राजस्थान: बीजेपी और कांग्रेस को नहीं दिख रहा तीसरे मोर्चा से कोई खतरा, जानिए क्यों?

नई दिल्ली। तीसरे मोर्चे के गठन को लेकर जारी कवायद के बीच फिलहाल राजस्थान में बीजेपी और कांग्रेस के लिए कोई खतरा नजर नहीं आ रहा है। राजस्थान में एक बार फिर बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला दिखाई दे रहा है जबकि तीसरा मोर्चा कई टुकड़ों में बिखरा हुआ दिखाई दे रहा है। बीजेपी और कांग्रेस राजस्थान में विधानसभा चुनाव में आमने-सामने हैं, जबकि समाजवादी पार्टी, लेफ्ट फ्रंट और जनता दल ने डेमोक्रेटिक फ्रंट बनाकर चुनाव लड़ने का फैसला किया है।

राजस्थान में बीजेपी-कांग्रेस के बीच मुकाबला होता दिख रहा

राजस्थान में बीजेपी-कांग्रेस के बीच मुकाबला होता दिख रहा

बसपा, आम आदमी पार्टी, भारत वाहिनी (घनश्याम तिवारी), जमीदारा पार्टी और निर्दलीय विधायक हनुमान बेनिवाल की राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी भी चुनावी जंग में अपनी-अपनी किस्मत आजमा रही हैं। चुनाव लड़ने के लिए भारत वाहिनी और राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी ने 29 अक्टूबर को हाथ मिला लिया था जबकि बसपा, आप और जमीदारा पार्टी इस गठबंधन से अलग अपने दम पर चुनाव लड़ रहे हैं।

तीसरा मोर्चा केवल कागजों पर

तीसरा मोर्चा केवल कागजों पर

सूत्रों का कहना है कि इन राजनीतिक दलों के बीच तालमेल का अभाव है और यही वजह है कि कोई मजबूत तीसरा मोर्चा बनाने में ये नाकाम रहे हैं जो बीजेपी और कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सके। हालांकि, इन राजनीतिक दलों ने निश्चित रूप से कुछ क्षेत्रों में कांग्रेस और बीजेपी उम्मीदवारों को परेशान करने का काम किया है।

वोट बैंक न होना अन्य दलों के लिए बना परेशानी का सबब

वोट बैंक न होना अन्य दलों के लिए बना परेशानी का सबब

बसपा, सीपीएम और जमीदारा पार्टी ने साल 2013 में भी चुनाव लड़ा था। वहीं, बसपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन की खबरें भी थी लेकिन बसपा सुप्रीमो ने राज्य की सभी 200 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया। इस पार्टी का राजस्थान के पूर्वी और उत्तरी भाग में काफी प्रभाव है। जहां तक डेमोक्रेटिक फ्रंट का सवाल है तो कम्युनिस्ट पार्टी और इंडिया, कम्युनिस्ट पार्टी और इंडिया (मार्क्सिस्ट), लोकतांत्रिक जनता दल, समाजवादी पार्टी का कोई अपना वोट बेस नहीं है। सीपीएम के अलावा इनमें से कोई अन्य दल का कोई खास प्रभाव नहीं नजर आता है और चुनाव एक प्रकार से ये बीजेपी और कांग्रेस के बीच की लड़ाई बनकर रह गया है। राजनीतिक विश्लेशकों की मानें तो ये दल चुनाव में जीत दर्ज करने के लिए मैदान में नहीं उतरे हैं।

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