गुजरात चुनाव: भाजपा के लिए मुसीबत बन सकती है की ये 'त्रिमूर्ति'
नई दिल्ली। बीते 18 महीनों से गुजरात में जातीय राजनीति एक बार फिर से लौट आई है। जाति आधारित विभिन्न मुद्दों पर राज्य में कई आंदोलन भी देखने को मिले। इन्हीं आंदोलनों में गुजरात में 3 नए युवा नेताओं का जन्म हुआ। ये नेता हैं हार्दिक पटेल, अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवानी। इन तीनों युवा नेताओं के उभार ने सत्ता में बैठी भाजपा के माथे पर शिकन ला दिए हैं। अल्पेश ठाकोर ने शनिवार को कांग्रेस में शामिल होने का ऐलान कर दिया। उन्होंने जिग्नेश मेवानी और हार्दिक पटेल के भी साथ आने की बात कही। ऐसे में यह सवाल तेजी से उभर रहा है कि क्या ये तीनों युवा नेता इकठ्ठे होकर भाजपा की जड़े हिला पाएंगें।

अल्पेश ठाकोर
अल्पेश ठाकोर, गुजरात में ओबीसी समाज की राजनीति के बड़े चेहरे हैं। अल्पेश ने अपनी राजनीति की शुरूआत राज्य में शराबबंदी के खिलाफ अभियान चलाकर की थी। इन्होंने एक ठाकोर सेना बनाई थी जो राज्य में गुजरात में अवैध शराबबंदी के ठिकानों का भंडाफोड़ करती थी। अल्पेश ने जल्द ही इस आंदोलन के बहाने ओबीसी को अपने पीछे एकजुट कर लिया। राज्य में सबसे ज्यादा, 54 फीसदी मतदाता ओबीसी समुदाय से ही हैं। ऐसे में गुजरात में 20 सालों से सत्ता की राह ताक रही कांग्रेस के लिए अल्पेश ठाकोर गुजरात चुनावों में संजीवनी साबित हो सकते हैं।

हार्दिक पटेल
पाटीदार समाज को आरक्षण दिलाए जाने की मांग के साथ आंदोलन करने वाले 22 साल के हार्दिक पटेल ने जल्द ही गुजरात की राजनीति की तस्वीर बदल दी। 25 अगस्त, 2015 को गुजरात जीएमडीसी ग्राउंड में हार्दिक की सभा में 5 लाख से ज्यादा पाटीदार समाज के लोग इकठ्ठा हुए थे। हार्दिक पटेल जल्द ही गुजरात में पाटीदार समाज का चेहरा बन गए। बाद में सरकार ने हार्दिक पटेल को राजद्रोह के केस में जेल डाल दिया। लगभग 9 महीने बाद जब हार्दिक पटेल जेल से लौटे पटेल समुदाय के लोगों ने उनका भव्य स्वागत किया। यह स्वागत पटेल समाज में हार्दिक की पकड़ को दिखाता है। हार्दिक पदेल भाजपा पर पाटीदार समाज को धोखा देना का आरोप लगाते हैं। हाल ही में उन्होंने भाजपा को हराने के लिए पूरी ताकत लगाने की बात कही है।

जिग्नेश मेवाणी
गुजरात में दलित समुदाय के नेता के रूप में उभरे जिग्नेश मेवाणी इस त्रिमूर्ति की आखिरी कड़ी हैं। जिग्नेश मेवाणी को ऊना आंदोलन के दौरान पहचान मिली जह उन्होंने दलित समुदाय के लोगों को गाय न छुने की कसम दिलवाई। ऊना में कथित गौ रक्षकों द्वारा चार दलित सुमदाय के युवकों की पिटाई के बाद जिग्नेश ने पूरे गुजरात में पदयात्रा कर दलितों को एकजुट करने का काम किया था। इस पदयात्रा ने जिग्नेश को गुजरात में दलित नेता के तौर पर स्थापित कर दिया। राजनीतिक विश्लेषक तहसीन पूनावाला कहते हैं कि युवाओं में मौजूद ग़ुस्से से जन्मे ये नेता बीजेपी के लिए चुनौती बन सकते हैं और इसका असर बीजेपी पर दिख भी रहा है। बहरहाल, देखना है कि क्या होता है?












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