डॉक्टर की लापरवाही की वजह से बेटी की मौत, पिता ने छह साल तक किया संघर, दो डॉक्टर के खिलाफ FIR
नई दिल्ली। महज 10 साल की मासूम बच्ची की डेंगू की वजह से मौत हो जाने के बाद पिता ने आखिरकार अपनी बेटी के लिए इंसाफ की लड़ाई लड़ने का फैसला लिया है। पिता ने दिल्ली के एक नामी गिरामी अस्पताल के दो डॉक्टरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई है। पुलिस ने डॉक्टर सुनील सरीन और डॉक्टर विवेक कुमार के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है, ये दोनों डॉक्टर शीदापुर स्थित आरएलकेसी हॉस्पिटल एंड मेट्रोल हार्ट इंस्टीट्यूट के हैं। उनके खिलाफ पुलिस ने 17 नवंबर को मामला दर्ज किया है।

2011 में हुई थी मौत
बच्ची के पिता का नाम प्रमोद कुमार चौधरी है और वह एनडीएमसी में नौकरी करते हैं। जब उन्होंने अपनी 10 साल की लड़की रितु को 21 अक्टूबर 2011 को अस्पताल में भर्ती कराया था तो उसे मामूली बुखार था। उनका कहना है कि जब मैं अस्पताल गया तो मैंने सरीन को अपनी बेटी को दिखाया, उस वक्त मेरी बेटी का प्लेटलेट्स काउंट 2.11 लाख था बावजूद इसके डॉक्टर सरीन ने कहा कि मेरी बेटी को डेंगू है, जबकि उसे मामूली वायरल बुखार था। जिसके बाद मेरी बेटी की हालत लगातार खराब होती गई, जिसके बाद मुझे बेटी को आरएमएल हॉस्पिटल ले जाना पड़ा, जहां कुछ दिनों के बाद उसकी मौत हो गई।
इलाज में हुई थी लापरवाही
वहीं मेट्रो हॉस्पिटल का कहना है कि जांच एजेंसियों ने इस मामले में जांच की है और उन्हे अस्पताल की ओर से किसी भी तरह की लापरवाही का सबूत नहीं मिला है। पुलिस ने इस मामले को दिल्ली मेडिकल काउंसिल को सौंप दिया था, जिसमे मौत की वजह के बारे में पूछा गया था। इस मामले की दिल्ली मेडिकल काउंसिल ने जांच की जिसमे यह कहा गया है कि डॉक्टर ने बच्ची का इलाज किया इसमे उन्होंने कोई लापरवाही नहीं की है।
जांच में दी गई थी क्लीन चिट
मेडिकल काउंसिल ने जो बयान जारी किया है उसमे कहा गया है कि बच्ची के पिता ने इसी तरह की शिकायत मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया में दर्ज कराई है, जिसकी जांच के बाद 11 नवंबर 2014 को मेडिकल काउंसिल ने हमारी जांच रिपोर्ट पर मुहर लगाई है। इस मामले में एनडीएमसी ने भी अपने कर्मचारी की ओर से अस्पताल के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई है, शिकायत में कहा गया है कि अस्पताल ने इलाज में अथिक पैसा लिया, अस्पताल की ओर से कुल 15000 रुपए का बिल बनाया गया था।
क्लोजर रिपोर्ट दर्ज हो गई थी
इस मामले में जांच के बाद कहा गया कि अस्पताल की ओर से सही बिल बनाया गया है, अधिक चार्ज मरीज से नहीं लिया गया, जिसके बाद क्लोजर रिपोर्ट को कोर्ट में जमा कर दिया गया। कोर्ट ने इस क्लोजर रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया, जिसपर शिकायतकर्ता ने आपत्ति नहीं जताई और उसे स्वीकार कर लिया। बयान में कहा गया है कि यहां इस बात का जिक्र करना जरूरी है कि हर वित्तीय पक्ष की जांच की गई है और इस रिपोर्ट को पुख्ता जांच पड़ताल के बाद तैयार किया गया है।
मेडकल पैनल से नाम हटाया
प्रमोद चौधरी का आरोप है कि उनकी बेटी को अस्पताल के डॉक्टर ने गलत दवा दी, आरएमएल के डॉक्टर ने खुद इस बात को माना था। उसी के आधार पर चौधरी ने मेट्रो अस्पताल के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई, लेकिन उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई और उसे क्लीन चिट दे दी गई। गलत इलाज के चलते नई दिल्ली म्युनिसिपल काउंसिल ने अस्पताल के बिल के भुगतान पर रोक लगा दी, यही नहीं मेडिकल पैनल से अस्पताल का नाम हटा दिया गया।
आरटीआई से की दवा की तुलना
जिसके बाद प्रमोद चौधरी ने तीस हजारी कोर्ट में आपराधिक मामला मुकदमा दायर किया है, जिसमे आरटीआई की कॉपी को भी संलग्न किया गया जिसमे बताया गया है कि डेंगू के इलाज में किन दवाओं का इस्तेमाल किया जाता है, इसमे बकायदा एम्स और तमाम सरकारी अस्पताल के सब्सक्रिप्शन को भी जमा किया गया है। चौधरी ने दावा किया है कि हमने आरटीआई के जरिए जो जानकारी मिली है उससे तुलना की है कि डेंगू और वायरल फीवर के इलाज में किन दवाओं को दिया जाता है। मेरी बेटी को जो दवा दी गई वह डब्ल्यूएचओ की ओर से पूरी दुनिया में प्रतिबंधित है, इसी दवा की वजह से मेरी बेटी की किडनी खराब हो गई और उसकी मौत हो गई।












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