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Nirmala Sitharaman: रुपये की गिरावट पर सरकार का क्या प्लान? वित्त मंत्री सीतारमण बोलीं- मार्केट तय करेगा स्तर

Nirmala Sitharaman: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भारतीय रुपये की लगातार रिकॉर्ड गिरावट पर बड़ा बयान देते हुए कहा कि "रुपया अपना स्तर खुद खोज लेगा"। हिंदुस्तान टाइम्स लीडरशिप समिट में बोलते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि करेंसी एक्सचेंज रेट, महंगाई और वैश्विक आर्थिक उतार-चढ़ाव जैसे मुद्दे अत्यंत संवेदनशील होते हैं और इन्हें राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।

सीतारमण ने यह भी माना कि विपक्ष में रहते हुए उनकी पार्टी ने रुपये की कमजोरी को मुद्दा बनाया था, लेकिन उस समय देश की आर्थिक परिस्थितियाँ आज की तुलना में बिल्कुल अलग थीं। जानिए वित्त मंत्री ने क्या कहा...

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"उस समय अर्थव्यवस्था नाजुक थी"-सीतारमण

सीतारमण ने कहा उस दौरान महंगाई दर बहुत ऊंची थी, अर्थव्यवस्था कमजोर थी और जब मुद्रा पर भी दबाव पड़े, तो यह किसी के लिए भी अच्छी स्थिति नहीं होती। आज भारत की अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत है, इसलिए इस बहस को वास्तविक परिस्थितियों के हिसाब से देखना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि अब भारतीय अर्थव्यवस्था की स्थिति, वैश्विक आर्थिक हालात और मजबूत मैक्रोइकनॉमिक संकेतक रुपये को संतुलित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

रुपये रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचा

3 दिसंबर (बुधवार) को रुपये ने विदेशी निवेशकों की बिकवाली और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के दबाव में 90.43 प्रति डॉलर का नया ऑल-टाइम लो छू लिया। इसके अगले दिन गुरुवार को हल्की रिकवरी देखने को मिली और रुपया 26 पैसे मजबूत होकर 89.89 पर बंद हुआ। फॉरेक्स ट्रेडर्स के अनुसार, अमेरिकी नॉन-फार्म पेरोल डेटा उम्मीद से काफी कमजोर रहा इसके चलते डॉलर इंडेक्स में गिरावट आई। डॉलर की कमजोरी ने रुपये को निचले स्तरों पर समर्थन दिया

भारत की आर्थिक मजबूती पर भरोसा

सीतारमण ने कहा कि भारत की वर्तमान स्थिति-मजबूत GDP ग्रोथ, स्थिर महंगाई नियंत्रण, बढ़ता विदेशी निवेश और वैश्विक अनिश्चितता के बावजूद मजबूत आर्थिक ढांचा-इन सभी कारणों से रुपये को लेकर नकारात्मक माहौल बनाने की जरूरत नहीं है।

उन्होंने कहा कि करेंसी की हर बहस को भारत की वर्तमान आर्थिक हकीकतों और वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप ही समझा जाना चाहिए। वित्त मंत्री ने स्पष्ट कर दिया कि सरकार रुपये को कृत्रिम रूप से मजबूत दिखाने के बजाय बाजार आधारित तंत्र पर भरोसा करेगी। रुपये की दिशा आगे भी वैश्विक बाजार, विदेशी निवेश, अमेरिकी डॉलर और कच्चे तेल की कीमतों पर निर्भर करेगी।

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