गुलशन ईविंगः शिफ़ॉन की साड़ी और उंगलियों में सिगरेट वाली सेलिब्रेटी संपादक

गुलशन ईविंग 92 साल की थीं जब उनकी रिचमंड में एक रेजिडेंशियल केयर में मौत हो गई. उनकी बेटी अंजली ईविंग ने बीबीसी को उनके गुजरने की जानकारी दी.
अंजली ने बताया, 'जब उनकी सांसें थमीं तब मैं उनके पास ही थी.' अपनी उम्र के बावजूद गुलशन को पहले से कोई भी बीमारी नहीं थी.
ईविंग भारत की दो पॉपुलर मैगजीन्स की संपादक रही थीं. वह महिलाओं की पत्रिका ईव्स वीकली और फिल्म मैगजीन स्टार एंड स्टाइल की 1966 से 1989 तक संपादक रहीं. वह एक मशहूर संपादक थीं और खुद भी एक सेलिब्रिटी थीं.
नोबल पुरस्कार प्राप्त लेखक वी एस नायपॉल ने अपनी किताब इंडियाः अ मिलियन म्यूटिनीज़ नाउ में उन्हें भारत की सबसे मशहूर महिला संपादक बताया था.
भारत की पहली और एकमात्र महिला प्रधानमंत्री रहीं इंदिरा गांधी का सबसे लंबा इंटरव्यू करने का रिकॉर्ड भी गुलशन के नाम ही है.

ईव्स वीकली की एडिटर के तौर पर उन्होंने कई युवा महिला पत्रकारों को खड़ा किया. भारत में महिलावादी आंदोलन ने भी 1970 के दशक में शक्ल लेना शुरू किया था और उस वक्त इस आंदोलन को आगे बढ़ाने में उनकी मैगजीन का बड़ा योगदान रहा.
स्टार एंड स्टाइल की संपादक रहते हुए उन्होंने बॉलिवुड और हॉलिवुड के बेहतरीन लोगों को नजदीकी से देखा. उन्होंने इनमें से कईयों के इंटरव्यू किए, उनके बारे में लिखा और उनके साथ पार्टियां भी कीं.
पिछले हफ्ते न्यूज़ वेबसाइट्स में उनके फोटोग्राफ्स छपे जिनमें वह हॉलिवुड के लीजेंड्स ग्रेगरी पेक, कैरी ग्रैंट और रोजर मूर का इंटरव्यू लेती दिख रही थीं. उनका अल्फ्रेड हिचकॉक के साथ डिनर करते, प्रिंस चार्ल्स के साथ बातें करते, ईवा गार्डनर के साथ पोज़ देते हुए और डैनी के को साड़ी पहनना सिखाते हुए के भी फोटो आए.
बॉलिवुड में उनकी दोस्ती और भी गहरी थी. राजेश खन्ना, दिलीप कुमार, शम्मी कपूर, देव आनंद, सुनील दत्त, नरगिस जैसे दिग्गजों के साथ उनके नजदीकी संबंध थे. यहां तक कि उन्होंने राज कपूर के साथ डांस भी किया था.
मुंबई में एक पारसी परिवार में सन 1928 में उनका जन्म हुआ था. ईविंग आज़ाद भारत में उन कुछ महिलाओं में थीं जो पत्रकारिता से जुड़ी हुई थीं.
1990 में वह अपने पति के साथ लंदन शिफ्ट हो गईं. उन्होंने 1955 में एक ब्रिटिश जर्नलिस्ट से शादी की थी. उन दोनों के दो बच्चे थे- बेटी अंजली और बेटा रॉय.

उनकी मौत से ब्रिटेन में केयर होम्स में कोविड-19 के संक्रमण की हैंडलिंग को लेकर सवाल उठ रहे हैं. यह वायरस हजारों उम्रदराज़ और जोखिम में मौजूद लोगों की अब तक जान ले चुका है.
ईविंग एक हफ्ते से बीमार थीं और 18 अप्रैल को उनकी सांसें थम गईं. मौत के एक दिन बाद आए उनके टेस्ट रिजल्ट से यह पता चला कि वह कोरोना वायरस का शिकार थीं.
अंजली बताती हैं, 'वह बोल नहीं पा रही थीं. मैंने उनका पसंदीदा संगीत चलाया. उनमें कुछ बॉलिवुड के गाने और ब्लू डैन्यूब था.'


