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ग्राउंड रिपोर्ट: तीन नाबालिगों की मौत वाले गांव को क्यों कहा जा रहा है 'मिनी पाकिस्तान'

By Bbc Hindi
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    ग्राउंड रिपोर्ट: तीन नाबालिगों की मौत वाले गांव को क्यों कहा जा रहा है मिनी पाकिस्तान

    राजस्थान के सबसे बड़े ज़िलों में एक बाड़मेर के ज़िला मुख्यालय से क़रीब 100 किलोमीटर दूर स्थित गांव है सरुपे का तला. 13 अप्रैल की सुबह अचानक से ये गांव तब सुर्खियों में आ गया, जब गांव के एक ही परिवार की दो नाबालिग लड़कियां और एक मुस्लिम लड़का गांव के बाहर एक पेड़ से लटके पाए गए.

    लड़कियां गांव के ही एक दलित परिवार से थीं. पुलिस के मुताबिक उनकी उम्र 12 साल और 13 साल की थी जबकि लड़का गांव के ही एक सिंधी मुसलमान परिवार से था. पुलिस के मुताबिक लड़के की उम्र 17 साल की थी.

    स्थानीय बिंजराड़ थाने की पुलिस ने मामले को परिवार वालों की मौजूदगी में आत्महत्या के तौर पर दर्ज किया, लेकिन अब लड़की का परिवार कह रहा है कि बच्चियों की हत्या हुई है.

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    पुलिस ने कराए सादे काग़ज़ पर हस्ताक्षर

    घटना के चार दिन बाद 17 अप्रैल को भैराराम मेघवाल की झोपड़ी के बाहर दस-बारह लोगों के साथ बैठे नज़र आए. जो बच्चियां पेड़ से लटकी पाई गईं, उनमें एक उनकी बेटी है, जबकि दूसरी लड़की उनके भाई किशनाराम की बेटी है.

    भैराराम मेघवाल ने बताया, "12 अप्रैल की रात तो 10-11 बजे तक हम लोग सो गए थे, उसके बाद उनकी बेटी को कोई बहला-फुसलाकर ले गया या फिर कोई उनको उठा कर ले गया कह नहीं सकते. हमने तो पुलिस को हत्या की बात कही है, लेकिन उन्होंने सादे काग़ज़ पर हस्ताक्षर करा लिए थे. अब हमें मालूम चला है कि उन्होंने आत्महत्या का केस बना दिया है."

    झोपड़ी से दोनों लड़कियां हादसे की जगह (जो उनकी झोपड़ी से एक किलोमीटर दूर है) तक कैसे पहुंचीं?

    इस सवाल के जवाब में वह कहते हैं, ''हम तो नींद में थे, वो लड़का ही उन दोनों को उठाकर ले गया होगा.''

    मेघवाल परिवार के पास घर के नाम पर एक झोपड़ी है जिसके अंदर जीवन को चलाने के लिए ज़रूरी मामूली चीज़ों का भी अभाव दिखता है. दोनों बच्चियों की माएं भी गांव की कुछ महिलाओं के साथ बैठी हैं.

    चेहरे पर बेटियों के चले जाने का ग़म है. ऐसा लगता है कि वे सुधबुध भी खो बैठी हैं पर बेटियों का ज़िक्र शुरू होते ही दहाड़ें मार कर रोने लगती हैं. कहती हैं कि घर के काम में हाथ बंटाने वाली चली गई.

    झोपड़ी के अंदर जाने पर अपनी बेटी के पुराने कपड़ों को दिखाती हैं और सिसकने लगती हैं. दिहाड़ी मज़दूरी करने वाले इन परिवारों के पास अपनी बेटियों की निशानी के तौर पर यही मामूली चीज़ें हैं.

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    क्या लड़की-लड़के के बीच था प्रेम-प्रसंग?

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    इस सवाल के जवाब में भैराराम मेघवाल इससे बिल्कुल इनकार करते हैं, हालांकि वे ये ज़रूर कहते हैं कि मृतक लड़का उनकी ही बेटियों से नहीं बल्कि गांव की दूसरी लड़कियों के साथ भी छेड़खानी करता रहा था.

    वे बार-बार इस बात को दोहराते हैं कि ट्यूबवेल से पानी लाने के दौरान आते-जाते उनकी बेटियों के साथ छेड़खानी होती थी.

    हालांकि, गांव में कई लोग इस बात को कहते हैं कि मुस्लिम लड़के का उन लड़कियों से आपसी मेलजोल था, जिसको लेकर एक साल पहले भी गांव में पंचायत हुई थी.

    गांव के सरपंच दोस्त मोहम्मद कहते हैं, ''हमने पंचायत की थी, समझाया था दोनों को, लड़की वालों को कहा था कि तुम अपना घर संभालो और लड़के के परिवार को भी कहा था कि ऐसी शिकायतें नहीं आनी चाहिए.''

    उस पंचायत के बारे में लड़की के पिता का कहना है कि मुस्लिम लड़के की छेड़खानी से तंग आकर उन्होंने ही ये पंचायत बुलाई थी.

