क्यों 2024 में पीएम मोदी के खिलाफ मुकाबले में विपक्ष के नेताओं पर भारी पड़ सकते हैं केजरीवाल ?

नई दिल्ली, 19 अगस्त: दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल एक बार फिर से भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार खिलाफ अपने पुराने वाले अंदाज में लौटते नजर आ रहे हैं। हालांकि, अब उनकी नीति काफी बदली हुई है। वह भाजपा सरकार से भिड़ने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे हैं, लेकिन पीएम मोदी पर सीधे और कठोर हमले से बच भी रहे हैं। उनका राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के प्रति नजरिया भी बदला हुआ है; और उन संवेदनशील मुद्दों को छेड़ने से भी बच रहे हैं, जिसे लपकने का बीजेपी को कोई मौका नहीं छोड़ेगी। उनका लक्ष्य काफी स्पष्ट लग रहा है। दो-दो बार भारी बहुमत से दिल्ली और अबकी बार पंजाब जीतने के बाद उनका मंसूबा उन्हें काफी आगे तक देखने को मजबूर कर रहा लगता है। इसकी बड़ी वजह ये भी है कि उन्हें विपक्ष में अपने मुकाबले कोई तगड़ा खिलाड़ी नजर नहीं आ रहा है।

केजरीवाल का देश में जीतने का मंसूबा काफी पुराना है

केजरीवाल का देश में जीतने का मंसूबा काफी पुराना है

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नजर एक दशक से है। वह सीधे कहें या 130 करोड़ भारतीयों को साधने के बहाने अपनी दिल में दबी हुई इच्छा जाहिर करके लोगों की भावनाओं को भांपने की कोशिश करें, यह बात 2014 से ही बार-बार जाहिर होती रही है। 2014 में कांग्रेस की समर्थन वाली अपनी 49 दिन पुरानी सरकार से इस्तीफा देने के बाद उन्होंने जिस तरह से लोकसभा चुनावों में देश के सैकड़ों लोकसभा क्षेत्र से आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार उतारे उससे उनके इरादे बाहर आ चुके थे। भ्रष्टाचार विरोधी जनलोकपाल बिल की हवा बनाकर उन्होंने राजनीति शुरू की थी। वह यहीं तक नहीं रुके। वह खुद भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने के लिए वाराणसी पहुंच गए। हालांकि, तब उनकी लुटिया पूरी तरह से डूब गई थी। सिर्फ पंजाब में पार्टी को कुछ सफलता मिली। दिल्ली में तो सात की सात सीटें भाजपा जीत गई। मोदी-लहर में मिली इस परायज ने आम आदमी पार्टी के संयोजक को सियासी तौर पर तब हिला दिया दिया था।

2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने ज्यादा उम्मीदें नहीं पालीं

2019 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने ज्यादा उम्मीदें नहीं पालीं

लेकिन, अगले साल ही हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में 70 में से 67 सीटें जीतने के बाद तो केजरीवाल का सियासी घोड़ा फिर से सातवें आसमान की उड़ान भरने लगा। इसके बाद केंद्र सरकार और दिल्ली सरकार के बीच टकराव का सीधा मोर्चा ही खुल गया। जब सीबीआई ने उनके दफ्तर पर छापा डाला तो वह प्रधानमंत्री मोदी को 'कायर' और 'मनोरोगी' तक कह गए। आए दिन दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल, गृहमंत्रालय के बीच दिल्ली के कामकाज को लेकर भिड़ंत की खबरें आनी शुरू हो गईं। लेकिन, 2014 का हाल देखने के बाद 2019 में उन्होंने अपने प्रधानमंत्री बनने के मंसूबे को ठंडे बस्ते में ही रखना बेहतर समझा। पीएम मोदी की केंद्र में दोबारा सरकार बनी। पहले से कहीं ज्यादा विशाल बहुमत से बनी। दिल्ली की लोकसभा सीटों पर भाजपा का स्ट्राइक रेट फिर से 100% रहा। केजरीवाल और आम आदमी पार्टी की किस्मत में इस बार भी शून्य बटे सन्नाटा ही लिखा था।

