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ऊंचाई वाली हवाओं के उत्तर में शिफ्ट होने से उत्तर-मध्य भारत में बढ़ी हीटवेव, IIT बॉम्बे के अध्ययन में हुआ खुलास

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान बॉम्बे के एक अध्ययन में खुलासा हुआ है कि पिछले कुछ दशकों में गर्मियों के दौरान उच्च ऊंचाई वाली हवाओं का रुख उत्तर की ओर शिफ्ट हुआ है। इससे उत्तर-मध्य भारत में हीटवेव की घटनाएं और तीव्र हो गई हैं। यह परिवर्तन जो 10-20 किलोमीटर की ऊंचाई पर देखा गया है। 1998 के बाद से तापमान में वृद्धि के साथ जुड़ा हुआ है। जिसके परिणामस्वरूप क्षेत्र में हीटवेव की आवृत्ति और तीव्रता में 25 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है।

अध्ययन में यह भी पाया गया कि 1998 के आसपास प्रशांत महासागर के तापमान में वृद्धि ने इन हवा के पैटर्न में इस बदलाव को ट्रिगर किया। जिसे ग्लोबल वार्मिंग से बढ़ावा मिला। परिणामस्वरूप अब हीटवेव की घटनाएं 1998 से पहले की तुलना में दोगुनी हो गई हैं और इन घटनाओं के दौरान संचयी गर्मी भी दोगुने से अधिक हो गई है। IIT बॉम्बे की एसोसिएट प्रोफेसर अर्पिता मोंडल के अनुसार यह स्थिति उत्तर-मध्य भारत में रहने वाली बड़ी आबादी के लिए चिंता का विषय है। जो लगातार बढ़ती गर्मी के प्रभावों का सामना कर रही है।

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गर्मी की भविष्यवाणियों में हो सकता है सुधार

अध्ययन के अनुसार जलवायु मॉडल में इन ऊंचाई वाली हवा के पैटर्न को शामिल करने से हीटवेव की भविष्यवाणियों में सुधार किया जा सकता है। जो न केवल अल्पकालिक पूर्वानुमान बल्कि दीर्घकालिक अनुमानों में भी सहायक होगा। इससे प्रभावी हीट एक्शन योजना विकसित करने में मदद मिलेगी। जो गर्मी से प्रभावित क्षेत्रों में आपदाओं की रोकथाम और नुकसान को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। ये निष्कर्ष प्रतिष्ठित जर्नल जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स में प्रकाशित हुए हैं। जो ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते प्रभाव और उच्च ऊंचाई वाली हवा के पैटर्न में बदलाव पर रोशनी डालते हैं।

उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी जेट का प्रभाव

IIT बॉम्बे के प्रमुख लेखक रोशन झा ने बताया कि 1998 के बाद से उत्तर-मध्य भारत के ऊपर प्री-मानसून गर्मी के मौसम के दौरान तापमान लगभग 0.7 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है। यह वृद्धि उपोष्णकटिबंधीय पश्चिमी जेट जो कि ऊपरी क्षोभमंडल की मजबूत हवाओं की एक पट्टी है। जिससे उत्तरीय आंदोलन से जुड़ी हुई प्रतीत होती है।

अध्ययन से पता चला कि जेट स्ट्रीम की इस उत्तर की ओर शिफ्ट ने उत्तर-मध्य भारत में हीटवेव की विशेषताओं में 25 प्रतिशत से अधिक परिवर्तन का कारण बना है। 1998 के बाद की अवधि में हीटवेव की बढ़ती घटनाओं और उनकी तीव्रता को इस हवा के पैटर्न में बदलाव से जोड़ा जा सकता है। जिससे इस क्षेत्र में तापमान में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई है।

क्षेत्रीय निहितार्थ और पड़ोसी देशों पर प्रभाव

हवा के इस पैटर्न में बदलाव का प्रभाव न केवल भारत तक सीमित है। बल्कि इसके पड़ोसी देशों जैसे पाकिस्तान और मध्य पूर्व में भी महसूस किया जा रहा है। इन परिवर्तनों को समझना इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है। क्योंकि यह न केवल प्राकृतिक कारकों से प्रेरित है। बल्कि जलवायु परिवर्तन से भी जुड़ा है। जो इन क्षेत्रों में हीटवेव को और अधिक तीव्र कर रहा है।

IMD की परिभाषा और डेटा विश्लेषण

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार मैदानों में हीटवेव तब होती है। जब तापमान 45 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक हो जाता है। जबकि अन्य क्षेत्रों में इस सीमा को थोड़ा कम रखा जाता है। अपने अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने IMD से तापमान का डेटा और यूरोपीय सेंटर फॉर मीडियम-रेंज वेदर फोरकास्ट रीएनालिसिस से मौसम का डेटा लिया। जो 1973 से 2022 तक फैला हुआ है।

यह अध्ययन न केवल भारत में बल्कि वैश्विक स्तर पर बढ़ती गर्मी और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है। इससे हीटवेव से संबंधित आपदाओं की बेहतर तैयारी और जनसंख्या की सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद मिल सकती है।

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