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    बेटे की संगत ग़लत

    वैसे इस मामले में दोनों लड़कियां, लड़के को जानती थीं, ऐसा मानने की बुनियादी वजह भी है क्योंकि मेघवाल का परिवार उसी मुस्लिम परिवार के खेतों में ठेके की मजदूरी करता है और उसकी झोपड़ी भी मुस्लिम परिवार के खेत में ही है.

    मेघवाल परिवार की झोपड़ी और जिस पेड़ से तीनों लटके पाए गए, उसके ठीक बीच में मुस्लिम परिवार का घर है. कासम ख़ान भी खेती-किसानी करते हैं. उनके बड़े बेटे के पेड़ पर लटके होने की जानकारी उन्हें पुलिस से मिली.

    उनके घर में एक पक्की कोठरी है और दो-चार झोपड़ियां हैं. बाहर मुस्लिम समुदाय के कई लोग बैठे हैं. कासम ख़ान के मुताबिक उनका बेटा कोई काम-धंधा नहीं करता था और गांव में रहता था, लेकिन वे कहते हैं कि बेटे की संगत ग़लत लड़कों से थी.

    लड़की वालों का परिवार भी इस मामले में एक-दूसरे लड़के की भूमिका की बात कर रहा है, जिसके बारे में कासम ख़ान भी कहते हैं कि उनका बेटा उस लड़के के साथ ही दिन-रात रहता था.

    हालांकि पुलिस ने उस लड़के को भी हिरासत में लेकर पूछताछ की है.

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    पुलिस के मुताबिक़ प्रेम-प्रसंग का मामला

    लेकिन चौहटन अनुमंडल के डीएसपी सुरेंद्र कुमार प्रजापत कहते हैं, "उस लड़के से भी पूछताछ की, लेकिन उसकी संलिप्तता के सबूत नहीं मिले हैं. मृतक लड़के का आपसी रिश्ता दोनों ही लड़कियों से था. ये प्रेम प्रसंग जैसा ही था जो बीते दो ढाई साल से चल रहा था."

    बाड़मेर ज़िले के इन भारत-पाकिस्तान सीमा से सटे सीमावर्ती गांवों में ग़रीबी और निरक्षरता ज़्यादा है.

    इलाके के वरिष्ठ पत्रकार प्रेम दान कहते हैं, "इस एक मामले को आप सीमावर्ती गांवों में पनप रही संस्कृति के तौर पर देख सकते हैं, इलाके के मुस्लिम परिवारों के पास थोड़ा पैसा है और ग़रीब दलितों के पास कुछ भी नहीं है, लिहाजा लड़कियां मुस्लिम लड़कों के आकर्षण में आ जाती हैं."

    ताकतवर स्थिति में मुसलमान

    दरअसल, बाड़मेर के इन सीमावर्ती गांवों में सिंधी मुसलमानों का दबदबा है, उनकी आबादी इलाक़े की कुल आबादी में दो तिहाई से ज़्यादा है, उन्हीं लोगों के पास ज़मीनें हैं और काम धंधा भी. ज़ाहिर है कि मुस्लिम परिवारों के लड़कों के पास मोटरबाइक है, फैशनबल कपड़े और जूते पहनने के लिए पैसे भी हैं.

    इलाके के डीएसपी सुरेंद्र कुमार प्रजापत कहते हैं, "दरअसल इन इलाकों में दलित मुसलमानों के खेतों में मजदूरी करते हैं, लिहाजा उनका एक दूसरे के घरों में आना जाना होता ही है. दलित लड़कियां अभाव में अपनी ज़िंदगी जीती हैं, ऐसे में ये लड़के थोड़ा बहुत पैसा खर्च करके उनसे रिश्ता गांठ लेते हैं, ऐसे मामले भी आते रहते हैं."

    अगर इलाके में ये बात कॉमन है तो फिर ऐसी क्या बात हुई जिसके चलते तीनों को पेड़ से लटकाना पड़ा.

    इस बारे में पुलिस अधिकारी सुरेंद्र प्रजापत कहते हैं, "दरअसल भैराराम मेघवाल ने अपनी लड़की की शादी तय कर दी थी, 18 अप्रैल को शादी होने वाली थी. ये एक वजह हो सकती है, जिसके चलते तीनों ने ये क़दम उठाया होगा."

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    शुरुआती जांच में आत्महत्या के संकेत

    लेकिन अब मेघवाल का परिवार इस बात पर अड़ा है कि उनकी बेटियों की हत्या हुई है और पुलिस उनके मामले की जांच ठीक से नहीं कर रही है. हालांकि स्थानीय पुलिस का कहना है कि वे लोग मामले की सटीक जांच कर रहे हैं.

    स्थानीय पुलिस का दावा है कि हादसे की जगह की जो वीडियोग्राफी कराई गई थी, उससे तो यही जाहिर होता है कि वहां केवल तीन लोगों के पदचिन्ह थे. लड़के ने एकदम नया जूता पहना हुआ था जबकि लड़कियों की चप्पल भी नई जैसी थी. पुलिस के मुताबिक इन तीनों के पास से एक भी रूपया, पैसा नहीं मिला. लड़के की जेब से मोबाइल फ़ोन जरूर बरामद किया गया था.