पंजाब जीतने के बाद फिर से हौसले बुलंद हैं

पंजाब जीतने के बाद फिर से हौसले बुलंद हैं

उनको इतनी बात समझ में आ गई कि सिर्फ कांग्रेस के वोट के भरोसे वह प्रधानमंत्री मोदी की अगुवाई वाली बीजेपी को टक्कर नहीं दे सकते। उन्हें लगा कि जबतक भाजपा के समर्थक मध्य वर्ग को नहीं लुभाएंगे, मोदी को टक्कर देना मुश्किल है। इसके लिए उनके कोर समर्थक 'हिंदुत्व' का दिल पिघलाना जरूरी है। लेकिन,वह जानते हैं कि ऐसा प्रधानमंत्री पर सीधा हमला करके कभी संभव नहीं है। 2020 के दिल्ली चुनाव और इस साल पंजाब में उन्होंने अपनी यही रणनीति बरकरार रखी और सिर्फ अपने लोकलुभावन नारों-वादों के दम पर चुनाव लड़ा। उन्हें इसका फायदा मिला। गोवा में भी पार्टी को दो सीटें मिल गईं। इसके बाद हाल के दिनों में उन्होंने जो संकेत दिए हैं, उससे लगता है कि वह फिर अपने 2014 वाले मंसूबे को कामयाब बनाने की काम पर लग चुके हैं।

अब 130 करोड़ भारतीयों की बात करने लगे हैं

अब 130 करोड़ भारतीयों की बात करने लगे हैं

वैसे तो वह सीधे से पीएम पद पर दावेदारी से इनकार करते हैं। चाहे 2020 का दिल्ली दंगा हो या इस साल अतिक्रमण हटाओ मुहिम के बाद भड़की हिंसा, उन्होंने अपनी ओर से यही कोशिश की है कि वह किसी भी तरह के ध्रुवीकरण से खुद को बचाए रखें। अब उन्हें लगने लगा है कि 2024 में भाजपा के लिए मामला उतना आसान नहीं रहने वाला है। क्योंकि, उसे 10 साल की एंटी-इंकंबेंसी का भी सामना करना है। तो उन्होंने खुद की छवि राष्ट्रवादी, देशभक्त वाली दिखानी शुरू कर दी है। अभी उनकी तस्वीर खूब वायरल हुई थी, जिसमें वह काफी कर्मकांडी हिंदू नजर आ रहे थे। वह सिर्फ अपनी चाल-ढाल से नहीं, बल्कि औपचारिक तौर पर भी ऐसी ख्वाहिश जताने लगे हैं। 17 अगस्त को उनकी दिल की ख्वाहिश इशारों में जुबान के जरिए बाहर आ ही गई। उन्होंने कहा, 'हमें एक बार फिर भारत को दुनिया का नंबर 1 देश बनाना है। हमें फिर से भारत को महान बनाना है। हम आज 'मेक इंडिया नंबर 1' नाम के एक राष्ट्रीय मिशन की शुरुआत कर रहे हैं। इस देश के प्रत्येक नागरिक को, 130 करोड़ लोगों को इस मिशन से जोड़ना है। ' उन्होंने साथ ही पूरे भारत को मुफ्त शिक्षा और फ्री हेल्थकेयर देने का भी वादा कर दिया। लेकिन, अब उनके अंदाज में भी फिर से तब्दीली आ चुकी है।

