क्या वाकई महात्मा गांधी ने भगत सिंह को बचाने की कोशिश नहीं की? जानें इसकी सच्चाई
सोशल मीडिया से लेकर सियासी जगत में अक्सर इस बात की चर्चा होती है कि महात्मा गांधी ने भगत सिंह को बचाने की कोशिश नहीं की, अगर महात्मा गांधी चाहते तो भगत सिंह को फांसी से बचा सकते थे। कई लोगों का मानना है कि गांधी जी भगत सिंह से माफी मंगवाना चाहते थे लेकिन भगत सिंह ने माफी मांगने से इनकार कर दिया। जिस वजह से महात्मा गांधी, भगत सिंह को फांसी से नहीं बचा पाए। तो चलिए आज हमलोग इस बात की सच्चाई जानने की कोशिश करेंगे कि क्या सच में महात्मा गांधी ने भगत सिंह को बचाने की कोशिश नहीं की थी।
मार्क शेपर्ड की किताब 'गांधी और उनसे जुड़े झूठ' के मुताबिक 7 अक्टूबर 1930 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरू को फांसी की सजा सुनाई गई थी। उनकी फांसी के लिए 24 मार्च 1931 की तारीख मुकर्रर की गई थी। लेकिन इससे पहले 17 फरवरी 1931 को गांधी और इरविन के बीच समझौता हुआ। भगत सिंह के रिश्तेदार और समर्थक चाहते थे कि गांधी इस समझौते की शर्तों में भगत सिंह की फांसी रोकना शामिल करें। लेकिन महात्मा गांधी इसके लिए तैयार नहीं हुए। वह नहीं चाहते थे कि इस समझौते में भगत सिंह की फांसी के मुद्दे को शामिल किया जाए। महात्मा गांधी ने इस मुद्दे को अलग रखकर वायसराय से बात करना चाहते थे।

इसके बाद महात्मा गांधी ने वायसराय से 18 फरवरी को अलग से भगत सिंह और उनके साथियों की फांसी के बारे में बात की। हालांकि, वायसराय महात्मा गांधी की बात करने के तरीके से खुश हुए, लेकिन इस मांग पर तैयार नहीं हुए कि भगत सिंह और उनके साथियों की फांसी माफ कर दी जाए। वायसराय ने कहा कि हम फांसी तो माफ नहीं कर पाएंगे, लेकिन फांसी पर फिलहाल के लिए रोक लगा सकते हैं।
इसके बाद महात्मा गांधी ने भगत सिंह की फांसी रोकने के लिए कानूनी रास्ते भी तलाशने शुरू किए। 29 अप्रैल, 1931 को सी विजयराघवाचारी को भेजी चिट्ठी में गांधी ने लिखा कि इस सजा की कानूनी वैधता को लेकर ज्यूरिस्ट सर तेज बहादुर ने वायसराय से बात की। लेकिन इसका भी कोई फायदा नहीं निकला। गांधी के सामने सबसे बड़ी परेशानी ये थी कि ये क्रांतिकारी खुद ही अपनी फांसी का विरोध नहीं कर रहे थे।
गांधी ने इसके बाद भी कोशिश जारी रखी। उन्होंने आसिफ अली को लाहौर में भगत सिंह और उनके साथियों से मिलने भेजा। वो बस भगत सिंह और उनके साथी से एक बात चाहते थे कि वे हिंसा का रास्ता छोड़ देंगे। हालांकि, यह मुलाकात नहीं हो सकी। जिसके बाद मामला बिगड़ता ही जा रहा था।
22 मार्च को फिर से गांधी और इरविन की मुलाकात हुई। इरविन ने वादा किया कि वो इस पर विचार करेंगे। 23 मार्च को यानी फांसी की तारीख से एक दिन पहले गांधी ने इरविन को एक चिट्ठी लिखकर कई कारण गिनाए और इस सजा को रोकने की अपील की। लेकिन 23 मार्च की शाम को सजा की मुकर्रर तारीख से एक दिन पहले भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी दे दी गई।
इस फांसी से महात्मा गांधी काफी आहत हुए। उन्होंने एक पत्र लिखते हुए कहा कि'वह जीवित रहने का आकांक्षी नहीं था। उसने माफी मांगने से इंकार कर दिया और प्राणरक्षा की अपील नहीं की। महात्मा गांधी ने कहा कि भगत सिंह और उनके साथियों को फांसी पर चढ़ाकर सरकार ने अपने बर्बर स्वभाव का परिचय दिया है। मेरे निवेदनों और जनमानस की उपेक्षा कर उसने अपने अहंकार का ताजा सबूत दिया है। भगत सिंह और उसके साथियों की फांसी वायसराय के रूप में इरविन का आखिरी बड़ा फैसला था। अप्रैल में वह भारत से चला गया और उसकी जगह लॉर्ड विलिंगटन को भारत का वॉयसराय नियुक्त किया गया।
गांधी ने इरविन के विदाई पत्र में कहा कि 'भगत सिंह को फांसी की सजा आपके कार्यकाल का ऐसा काला अध्याय है जो हमेशा आपके साथ जुड़ा रहेगा। मेरे मन में आपके प्रति सम्मान रहता यदि आप मेरे अनेक निवेदनों और तमाम कोशिशों के बाद भगत सिंह की फांसी की सजा को टाल देते। आपने ऐसा नहीं करके मेरे मन से सम्मान खोया है।'












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