    अब पुलिस ये भी दावा कर रही है कि लड़के के कॉल डिटेल्स के सहारे जल्द ही लड़कियों के पास रहे मोबाइल नंबर का पता लगा लेगी.

    हालांकि, भैराराम मेघवाल ने कहा है कि उनकी बेटियों के पास कभी मोबाइल फ़ोन था ही नहीं.

    हिंदू-मुसलमानों के बीच नफ़रत का पहलू

    डीएसपी सुरेंद्र कुमार प्रजापत कहते हैं, "अब तक मिले साक्ष्यों से ये आत्महत्या का मामला दिख रहा है, अगर लड़की का परिवार कुछ नए सबूतों के साथ शिकायत करने आता है, तो हम फिर उसे देखेंगे."

    ऐसे में एक सवाल ये भी है कि क्या इस घटना को हिंदू बनाम मुसलमान, भारत बनाम पाकिस्तान करके सांप्रदायिकता का रंग देने की कोशिश हो रही है.

    इसकी एक वजह तो ये भी है कि अचानक से गांव में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की सक्रियता बढ़ गई है. संघ के लोगों ने दलित परिवार से जाकर तुरंत मुलाकात की है.

    बाड़मेर में संघ से जुड़े एक पदाधिकारी स्वरूप सिंह खाड़ा परिवार से मिलने वाले लोगों में से हैं.

    उन्होंने बताया, "हमारा तो मानना है कि मुसलमानों के लड़के हमारे दलित हिंदुओं की लड़कियों को फंसाते हैं. पिछले कुछ सालों में ऐसे मामले लगातार बढ़ रहे हैं, हमने तो उस परिवार से मुलाकात करके कहा है कि हम न्याय दिलाने में तुम्हारी मदद करेंगे."

    इलाके में ऐसे लोग भी मिले जिनके मुताबिक संघ की सक्रियता से मिले मनोबल और सरकार से मुआवज़ा पाने की आस में दलित परिवार इस मुद्दे को नए सिरे से उठा रहा है.

    संघ की सक्रियता का अंदाज़ा इस बात से भी होता है कि सरुपे का तला, में दलित हिंदुओं ने मुसलमानों को जमकर कोसा.

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    'हमारा गांव मिनी पाकिस्तान बन गया है'

    भैराराम मेघवाल की झोंपड़ी के बाहर बैठे एक बुजुर्ग ने बताया, "हमारा गांव मिनी पाकिस्तान बन गया है जिसमें बड़ी-बड़ी गैंग काम कर रही है जो आए दिन हिंदुओं से झगड़ा करते रहते हैं और तो और इन लोगों के ख़िलाफ़ कोई गवाही देने को तैयार नहीं होता."

    हालांकि, गांव में अधिकांश आबादी मुसलमानों की है और इनमें से अधिकांश ने माना है कि ये 'प्यार का मामला' ही था. वहीं मृतक लड़के के पिता कासम ख़ान कहते है, "मेरा तो एक लड़का गया है, दलितों की दो लड़कियां चली गई हैं, मुझे उस परिवार के लिए ज्यादा अफ़सोस हो रहा है."

    जैसलमेर-बाड़मेर में संघ के विभाग प्रमुख श्याम सिंह बताते हैं, "इस घटना में हत्या हुई है या आत्महत्या, ये तो पुलिस जांच का विषय है, लेकिन हमारा ये कहना है कि ये हिंदुओं की लड़कियों को क्यों झेलना पड़ता है."

    हालांकि संघ की सक्रियता से बीजेपी स्थानीय स्तर पर बहुत फ़ायदा होगा, ऐसा भी नहीं है क्योंकि चौहटन विधानसभा के मौजूदा विधायक तरूण राय कागा खुद मेघवाल हैं और बीजेपी के विधायक हैं.

    तरुण राय के मुताबिक सीमावर्ती इलाकों में ऐसे मामले आम बात होते जा रहे हैं और इनमें से कई मामलों को स्थानीय पंचायत स्तर पर ही समझौतों के ज़रिए दबा दिया जाता है.

    दलित परिवार की एक शिकायत ये भी है कि विधायक भी मेघवाल ही हैं, लेकिन उनसे इस मामले में मदद नहीं मिली है, हालांकि तरूण राय कागा ने कहा है कि उन्होंने पुलिस से इस मामले में निष्पक्ष जांच करने को कहा है.

    तरुण राय कागा की एक मुश्किल ये भी है कि उनका चुनाव क्षेत्र मुस्लिम बहुल सुरक्षित विधानसभा है और बिना मुस्लिम वोटों के वे चुनाव नहीं जीत सकते. यही वजह है कि स्थानीय स्तर पर कांग्रेस भी इस मुद्दे को तूल देती नजर नहीं आई है.

    बावजूद इन सबके बाड़मेर के 42-43 डिग्री सेल्सियस वाले सरुपे का तला गांव का तापमान कुछ बढ़ ज़रूर गया है.

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    BBC Hindi
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    English summary
    Ground Report Why is the village being said to the death of three minors Mini Pakistan

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