• search
For Quick Alerts
ALLOW NOTIFICATIONS  
For Daily Alerts

    ग्राउंड रिपोर्ट: बनारस में मंदिरों और मूर्तियों को तोड़े जाने की सच्चाई

    By Bbc Hindi
    ग्राउंड रिपोर्ट: बनारस में मंदिरों और मूर्तियों को तोड़े जाने की सच्चाई

    "गली, गाली और पान. बनारस की यही पहचान हैं."

    काशी विश्वनाथ मंदिर के गेट नंबर दो के पास रहने वाले कृष्ण कांत शर्मा इन दिनों भारी मन से कहते हैं, "बनारस में लोग इन्हीं गलियों, दुकानों और घाटों को देखने आते हैं. मॉल और पार्क देखने नहीं. ये ख़त्म हो गए तो समझिए कि बनारस की आत्मा ख़त्म हो गई."

    स्थानीय लोगों के मुताबिक़ इन तंग गलियों की संख्या हज़ारों में है और इनके दोनों ओर बने बहुमंज़िले मकानों में ऐसा शायद ही कोई मकान हो जहाँ एक या एक से अधिक मंदिर न हों.

    शायद इसीलिए कहा भी जाता है कि यहां ये फ़र्क करना मुश्किल है कि घरों में मंदिर हैं या फिर मंदिरों में घर.

    घर गंवाने का डर

    पिछले दो-तीन महीनों से यहां लोग इस आशंका और भय में जी रहे हैं कि कब उनके मकानों को सरकार ख़रीद ले फिर उसे ध्वस्त कर यहां का कायापलट कर दे और उन्हें यहां से विस्थापित होना पड़े.

    यानी काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर के सौंदर्यीकरण की योजना के तहत यहां बसे सैकड़ों मकानों को ध्वस्त करने की तैयारी चल रही है.

    कृष्ण कांत शर्मा 'काशी धरोहर बचाओ संघर्ष समिति' के कोषाध्यक्ष हैं.

    वे कहते हैं, "इन गलियों को ख़त्म करके इनका सिर्फ़ भौतिक सौंदर्यीकरण किया जा सकता है, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक नहीं. अप्रैल, 2017 में अख़बारों में अचानक समाचार छपता है कि विश्वनाथ मंदिर के पास गंगा पाथवे योजना के लिए 167 मकानों का अधिग्रहण किया जाएगा."

    उन्होंने बताया, "हम लोगों ने इसका कारण जानने की हरसंभव कोशिश की लेकिन आज तक इस बारे में कुछ भी पता नहीं चल सका है."

    मकानों का अधिग्रहण

    संघर्ष समिति का आरोप है कि ये ख़बर आने के बाद से ही यहां के लोगों को डरा-धमकाकर मकान बेचने पर विवश किया जा रहा है.

    स्थानीय नागरिक पद्माकर पांडेय बताते हैं, "किसी को कुछ भी नहीं पता है कि सरकार किस योजना के तहत लोगों के मकानों का अधिग्रहण कर रही है. सरकारी अधिकारी कभी ख़ुद तो कभी दूसरे लोगों के माध्यम से स्थानीय लोगों पर ये कहकर मकान बेचने का दबाव बना रहे हैं कि अभी तो कुछ मुआवज़ा मिल भी जाएगा, बाद में एक पाई नहीं मिलने वाली."

    हालांकि विश्वनाथ मंदिर के मुख्य कार्यपालक अधिकारी यानी सीईओ विशाल सिंह इस बात से इनकार करते हैं कि किसी को मकान बेचने के लिए धमकाया जा रहा है.

    वो कहते हैं, "आपको बिल्कुल ग़लत जानकारी दी गई है. प्रॉपर तरीक़े से लोगों से बातचीत के बाद संपत्ति की क़ीमत तय की जा रही है और उसके बाद उनकी इच्छा से ही मकान लिया जा रहा है. मकान का पैसा भी सीधे उनके खाते में दिया जा रहा है. दबाव बनाने का तो कोई मतलब ही नहीं है."


    काशी के सौंदर्यीकरण का ब्लूप्रिंट

    सौंदर्यीकरण की परियोजना अभी तक सार्वजनिक नहीं की गई है और न ही परियोजना का कोई खाका यानी ब्लू प्रिंट तैयार हुआ है. ये भी तय नहीं हुआ है कि किन मकानों को गिराया जाना है और किन्हें नहीं.

