मोदी लौटेंगे या जाएंगे? इन मुद्दों से तय होगा देश का भविष्य

नई दिल्ली- महंगाई, रोजगार या गरीबी जैसे मुद्दे शायद भारत के हर चुनाव में उठते रहे हैं। लिहाजा,इस बार भी नरेंद्र मोदी को इन मुद्दों पर विपक्ष के सवालों का जवाब देना होगा। लेकिन, इनके अलावा भी कई ऐसे विषय हैं, जो आने वाले चुनावों में निर्णायक साबित होने जा रहे हैं। आइए इस लेख में हम उन चुनिंदा मुद्दों पर ध्यान देने की कोशिश करते हैं, जो नरेंद्र मोदी की सत्ता में वापसी या विदाई का रास्ता तय करने वाला है।

राष्ट्रीय सुरक्षा

राष्ट्रीय सुरक्षा

राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा 1990 के बाद से किसी न किसी रूप में भारतीय चुनाव को प्रभावित करता रहा है। पुलवामा हमले और उसके बाद पाकिस्तान में एयरस्ट्राइक के कारण यह मुद्दा इस बार के चुनाव में सबसे बड़ा विषय रहने वाला है। कम से कम बीजेपी की ओर से तो इसे जोर-शोर से उठाने की कोशिश होगी ही। राष्ट्रीय सुरक्षा और राष्ट्रवाद ऐसा विषय है जो बीजेपी को बहुत ज्यादा सूट करता है। इस बात में दो राय नहीं कि सर्जिकल स्ट्राइक हो या एयरस्ट्राइक हर कार्रवाई के बाद हुए सर्वे में मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ बढ़ा हुआ दिखा है। लेकिन, यह विषय विपक्ष के लिए उतना सुकून वाला नहीं है और अगर इस आधार पर चुनाव हुए तो विपक्ष की परेशानी बढ़ सकती है।

मोदी बनाम अन्य

मोदी बनाम अन्य

नरेंद्र मोदी की करिश्माई छवि का ग्राफ बढ़ा है या कम हुआ है, यह बहस का विषय हो सकता है। लेकिन, इस बात में दुविधा नहीं दिखती कि आज उनकी शख्सियत वाला कोई व्यक्ति भारतीय राजनीति में दिख नहीं रहा है। यही कारण है कि यह चुनाव मोदी बनाम अन्य हो चुका है। विपक्ष जरूर दावे कर रहा है कि वादा पूरे नहीं करने के कारण मोदी की लोकप्रियता घटी है, लेकिन यह भी सच्चाई है हालिया विधानसभा चुनाव में कई लोगों ने जो बीजेपी की राज्य सरकारों से नाराज होकर वोट दिया था, वो अब मोदी की ओर फिर से लौटने लगे हैं। यही कारण है कि बीजेपी का पूरा प्रचार तंत्र मोदी के आसपास घूम रहा है और अमित शाह उसी आधार पर चुनावी गणित बिठाने की कोशिश कर रहे हैं।

भ्रष्टाचार

भ्रष्टाचार

2014 में कांग्रेस की सरकार गई थी, तो उसका सबसे बड़ा कारण दर्जनों घोटाले थे। लेकिन, मोदी ने देश की उस छवि को बदल दिया है। राहुल गांधी राफेल के मुद्दे पर जरूर उन्हें घेरने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन यह सच्चाई है कि आम जनता में मोदी की छवि आज भी बेदाग है। मोदी भ्रष्टाचार का खात्मा करना चाहते हैं, जनता में यह भावना अभी भी मौजूद है। इसका प्रमाण नोटबंदी के समय देखा जा चुका है, जब लोगों ने बहुत कष्ट सहकर भी आमतौर पर सरकार का साथ दिया था। जनता में यह आम समझ की भावना अभी भी बनी हुई है कि मोदी भ्रष्टाचार मिटाने का प्रयास कर रहे हैं और इस भावना को एक खास वर्ग को छोड़कर बाकी के मन से निकाल पाने में विपक्ष फिलहाल नाकाम लग रहा है।

सशक्त एवं प्रभावी नेतृत्व बनाम साझा नेतृत्व

सशक्त एवं प्रभावी नेतृत्व बनाम साझा नेतृत्व

बीजेपी मोदी के दमदार और सशक्त नेतृत्व के दम पर चुनाव मैदान में है। लेकिन, विपक्ष का कहना है कि मोदी तानाशाही प्रवृत्ति के हैं। बीजेपी कहती है कि विपक्ष के पास मोदी के मुकाबले में है कौन? तो विपक्ष चुनाव के बाद आपसी समझ-बूझ से अपना नेतृत्व तय कर लेने का दावा करता है। मोदी की यह छवि उनके समर्थकों की पसंद है, तो उनके विरोधी इसी को मुद्दा बनाते हैं कि मोदी अपने सामने किसी मंत्री तक को नहीं चलने देते। वैसे ये चुनाव में ही तय हो पाएगा कि आम मतदाताओं के मन में दोनों पक्षों की इस सोच के बारे में राय क्या है? क्योंकि, एयरस्ट्राइक के बाद जिस तरह से एक सर्वे में मोदी की लोकप्रियता बढ़ी हुई दिखाई गई है, उससे लगता है कि एक बड़ा वर्ग उनके दमदार और सशक्त छवि को पसंद करता है।

