बच्चा पार्टी कही जाने वाली JJP के दुष्यंत चौटाला ने कैसे संभाल ली परदादा देवीलाल की विरासत

नई दिल्ली। विधानसभा चुनाव के नतीजों ने ये तय कर दिया कि देवीलाल की विरासत अब दुष्यंत चौटाला संभालेंगे। देवी लाल के परपोते दुष्यंत चौटाला ने विरासत की जंग में अपने चाचा अभय चौटाला को हरा दिया। दुष्यंत चौटाला की जननायक जनता पार्टी ने 10 सीटें जीतीं तो अभय चौटाला के इंडियन नेशनल लोकदल को केवल एक सीट ही मिल पायी। 31 साल के दुष्यंत चौटाला ने अपनी राजनीति सूझबूझ से सबको प्रभावित किया है। अब जाट राजनीति की कमान अभय चौटाला के हाथों से फिसल कर दुष्यंत चौटाला के हाथों में आ गयी है। दुष्यंत चौटाला ने केवल 11 महीने पहले अपनी पार्टी बनायी और अभय चौटाला को चित्त कर दिया। जिस इनेलो को देवीलाल जैसे दिग्गज ने खड़ा किया था वह बमुश्किल एक सीट जीत पायी। इनेलो के कर्ताधर्ता अभय चौटाला ने ऐलनाबाद सीट से जीत कर किसी तरह अपनी इज्जत बचायी।

दुष्यंत चौटाला ने मारी बाजी

दुष्यंत चौटाला ने मारी बाजी

अगस्त 2018 में जब चौधरी देवीलाल की जयंती मनायी जा रही थी उसी समय चौटाला परिवार का कलह सामने आ गया था। इनेलो में वर्चस्व के लिए ओमप्रकाश चौटाला के पुत्र अजय चौटाला और अभय चौटाला की लड़ाई चरम पर थी। देवीलाल की जयंती पर गोहाना में कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में इनेलो के शीर्ष नेता अभय चौटाला के खिलाफ नारे लगाये गये। उनकी हूटिंग की गयी। इतना ही नहीं युवा कार्यकर्ताओं ने दुष्यंत चौटाला के समर्थन में नारे भी लगाये थे। अभय चौटाला ने इसके लिए अपने बड़े भाई अजय चौटाला के पुत्रों, दुष्यंत औऱ दिग्विजय को जिम्मेदार ठहराया। इसके बाद दुष्यंत और दिग्विजय को इनेलो से निकाल दिया गया। इससे खफा हो कर दुष्यंत चौटाला ने जिंद में एक बड़ी रैली की और जननायक जनता पार्टी के गठन का एलान किया। नयी पार्टी बनाने के एक महीना बाद ही दुष्यंत ने जींद उपचुनाव में अपने छोटे भाई दिग्विजय सिंह को खड़ा कर पहली परीक्षा दी। इस चुनाव में जेजपी के दिग्विजय दूसरे नम्बर रहे थे। तभी ये लग गया था कि दुष्यंत जाट राजनीति के उभरते हुए सितारे हैं। 2019 के विधानसभा चुनाव में 10 सीटें जीत कर उन्होंने सियासी ताकत दिखा दी। दुष्यंत 2014 में केवल 26 साल की उम्र में इनेलो के टिकट पर सांसद चुने गये थे। तभी से उनकी अपने चाचा अभय चौटाला से लड़ाई शुरू हो गयी थी।

दुष्यंत की सूझबूझ

दुष्यंत की सूझबूझ

जब दुष्यंत को इनेलो से निकाला गया तो उन्होंने अभय चौटाला से कानूनी लड़ाई की बजाय खुद की राह बनाने की सोची। नयी पार्टी बनायी और संघर्ष शुरू कर दिया। जींद विधानसभा उपचुनाव में दूसरे नम्बर पर रहे और कांग्रेस के दिग्गज नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला को तीसरे नम्बर पर ढकेल दिया। 2019 के लोकसभा चुनाव में करारी हार हुई लेकिन हिम्मत नहीं हारी। 2019 के विधानसभा चुनाव में दुष्यंत ने काफी समझदारी दिखायी। उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान अपने चाचा अभय चौटाला के खिलाफ कुछ भी नहीं बोला। उन्होंने देवीलाल के किये गये कामों की याद दिला कर वोट मांगा। युवा और जाट समुदाय ने दिल खोल कर उनका समर्थन किया। अदावत के बाद भी अभय चौटाला के खिलाफ नहीं बोलना उनके लिए पोजिटिव रहा। हरियाणा में करीब 30 फीसदी जाट वोटर हैं। दुष्यंत ने अधिकांश स्वजातीय वोटरों को प्रभावित किया। उन्होंने अपनी मां नैना चौटाला के लिए भी जीत की राह बनायी। नैना चौटाला, देवीलाल परिवार की पहली महिला हैं जो राजनीति में आयी हैं। वे 2014 में इनेलो के टिकट पर विधायक चुनी गयीं थीं। लेकिन इस बार वे अपने बेटे की पार्टी से विजयी हुई हैं। जो वोटर पहले इनेलो के साथ अब वे दुष्यंत के साथ हो गये।

बदल रहा जाट समुदाय

बदल रहा जाट समुदाय

दुष्यंत चौटाला, जाट राजनीति के इंटेलेक्चुअल फेस हैं। पहले के जाट नेता उतने पढ़े लिखे नहीं होते थे। समय बदला तो इसका चेहरा भी बदल गया। दुष्यंत नेशनल स्कूल ऑफ लॉ से ग्रेजुएट हैं। उन्होंने अमेरिका के कैलिफोर्निया टूनिवर्सिटी से बिजनेस मैनैजमेंट की डिग्री ली है। अभी 31 साल के हैं। उन्होंने युवा वर्ग में अपनी पैठ बनायी। जाट समुदाय ने भी इस पढ़े लिखे नौजवान पर भरोसा किया। उन्होंने अपने दादा ओमप्रकाश चौटालेा से बगावत कर खुद को एक जुझारू नेता साबित किय़ा। उनके पिता अजय चौटाला भ्रष्टाचार के जुर्म में जेल की सजा काट रहे हैं फिर भी उन्होंने अपनी साख पर आंच नहीं आने दी। कांग्रेस और भाजपा के बागियों ने जेजपी को अपना नया ठिकाना बनाया जिससे दुष्यंत की चुनावी राह आसान हो गयी।

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