    ये बातें ख़ुद विशाल सिंह भी स्वीकार करते हैं.

    वहीं इस परियोजना से जुड़े एक अन्य अधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि योजना का ब्लूप्रिंट सार्वजनिक भले नहीं किया गया है लेकिन इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को दिखाया गया है और उन दोनों ने इसकी तारीफ़ करते हुए अपनी स्वीकृति दे दी है.

    इन अधिकारी से जब हमने ये पूछा कि क्या उन्हें इसके विरोध के बारे में पता है? उनका जवाब एक हल्की सी मुस्कान में मिला.

    दरअसल, सरकार चाहती है कि गंगा तट पर ललिता घाट से विश्वनाथ मंदिर तक पहुंचने के मार्ग को चौड़ा करके उसे साफ़-सुथरा और सुंदर बनाया जाए ताकि जो भी लोग वहां दर्शन के लिए आएं, उन्हें सुविधा मिल सके.

    बनारस की पहचान

    योजना ये भी है कि गंगा तट से विश्वनाथ मंदिर साफ़-साफ़ दिखाई पड़े. अभी श्रद्धालु सँकरी गलियों से होकर मंदिर तक जाते हैं. भीड़ होने के कारण लंबी-लंबी लाइनें लगती हैं.

    गलियों के किनारे बने ऊंचे-ऊंचे मकानों की वजह से मंदिर का शिखर तक नहीं दिखाई पड़ता. इसके लिए ज़ाहिर है पुराने घरों, घरों में बने मंदिरों और गलियों को ख़त्म करना पड़ेगा.

    लेकिन स्थानीय लोग ऐसा नहीं करने देना चाहते.

    उनका कहना है कि यही बनारस की पहचान है और अगर इसे ख़त्म कर दिया गया तो बनारस जैसे प्राचीन शहर और दूसरे नए शहरों में फ़र्क क्या रह जाएगा?

    सीईओ विशाल सिंह बताते हैं कि योजना के तहत क़रीब 300 घरों को ख़रीदा जाना है और अब तक 90 से ज़्यादा घर ख़रीदे जा चुके हैं.

    उनके मुताबिक़ इनमें से क़रीब 30 घरों को नष्ट भी किया जा चुका है. वो कहते हैं, "लेकिन न तो एक भी मंदिर तोड़ा गया है और न ही किसी मूर्ति को कोई नुकसान हुआ है."

    'हमारे मकान बिकाऊ नहीं हैं'

    स्थानीय लोग पिछले क़रीब तीन महीने से लगातार सरकार की इस कार्रवाई का विरोध कर रहे हैं.

    'हमारे मकान बिकाऊ नहीं हैं', 'हम अपनी धरोहर को नष्ट नहीं होने देंगे' जैसे तमाम नारों से इन गलियों की दीवारें पटी हुई हैं. पोस्टर लगे हुए हैं.

    सरकार के इस फ़ैसले से स्थानीय लोगों में बेहद आक्रोश है. लोगों का कहना है कि बनारस को धर्म नगरी के स्थान पर पर्यटन केंद्र बनाया जा रहा है.

    सरकार के इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद तीन चरणों में आंदोलन कर चुके हैं और जब हमारी उनसे मुलाक़ात हुई तो वो तीसरे चरण के तहत पारक व्रत यानी उपवास और मौनव्रत में थे.

    बारह दिन तक वो इस व्रत में रहे, उसके बाद उनसे हमारी बात हुई.

    उनका कहना था, "सरकारी अफ़सर कुछ भी कहें, मेरे पास मंदिरों को तोड़े जाने और मूर्तियों को अपमानित करने और उन्हें नुक़सान पहुंचाने के प्रमाण हैं. मूर्तियों को तो मलबे में दबा दिया गया. हमने दर्जनों मूर्तियों को वहां से निकाल कर दोबारा प्राण प्रतिष्ठा की और अब फिर से उनका पूजन हो रहा है."


    सैंकड़ों साल पुराने मकान

    काशी विश्वनाथ मंदिर परिसर के आसपास स्थित इन गलियों के किनारों पर स्थित ये कई मंज़िला मकान सैकड़ों साल पुराने और जर्जर अवस्था में हैं. मकानों के भीतर ही नहीं बल्कि बाहर भी मंदिर बने हैं. इनकी दीवारों तक में मूर्तियां हैं.

