बीजिंग में गांधी-भुट्टो मुलाकात: 2008 की 'शोक सभा' या छिपी हुई कूटनीति? कांग्रेस को देना चाहिए साफ जवाब
Gandhi Family Bilawal Bhutto Meeting: क्या 2008 की गांधी-भुट्टो मुलाकात वाकई सिर्फ शोक-संवेदना थी या कुछ और भी चल रहा था? ये सवाल अचानक चर्चा में तब आया, जब बीजिंग ओलंपिक 2008 की एक पुरानी तस्वीर सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। इस तस्वीर में भारतीय कांग्रेस नेता सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा नजर आ रहे हैं - और साथ हैं बिलावल भुट्टो और उनकी बहनें।
तस्वीर में कुछ भी असामान्य नहीं है, लेकिन आज की राजनीति में हर इशारा, हर मुलाकात, हर पुरानी तस्वीर सवालों के घेरे में आ जाती है। खासकर जब बात भारत और पाकिस्तान के बीच के नाजुक रिश्तों की हो।

क्या हुआ था 2008 में?
बीजिंग ओलंपिक के उद्घाटन समारोह में हिस्सा लेने के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी - दोनों के प्रतिनिधिमंडल मौजूद थे। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) के निमंत्रण पर दोनों पहुंचे थे। यहीं एक लगभग 30 मिनट की अनौपचारिक मुलाकात हुई। कांग्रेस के अनुसार, यह मुलाकात सिर्फ शोक-संवेदना के लिए थी - क्योंकि उसी साल बेनजीर भुट्टो की हत्या हुई थी।
मगर अब सवाल उठते हैं...
कुछ रिपोर्ट्स बताती हैं कि कांग्रेस और CPC के बीच एक MoU (समझौता ज्ञापन) पर भी साइन हुआ था, जिसमें आपसी राजनीतिक सलाह और सहयोग की बात कही गई थी। हालांकि, इसकी कोई सार्वजनिक डिटेल आज तक नहीं जारी की गई। बाद में कहा गया कि PPP ने भी ऐसा ही MoU साइन किया था।
अब जब तस्वीर फिर से सामने आई है, तो कई लोग पूछ रहे हैं - क्या यह वाकई सिर्फ 'शोक' की बैठक थी या कोई बैक-चैनल डिप्लोमेसी भी चल रही थी?
इसलिए सवाल जायज है...
क्योंकि जब भारत और पाकिस्तान जैसे दो कट्टर प्रतिद्वंद्वी देशों के प्रमुख राजनीतिक परिवारों के उत्तराधिकारी, एक तीसरे देश में और वो भी CPC के आमंत्रण पर मिलते हैं, तो ये कोई मामूली घटना नहीं होती। इसलिए लोग कांग्रेस से चाहते हैं कि वो साफ-साफ बताए - उस मुलाकात का उद्देश्य क्या था? क्या वहां कोई राजनीतिक चर्चा हुई? क्या चीन इसका मंच था?
18 साल पुरानी तस्वीर, आज का राजनीतिक सवाल
हाल ही में सोशल मीडिया पर इस मुलाकात की एक पुरानी तस्वीर वायरल हुई - जिसमें दोनों पक्ष कैमरे में मुस्कुराते हुए नजर आ रहे हैं। इस एक तस्वीर ने कांग्रेस की कूटनीति और पारदर्शिता को लेकर नई बहस छेड़ दी है। क्या उस दौर में कांग्रेस चीन के जरिए पाकिस्तानी नेतृत्व से बैकचैनल संवाद में लगी थी? अगर हां , तो क्या विदेश मंत्रालय को इसकी जानकारी थी? और सबसे अहम - इस मीटिंग की संपूर्ण प्रकृति आज तक गोपनीय क्यों है?
अब जबकि राजनीतिक पारदर्शिता की मांग और सोशल मीडिया की पहुंच लगातार बढ़ रही है, ऐसी पुरानी घटनाएं सिर्फ इतिहास नहीं रह जातीं - वे आज के संदर्भ में नए मायने पैदा करती हैं। क्या कांग्रेस इसपर जवाब देगी? अभी तक पार्टी की ओर से कोई औपचारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। लेकिन सवाल अब उठ चुके हैं - और पब्लिक जवाब चाहती है।












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