिए नहीं कहा गया। दक्षिण अमेरिका में भी आपसे इसकी जानकारी कभी नहीं मांगी गई। जिसपर वकील ने कहा कि ब्राजील तक में भी कभी जानकारी नहीं मांगी गई।

इस मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस मनमोहन और जस्टिस मनमीत प्रीतम सिंह की बेंच ने कहा कि निजता का अधिकार संपूर्ण अधिकार नहीं है, कहीं ना कहीं इसे बैलेंस करने की जरूरत है। दरअसल केंद्र सरकार की ओर से कहा गया है कि इस नियम की इसलिए जरूरत है क्योंकि सांप्रदायिक हिंसा भड़कने के मामले में मैसेज किसने पहले भेजा इसका पता होना जरूरी है।

केंद्र की ओर से कहा गया कि व्हाट्सएप और फेसबुक यूजर्स की जानकारी को मॉनेटाइज करती हैं लिहाजा वो कानूनी तौर पर निजता की गारंटी नहीं दे सकती हैं और ना ही यह दावा कर सकते हैं कि वो निजता की रक्षा करते हैं। अलग-अलग देशों में फेसबुक को जवाबदेह बनाने की कोशिश की जा रही है।

सरकार की ओर से इससे पहले कहा गया था कि अगर मैसेज भेजने वाले की जानकारी इन्क्रिप्शन को ब्रेक किए बगैर अगर किसी भी तरह से हासिल नहीं की जा सकती है तो व्हाट्सएप को किसी दूसरे विकल्प के साथ सामने आना चाहिए। इस मामले की अगली सुनवाई 14 अगस्त को होगी।

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