उनकी मौत की ख़बर आते ही भारत की कुछ मशहूर महिला पत्रकारों ने एक एडिटर के तौर पर उन्हें याद किया. इन लोगों ने 35 या 40 साल पहले कभी उनके साथ काम किया था.
लंदन में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस में काम कर रहीं चारु शहाणे ने बताया, 'वह मेरी पहली जॉब में मेरी एडिटर थीं. उन्होंने एक छोटे से इंटरव्यू के बाद मुझे भर्ती कर लिया था.'
चारु ईविंग को एक बेहतरीन और एक बड़ी शख्सियत वाले संपादक के तौर पर याद करती हैं. वह कहतीं हैं कि ईविंग एक उदार और शालीन महिला थीं. वह बताती हैं कि उन्हें शिफ़ॉन की साड़ियों और मोतियों के हार पहने देखा जा सकता था. उनकी उंगलियों के बीच में सिगरेट होती थी.
चार साल तक ईव्स वीकली में असिस्टेंट एडिटर रहीं अमू जोसेफ बताती हैं कि गुलशन ईविंग दफ्तर में चलकर नहीं आती थीं बल्कि वह सरसराती हुई दफ़्तर में दाख़िल होती थीं.
जोसफ़ बताती हैं, 'जब मैंने ईव्स वीकली जॉइन की तब मैं 24 साल की थी और मैं जबरदस्त फ़ेमिनिस्ट थी.' उनके ज्यादातर सहयोगी उसी उम्र और उसी तरह के तेवर वाले थे.
वह बताती हैं, 'ईविंग खुले दिमाग़ वाली महिला थीं और उन्होंने ईव्स वीकली को एक ज़्यादा सामयिक और महिलावादी पत्रिका बनाया.'
तब की युवा पत्रकार घरेलू हिंसा और चाइल्ड एब्यूज़ के बारे में लिखा करती थीं. मैगजीन ने रेप पर एक ख़ास अंक निकाला था. इनमें मैरिटल और कस्टोडियल रेप जैसे मसलों को भी शामिल किया गया था. साथ ही हिंदू धर्म में महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार पर भी एक मुखर आर्टिकल इस अंक में छपा था.
जोसफ़ बताती हैं, 'हम तब उम्र के 20वें दशक में थे जबकि वह 50 के दशक में थीं. उन्हें हमें सुनने की जरूरत नहीं थी, लेकिन वह गौर से हमारी बातें सुनती थीं.'
1980 के दशक में ईव्स वीकली में बतौर असिस्टेंट एडिटर काम कर चुकीं पामेला फिलिपोज़ कहती हैं कि ईविंग यह चीज समझ चुकी थीं कि बदलाव के इस दौर में महिलावादी संवेदना जरूरी है.
वह कहती हैं कि हालांकि ईविंग ने खुद कभी भी जेंडर इक्वैलिटी और महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा पर कुछ नहीं लिखा. वह खूबसूरत औरतों के साथ सामाजिक रूप से जुड़े रहने का आनंद उठाती थीं.
गुलशन ईविंग को अपनी ट्रिब्यूट में उनकी पूर्व सहयोगी शर्ना गांधी कहती हैं कि पिछले कुछ दिनों में छपे फ़ोटोग्राफ्स वाकई चौंकाने वाले हैं क्योंकि उन्होंने कभी भी एक सेलेब्रिटी होने का अपना रुतबा किसी पर जाहिर नहीं होने दिया.



उनकी बेटी अंजली खुद भी एक जर्नलिस्ट हैं. वह कहती हैं कि उनकी मां एक मशहूर महिला थीं, लेकिन उनके लिए वह एक मां ही थीं.
वह बताती हैं कि कैसे उनकी मां घर पर ढेर सारा काम लेकर आती थीं. अंजलि बताती हैं, 'उन्हें फिल्म स्टार रात के 2 बजे फोन किया करते थे. कई बार वे मैगजीन में उनके बारे में छपी किसी चीज की शिकायत करने के लिए फोन करते थे. मां को घंटे भर तक भी फोन पर रहना पड़ता था और उन्हें शांत करना पड़ता था.'

1990 में रिटायर होकर लंदन जाने के बाद उन्होंने पत्रकारिता और लिखना पूरी तरह से बंद कर दिया. अंजलि कहती हैं कि उन्होंने उन्हें एक किताब लिखने के लिए कहा लेकिन उन्होंने इसमें ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई.
अंजलि कहती हैं, 'तब भी उनकी जिंदगी यही थी और अभी भी उनकी जिंदगी ऐसी ही थी. उन्होंने अपने काम को उनके और फैमिली को हमारे तौर पर बांट रखा था.'
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