दलित एवं आदिवासी

दलित एवं आदिवासी

2014 में बीजेपी सत्ता में बड़ी बहुमत से आई थी, तो उसमें दलित और आदिवासी मतदाताओं का भी बहुत बड़ा योगदान था। लेकिन, रोहित बेमुला की खुदकुशी और ऊना में गोरक्षों द्वारा दलितों की पिटाई ने बीजेपी के सामने मुश्किलें खड़ी कर दीं। आगे चलकर सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से दलित उत्पीड़न कानून को कमजोर बनाने का मुद्दा उठा, जिससे दलितों के बीच में नए नेता उभर कर आ गए। धीरे-धीरे इन नेताओं ने विपक्षी दलों से तालमेल करके बीजेपी की चिंता बढ़ानी शुरू कर दी। बीजेपी सरकार ने दलितों से जुड़े हर मुद्दे को फौरन निपटाने की कोशिश की भी, लेकिन अब यह चुनाव में ही दिखेगा कि इस स्थिति का उसे कितना नुकसान होने जा रहा है।

इसी तरह आरएसएस के वनवासी कल्याण आश्रम ने आदिवासियों के बीच बीजेपी की अच्छी पैठ बना दी थी। लेकिन, छत्तीसगढ़ के चुनाव में जिस तरह से बीजेपी को ऐतिहासिक हार मिली है, उसने बीजेपी को इस वर्ग को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है। हाल में झारखंड में भी जंगल की जमीन पर आदिवासियों के हक का मामला बीजेपी के किले को खतरे में डाल सकता है।

गांव और किसान

गांव और किसान

2014 में मोदी की जीत के पीछे गांवों और किसानों का बहुत बड़ा योगदान था। लेकिन, किसानों को पूरी कमाई नहीं मिलने से उनकी मायूसी बढ़नी शुरू हो गई। नोटबंदी ने उनकी स्थिति और बिगाड़ दी। पिछले नवंबर-दिसंबर में विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने इसका पूरा फायदा उठाया और कृषि लोन माफ करने का वादा कर बीजेपी को हरा दिया। इसी कारण मोदी सरकार ने पिछले बजट में गरीब किसानों को फिक्स रकम खातों में डालने शुरू किए हैं। अब यह मरहम किसानों के गुस्से को कितना कम कर पाता है, यह तो चुनाव में ही पता चलेगा। हालांकि बीजेपी को भरोसा है कि घर-घर में शौचालय, गैस, आवास, बिजली पहुंचाकर उसने 22 करोड़ गरीबों की जिंदगी बदली है। बीजेपी इन बातों को मतदाताओं तक किस हद तक पहुंचा पाती है, इसी से उसका भविष्य तय होने जा रहा है।

ध्रुवीकरण

ध्रुवीकरण

ध्रुवीकरण ने 2014 में भी बीजेपी को फायदा पहुंचाया था। इसी का परिणाम है कि पिछले कुछ चुनावों से कांग्रेस अपनी मुस्लिमों की पक्षकार वाली छवि बदलने की कोशिश कर रही है। गुजरात चुनाव के बाद से कांग्रेस को अपने व्यवहार में काफी बदलाव लाना पड़ा है। इधर बीजेपी ऐसा कोई भी मौका छोड़ने के लिए तैयार नहीं होती है, जिससे उसे ध्रुवीकरण का फायदा न मिले। पुलवामा हमला, एयरस्ट्राइक, जम्मू-कश्मीर और एलओसी के हालात हर मुद्दे को वो अपने पक्ष में भुनाने की कोशिश करेगी। हालांकि यह जरूरी भी नहीं की हर बार यह मुद्दा बीजेपी के पक्ष में ही जाय। क्योंकि, इससे मुस्लिम मतदाताओं का बीजेपी के खिलाफ गोलबंद होने का खतरा भी बना रहता है, जिसका फायदा विपक्ष को मिलना तय है।

जातिवाद

जातिवाद

इस बात के कई प्रमाण हैं कि 2014 में मोदी लहर के कारण यूपी और बिहार जैसे राज्यों में जातिगत समीकरण धाराशायी हो गए थे। लेकिन, इसबार यह बीजेपी के पक्ष में नहीं दिख रहा है। खासकर यूपी में एसपी और बीएसपी के बीच हुआ गठबंधन उसके लिए सबसे बड़ी परेशानी का कारण बन सकता है। दलित उत्पीड़न कानून के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटने के कारण उच्च वर्ग का वोटर भी उससे नाराज हो गया था। लेकिन, गरीबों को नौकरी और शिक्षण संस्थाओं में दाखिले के लिए 10% आरक्षण देकर भाजपा ने इस नाराजगी को दूर करने की कोशिश की है। इसके अलावा हर राज्य में अपने हिसाब से जातीय समीकरणों को साधने का प्रयास भी कर रही है। लेकिन, विपक्ष की जातीय गोलबंदी को वह कितना कमजोर कर पाती है, इसी से उसके भविष्य का रास्ता तय होना है।