    स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर मकान तोड़े गए हैं तो मंदिर न टूटे हों और मूर्तियां सुरक्षित रह गई हों, ऐसा संभव ही नहीं.

    पक्का मोहाल के रहने वाले अखिलेश त्रिपाठी सरस्वती फाटक के पास ज़मींदोज़ हुए एक भवन को दिखाते हुए कहते हैं, "ये प्रमोद विनायक मंदिर को तोड़ा गया है. गणेश भगवान की मूर्ति छोड़ दी गई है."

    "आप ख़ुद देख लीजिए ये पुलिस वाले मूर्ति के पास जूते पहन कर खड़े हैं. सरकार भगवान का इस तरह अपमान करा रही है."

    बताते-बताते अखिलेश त्रिपाठी बेहद आक्रोशित हो जाते हैं.

    आसपास के लोगों ने जब घरों के भीतर स्थित मंदिरों को दिखाना शुरू किया तो ये साफ़ समझ में आ रहा था कि कई मकानों की स्थिति ऐसी है कि इसे मंदिर से अलग नहीं किया जा सकता.

    मंदिरों का रजिस्ट्रेशन

    अपने घर के बाहर पूजा सामग्री की दुकान चलाने वाली नीलम शुक्ला कहती हैं, "अब मकान गिराएंगे तो मंदिर कैसे नहीं गिरेंगे. मकान और मंदिर अलग थोड़े ही हैं."

    स्थानीय लोगों का कहना है कि यहां कई मंदिरों का रजिस्ट्रेशन भी मकान के रूप में ही हुआ है और उन्हें भी वैसे ही नंबर आबंटित किए गए हैं.

    लेकिन सरकारी अधिकारी कहते हैं कि ज़्यादातर लोगों ने जानबूझकर घरों में मंदिर बना रखा है ताकि मंदिर के नाम पर मकान के साथ छेड़-छाड़ न हो.

    ये अलग बात है कि यहां का शायद ही कोई मकान ऐसा हो जिसमें मंदिर न हो. जिन मकानों को तोड़ा जा चुका है, वहां के मंदिरों से निकली कुछ मूर्तियों को तो लोग उठा ले गए और कुछ अभी भी ज़मीन पर ही पड़ी हुई हैं.

    विश्वनाथ कॉरिडोर प्रोजेक्ट

    लोगों का कहना है कि सरकार ने अभी तक उन्हीं के मकान ख़रीदे हैं जो यहां नहीं रहते और उन्होंने मकान किराए पर दे रखे थे या फिर ये मकान खाली पड़े थे.

    जो लोग यहां रह रहे हैं, वो किसी भी क़ीमत अपना मकान बेचने को राज़ी नहीं हैं.

    बहरहाल, सरकारी अफ़सर इस बात को लेकर आश्वस्त हैं कि वो विश्वनाथ कॉरिडोर प्रोजेक्ट के लिए सभी मकानों को ख़रीदने में सफल होंगे और लोगों का कहना है कि कुछ भी हो जाए, वो अपने मकान नहीं देंगे.

    कौन जीतेगा, कौन हारेगा, ये तो देखने वाली बात होगी लेकिन बड़ा सवाल यही है कि बनारस की इन तंग गलियों से निकलने वाली आवाज़ें जो अनुभूति देती हैं, क्या चौड़ी सड़कें, उन पर खड़े हरे-भरे पेड़ और किनारे बनीं बड़ी-बड़ी दुकानें वैसा दे पाएंगी?

    मोदी के बनारस में क्यों भटक रहे हैं 1194 परिवार?

    बनारस में सफाई का रियलिटी चेक: 5 तस्वीरें

    अधिक उत्तर प्रदेश समाचारView All

    जीवनसंगी की तलाश है? भारत मैट्रिमोनी पर रजिस्टर करें - निःशुल्क रजिस्ट्रेशन!

    BBC Hindi
    देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
    English summary
    Ground Report The reality of breaking of temples and statues in Banaras

    Oneindia की ब्रेकिंग न्यूज़ पाने के लिए
    पाएं न्यूज़ अपडेट्स पूरे दिन.

    Notification Settings X
    Time Settings
    Done
    Clear Notification X
    Do you want to clear all the notifications from your inbox?
    Settings X
    X