भाजपा से मुकाबले के लिए जोखिम भी ले रहे हैं केजरीवाल

भाजपा से मुकाबले के लिए जोखिम भी ले रहे हैं केजरीवाल

केजरीवाल को पता है कि प्रधानमंत्री ने हाल में मुफ्त रेवड़ी बांटने की कोशिशों के खिलाफ जमकर आवाज उठाई है। लेकिन, आम आदमी पार्टी के संयोजक उसे (मुफ्त बिजली-पानी-किराया) रेवड़ी नहीं, बल्कि क्लाणकारी उपाय साबित करने में लग गए हैं। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी कहा है कि शिक्षा और स्वास्थ्य जनता को उलब्ध करवाना कभी रेवड़ी नहीं है। लेकिन, केजरीवाल इसे ऐसे पेश करने में लग गए हैं, जैसे भाजपा की सरकार ये सब भी खत्म करने की मंशा रखती है। इतना ही नहीं वे बीजेपी पर अपने कथित अमीर मित्रों को रेवड़ी बांटने के आरोप लगाने से भी नहीं चूक रहे हैं। वो केंद्र पर दिल्ली सरकार को उसका टैक्स वाला हिस्सा नहीं देने का आरोप लगाते हुए कह चुके हैं कि इन पैसों से बीजेपी सरकार अपने अरबपति कॉर्पोरेट मित्रों का कर्ज माफ कर रही है। वह मोदी-शाह के गढ़ गुजरात में जाकर भी लोकलुभावन वादे कर आए हैं। लेकिन, बिलकिस बानो जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी वह चुप ही रहना बेहतर समझते हैं। क्योंकि, उन्हें अंदाजा है कि दोषियों की रिहाई के खिलाफ बोलना गुजरात में हाथ जलाने से कम नहीं होगा। लेकिन, इसकी वजह से उनके एक कोर वोटर बेस में अविश्वसनीयता का संकट खड़ा होने का भी खतरा है। रोहिंग्या शरणार्थियों के मुद्दे पर भी वह बीजेपी को घेरने की कोशिश कर चुके हैं।

भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उनके सुर अब बदल गए हैं

भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उनके सुर अब बदल गए हैं

इस बीच शुक्रवार को दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के घर पर एक्साइज नीति में भ्रष्टाचार के मामले में सीबीआई की ओर से हुई छापेमारी ने भाजपा-आम आदमी पार्टी के बीच टकराव को और बढ़ा दिया है। उनके मंत्री सत्येंद्र जैन को प्रवर्तन निदेशालय मनी लॉन्ड्रिंग केस में पहले ही उठाकर जेल में डलवा चुकी है। जब केजरीवाल सिसोदिया के बचाव में प्रेस कांफ्रेंस करने पहुंचे तो इस मौके को भी उन्होंने अपने मूल लक्ष्य के हिसाब से भुनाने की कोशिश की। फिर 130 करोड़ भारतीयों और शक्तिशाली राष्ट्र जैसे शब्द बोलकर अपना इरादा साफ कर दिया। उन्होंने मोदी सरकार पर आरोप लगाया, 'वे राष्ट्र की प्रगति नहीं चाहते हैं। मैं एक नंबर दे रहा हूं। इसे मिस्ड कॉल देने के लिए इस्तेमाल कीजिए। जो भी राष्ट्र को शक्तिशाली बनाना चाहता है, इस मिशन में शामिल हो जाए।'

विपक्ष के नेताओं पर भारी पड़ सकते हैं केजरीवाल ?

विपक्ष के नेताओं पर भारी पड़ सकते हैं केजरीवाल ?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल 2024 में विपक्ष के कितने मजबूत दावेदार हो पाएंगे, यह बात तो अभी दूर की कौड़ी है। लेकिन, कांग्रेस परंपरा के स्वयंभू दावेदार को छोड़ दें तो विपक्ष के नेताओं में आज केजरीवाल का पलड़ा एक हिसाब से भारी कहा जा सकता है। अभी तक केजरीवाल के अलावा विपक्ष के तीन मुख्य नेता कहे या अनकहे खुद को पीएम की रेस में माने बैठे हैं। ममता बनर्जी, के चंद्रशेखर राव और नीतीश कुमार। लेकिन, इन नेताओं की पकड़ अपने राज्य के अलावा कहीं है भी, यह अबतक कोई साबित नहीं कर सका है। नीतीश की दावेदारी तो बिहार में ही सवालों के घेरे में आ चुकी है। लेकिन, फिलहाल इन सारे नेताओं में पीएम मोदी से मुकाबला करने के लिए विपक्षी खेमे पर केजरीवाल इसलिए भारी माने जा सकते हैं, क्योंकि दो राज्यों में उनकी सरकार चल रही है। दिल्ली में यह उनका तीसरा कार्यकाल है। गोवा तक में उनकी पार्टी की एंट्री हो चुकी है। लेकिन, पंजाब की 13 और दिल्ली की सात लोकसभा सीटों के दम पर केजरीवाल के लिए यह दावेदारी भी कितनी मजबूत होगी, यह देखने वाली बात है। जबकि, दिल्ली ने लोकसभा चुनावों में उन्हें हर बार जीरो पर लाकर छोड़ा है। वैसे आईके गुजराल और एचडी देवगौड़ा को प्रधानमंत्री देख चुका देश, भविष्य में कुछ भी देखने के लिए तैयार हो सकता है।

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