हाथरस की घटना के बाद पीड़िता का परिवार बोला, हम दलित और यही हमारा गुनाह है
लखनऊ। उत्तर प्रदेश के हाथरस में युवती के साथ गैंगरेप की घटना ने हर किसी हिलाकर रख दिया। जिस तरह से आनन-फानन में युवती की मौत के बाद उसका पुलिस ने अंतिम संस्कार किया, उसने पुलिस की मंशा पर सवाल खड़ा कर दिया है। हाथरस में जिस युवती के साथ यह घटना हुई, वह दलित परिवार से आती थी। लड़की के पिता ने दलित होने की वजह से उन्हें समाज में किस तरह के तिरस्कार का सामना करना पड़ता है, इसका दर्द बयां किया है। लड़की के पिता कहते हैं जब भी मैं दुकानदार के पास जाता हूं वह कहता है थोड़ी दूर खड़े रहो। यही नहीं बुजुर्ग बताते हैं कि ऊंची जाति वाले हमे गाली देते हैं और यह अब उनके लिए सामान्य सी बात हो गई है, अब उन्हें इसमे कुछ खराब भी नहीं लगता है। मृतक पीड़िता की भाभी कहती हैं कि हम दलित हैं और यही हमारा गुनाह है।

सवर्ण बाहुल्य क्षेत्र
हाथरस में दलित युवती के साथ गैंगरेप की घटना इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि चार सवर्ण जाति के लोगों ने युवती के साथ कथित तौर पर गैंगरेप किया है। पीड़ित युवती वाल्मीकि समाज से आती है। जिस इलाके में यह घटना हुई है, वहां वाल्मीकि समाज के सिर्फ 15 परिवार ही रहते हैं। यहां तकरीबन 600 परिवार हैं, जिसमे तकरीबन आधे परिवार ठाकुरों के हैं, जबकि तकरीबन 100 परिवार ब्राम्हणों के हैं। अंतिम संस्कार के लिए भी सवर्ण जाति के लोगों के लिए विशेष स्थान है। दलितों को स्थानीय मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं है।
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पड़ोसियों ने हाल तक नहीं लिया
इस घटना के बाद पूरे देश में गुस्सा में लोगों के भीतर गुस्सा है। लेकिन बावजूद इसके पीड़ित परिवार को नहीं लगता है कि उनके जीवन में कुछ बदलने वाला है। पीड़िता की मां ने कहा कि उनका कोई भी पड़ोसी ने उन्हें सांत्वना देने नहीं आया, ये लोग ठाकुर-ब्राम्हण हैं। हमे उनके खेत से अनाज मिलता है, हमे लगा था कि वह एक बार जरूर आएंगे। पीड़िता की चाची ने बताया कि जिस तरह से हमारी बेटी का अंतिम संस्कार किया गया, हम उससे चकित हैं, मेरे भी बेटियां हैं, पुलिस ने ऐसा कतई नहीं किया होता, अगर वो ठाकुरों की बेटियां होती।

करना पड़ता है भेदभाव का सामना
परिवार की एक महिला ने बताया कि उसकी शादी के दौरान उसकी पालकी को मुख्य सड़क से नहीं जाने दिया गया था। मेरे परिवार को दूसरा लंबा रास्ता लेना पड़ा था। मैं रोना चाहती थी, लेकिन मेरे परिवार ने बताया कि यह सामान्य बात है, हमे समझौता करना सीखना होगा। मौत के दौरान भी दलितों को इस भेदभाव का सामना करना पड़ता है। हमारा घर काफी छोटा है, हम शव को को कुछ देर के लिए घर के बाहर रखन चाहते थे, लेकिन उन्होंने हमे ऐसा नहीं करने दिया। मेरी बहन ने मुझे शांत कराया। ये लोग हमारी ओर देखते तक नहीं हैं, उन्हें इससे फर्क नहीं पड़ता कि हमारे साथ रेप होता है या हमे मार दिया जाता है।

हम बच्चों को गांव से बाहर भेजेंगे
गांव के ही एक दलित किसान ने बताया कि मेरे दो बेटे हैं, जिनकी उम्र 10-5 वर्ष है। वो हाथरस में सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं। वो अक्सर हमसे कहते हैं कि उनके साथ पढ़ने वाले बच्चे उनसे बात नहीं करते हैं क्योंकि वो दलित हैं। मैं चाहता हूं कि मेरे बच्चे पढ़ें, ये गांव छोड़ दें। हम नहीं चाहते हैं कि उन्हें भी वो काम करने के लिए मजबूर होना पड़े जो हमे करना पड़ा, उन्हें बेहतर जीवन का अधिकार है। लेकिन हम क्या कर सकते हैं। शिक्षक, पुलिस, प्रशासन, हर कोई या तो ठाकुर है या ब्राम्हण।












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