कल्याणकारी योजनाएं

कल्याणकारी योजनाएं

बीजेपी को मोदी सरकार की कई कल्याणकारी योजनाओं पर यकीन है, कि वह उसे वापस सत्ता दिला सकता है। इसमें उज्ज्वला, स्वच्छ भारत मिशन, पीएम-किसान, आयुष्मान भारत जैसी योजनाएं अहम हैं। लेकिन, कांग्रेस ने किसानों के लोन माफ करने और बेरोजगारों को निश्चित रकम देने जैसे वादे करके बीजेपी की परेशानियां बढ़ा रखी है। कांग्रेस के इन वादों के कारण मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में बीजेपी को हार का भी सामना करना पड़ चुका है। लेकिन, बीजेपी को भरोसा है कि उसके कारण जिन घरों की परेशानियां दूर हुई हैं, वो उसका साथ नहीं छोड़ेंगे।

सोशल मीडिया

सोशल मीडिया

2014 में मोदी की बड़ी जीत के पीछे सोशल मीडिया का बेहतर उपयोग भी माना जाता है। लेकिन, 2019 में कांग्रेस ने भी उसे अपना हथियार बना लिया है। कुल मिलाकर इस प्लेटफॉर्म पर कांटे की टक्कर चल रही है। अब तो मायावती जैसी नेता भी ट्विटर वॉर में कूद पड़ी हैं। इसलिए बीजेपी के लिए सोशल मीडिया अब एकतरफा हथियार नहीं रहा, उसे दूसरों के वार का भी सामना करना पड़ रहा है।

युवा

युवा

2014 के चुनाव में भी मोदी ने युवा मतदाताओं को रिझाने की भरपूर कोशिश की थी। वे लगातार युवाओं से जुड़े मसलों पर जोर देते आए हैं। उधर राहुल खुद को युवा नेता के तौर पर पेश करते हैं। इसबार के चुनाव में भी 6 करोड़ से ज्यादा वोटर पहली बार वोट करेंगे और करीब 1.5 करोड़ तो फर्स्ट टाइम वोटर होंगे। ये टेक्नो सेवी वोटर किसके पक्ष में जाएंगे, इसका अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल है, लेकिन ये सच्चाई है कि मोदी अब तक इन्हें बहुत ही स्मार्टली डील करते रहे हैं।

रोजगार

रोजगार

मोदी सरकार के खिलाफ रोजगार का मुद्दा विपक्ष का सबसे बड़ा हथियार है। उसका आरोप है कि 2014 में मोदी युवाओं को रोजगार देने के वादे के साथ ही सरकार में आए थे, लेकिन उन्होंने वादाखिलाफी की। ऊपर से नोटबंदी और जीएसटी ने करोड़ों लोगों से उनके रोजगार छीन लिए। हालांकि, इसके जवाब में मोदी मुद्रा लोन और उसके जरिए करोड़ों लोगों को मिलने वाले रोजगार का जिक्र करते हैं। उनका ये भी दावा है कि उन्होंने युवाओं को रोजगार मांगने वाला नहीं, रोजगार देने वाला बनाया है। ऐसे में युवाओं पर किसकी बात का असर ज्यादा पड़ता है, यह तो वही तय करेंगे।

महंगाई

महंगाई

महंगाई का मुद्दा हर चुनाव में बड़ा मुद्दा होता है। लेकिन, फिलहाल इस बार ये उतना बड़ा मुद्दा नहीं दिख रहा है। विपक्ष जरूर पेट्रोल-गैस के नाम पर इसे उठाने की कोशिश करता है, लेकिन आम जरूरतों के सामानों के दाम कंट्रोल में रहने के कारण जनता फिलहाल इसे बड़ा मुद्दा मानती नहीं दिख रही है। एक हद तक मोदी सरकार की छवि महंगाई कम रखने वाली सरकार के रूप में बनी है।

महिला

महिला

बीजेपी को भरोसा है कि मोदी सरकार में महिलाओं के लिए जो कदम उठाए गए हैं, उससे आधी आबादी उनके पक्ष में रहेगी। बीजेपी की उम्मीद का सबसे बड़ा आधार उज्ज्वला योजना में मिलने वाला मुफ्त गैस सिलेंडर है, जिसके तहत करोड़ों महिलाओं को रसोई गैस मिल चुका है। इसके अलावा रेप के गंभीर मामलों में फांसी की सजा का प्रावधान भी बीजेपी का हौसला बढ़ा रखा है।

गोरक्षा

गोरक्षा

यूपी में बीजेपी की बड़ी जीत के पीछे गोरक्षा को भी बड़ा कारण माना जाता है। लेकिन, इसने समाज के एक वर्ग में बीजेपी के खिलाफ नफरत भी पैदा की है। अब देखने वाली बात होगी कि बीजेपी गोरक्षा के वादे को निभाते हुए, इसके कारण पैदा हुए हालातों से कैसे निपटती है।

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