केंद्रीय विद्यालयों में जर्मन और संस्कृत ने खोली कांग्रेस की पोल
केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी पिछले सप्ताह देश के सभी केंद्रीय विद्यालयों को विशेष निर्देश दिये कि स्कूली पाठ्यक्रम से जर्मन भाषा को निकाल बाहर कर दिया जाये। उसकी जगह संस्कृत पढ़ाई जाये। इस आदेश के आते ही सभी प्रधानाचार्य इसे लागू करने में जुट गये, जबकि शिक्षकों के हाथ-पैर फूल गये कि कैसे सत्र के बीच में छात्रों को एक भाषा हटा कर दूसरी भाषा पढ़ाई जाये।

इस आदेश में स्मृति ईरानी ने राष्ट्रहित देखा, जबकि लोगों के बीच इसे लेकर बड़ा कंफ्यूजन हो गया है। तो चलिये देखते हैं आखिर जर्मन और संस्कृत के बीच क्या कनेक्शन है?
देश भर में हर कोई विदेशी भाषा सीखना चाहता है, यह सोचकर कि आगे चलकर विदेश जाने का मौका मिला तो उन्हें फायदा मिलेगा। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि जर्मन भाषा और संस्कृत के बीच 4,500 साल पुराना नाता है। यह तो सब जानते हैं कि ग्रीक और लैटिन से निकल कर अंग्रेजी बनी, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि संस्कृत भारतीय-यूरोपीय भाषाओं की जननी है। इसके बावजूद संस्कृत को कभी ऊंचा दर्जा नहीं मिल सका। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि लोगों ने कभी संस्कृत को बढ़ावा नहीं दिया। खास तौर से बुद्धिजीवी वर्ग इस भाषा के साथ हमेशा सौतेला व्यवहार करता आया है।
इंडो-जर्मन कनेक्शन की बात करें तो शब्द पितर ले लीजिये
पितर (संस्कृत)
पाटेर (लैटिन)
पतेर (ग्रीक)
पादरे (स्पेनिश)
फादर (अंग्रेजी)
फादिर (ओल्ड नोर्स)
वादेर (जर्मन)
हम सोचते हैं कि लैटिन ही सभी भाषाओं की जनननी है, जबकि तमाम ऐसे शब्द हैं जो एक जैसे हैं। उदाहरण के लिये तीन, सात, आठ, नौ, सांप, राजा, भगवान, जैसे तमाम शब्द हैं, जो लैटिन और संस्कृत में एक जैसे उच्चारण वाले हैं। एशियाटिक सोसाइटी कलकत्ता में इस पर एक अध्ययन भी किया गया, जिसमें बल देकर कहा गया कि संस्कृत ज्यादा बड़ी भाषा है।
कांग्रेस की भूमिका
कांग्रेस की भूमिका की बात करें तो 2011 में सोनिया गांधी के निर्देश पर केंद्रीय विद्यालयों में विदेशी भाषा को बतौर तीसरी भाषा के रूप में समाहित किया गया। 23.9.2011 को गोइथे इंस्टीट्यूट और केंद्रीय विद्यालय के बीच एक एमओयू साइन किया गया। खास बात यह है कि उस वक्त मानव संसाधन मंत्री कोई और नहीं बल्कि कपिल सिब्बल थे। इसके अंतर्गत केवी ने जर्मन भाषा को चुना और कक्षा छह से आठ तक के बच्चों के मत्थे मढ़ दिया। खास बात यह है कि केवी के शिक्षकों को ही जर्मन टीचर के रूप में प्रशिक्षण देने का ऐलान किया गया, जो कि सबसे ज्यादा कठिन था।
कुल मिलाकर देखा जाये तो कांग्रेस ने बच्चों को संस्कृत की जगह जर्मन पढ़ाना ज्यादा उचित समझा। और वर्तमान मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी ने इसी के विरुद्ध नया फैसला किया है।
अब कितनी सही हैं स्मृति ईरानी?
तकनीकी रूप से बात की जाये तो सत्र के बीच में जर्मन भाषा को निकाल बाहर करना, एक बड़ी चुनौती है खास तौर से उनके लिये जो बोर्ड इम्तहान के लिये तैयारी कर रहे हैं। जर्मन का भार पहले ही उनपर भारी था, अब मात्र तीन महीने में संस्कृत सीखना उनके लिये टेढ़ी खीर साबित हो सकता है। यही आदेश अगर सत्र के शुरुआत में आता तो स्मृति ईरानी का आईडिया कतई खराब नहीं था। बल्कि सच पूछिढ तो यह हमारे देश की विरासत है, जिसे सहेज के रखना हर नागरिक का कर्तव्य है। और अगर ज्ञान की बात करें तो विदेशी जमीन पर कदम रखने से पहले अपनी जमीन का ज्ञान होना ज्यादा बेहतर रहता है।












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