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MM Naravane Book Controversy के बाद रिटायर्ड अफसरों के लिए बदले जा सकते हैं नियम? सरकार लाएगी कूलिंग-ऑफ पीरियड

MM Naravane Book Controversy: पूर्व थलसेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे (M.M. Naravane) की अनपब्लिशड बॉयोग्राफि 'फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी' (Four Stars of Destiny) को लेकर मचे सियासी घमासान के बीच केंद्र सरकार एक बड़ा कदम उठाने की तैयारी में है।

रिपोर्टस के मुताबिक, केंद्र सरकार अब शीर्ष पदों और सैन्य नेतृत्व से रिटायर होने वाले अधिकारियों के लिए 'कूलिंग-ऑफ पीरियड' (Cooling-off period) की अवधि को बढ़ाने पर विचार कर रही है।

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ये नियम उन पर लागू होदा जो सत्ता के उच्च पदों खासकर सैन्य, सुरक्षा और रणनीतिक जिम्मेदारियों पर रह चुके हैं, ताकि वे रिटायरमेंट के बाद तुरंत किताब न लिख सकें। केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में यह मुद्दा प्रमुखता से उठा। अगर यह नियम लागू होता है, तो रिटायरमेंट के 20 साल बाद ही कोई अधिकारी अपने सेवाकाल के अनुभवों पर किताब लिख सकेगा।

Cabinet Meeting में क्यों उठा यह मुद्दा?

सूत्रों के अनुसार, शुक्रवार, 13 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक के आधिकारिक 27 एजेंडों में यह विषय शामिल नहीं था, लेकिन जनरल (रिटायर्ड) मनोज मुकुंद नरवणे की किताब को लेकर जारी विवाद पर मंत्रियों ने चिंता जताई।

बैठक में मौजूद मंत्रियों की राय थी कि जिन लोगों ने अत्यंत संवेदनशील पदों पर काम किया है, उनके अनुभव, फैसले और घटनाक्रम राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े हो सकते हैं। ऐसे में रिटायरमेंट के तुरंत बाद किताब लिखना देशहित के लिए जोखिम भरा हो सकता है। HT मीडिया रिपोर्टस के मुताबिक, सरकार जल्द ही इस संबंध में औपचारिक आदेश जारी कर सकती है, जिसमें 20 साल का कूलिंग-ऑफ पीरियड तय किया जाएगा।

What is Cooling-Off Period क्या है कूलिंग ऑफ पीरियड? क्यों लागू किया जाता है

'कूलिंग-ऑफ पीरियड' (Cooling-off Period) का मतलब एक अनिवार्य वेटिंग पीरियड है। जब कोई व्यक्ति किसी उच्च सरकारी पद, सैन्य नेतृत्व या संवेदनशील पोस्ट से रिटायर होता है, तो उसे एक निश्चित समय तक किसी विशेष गतिविधि (जैसे दूसरी नौकरी करना या किताब लिखना) में शामिल होने से रोका जाता है। इसी अंतराल को 'कूलिंग-ऑफ पीरियड' कहते हैं।

इसका मुख्य उद्देश्य 'हितों के टकराव' (Conflict of Interest) और 'राष्ट्रीय सुरक्षा' की रक्षा करना है। उच्च पदों पर बैठे लोगों के पास देश की सुरक्षा, विदेशी संबंधों और रणनीतिक फैसलों की बेहद गोपनीय जानकारी होती है। रिटायर होते ही अगर वे इसे सार्वजनिक कर दें, तो देश को नुकसान हो सकता है। कई बार अधिकारी रिटायर होने के तुरंत बाद उन प्राइवेट कंपनियों में ऊंचे पद ले लेते हैं, जिन्हें उन्होंने पद पर रहते हुए फायदे पहुँचाए हों। 'कूलिंग-ऑफ' इस तरह की सेटिंग को रोकता है।

फिलहाल क्या कहते हैं इसके नियम?

वर्तमान में अलग-अलग सेवाओं के लिए अलग-अलग नियम हैं। जिसमें अखिल भारतीय सेवाओं (IAS, IPS) के नियमों के अनुसार, रिटायरमेंट के एक साल के भीतर कोई भी अधिकारी सरकार की अनुमति के बिना किसी निजी व्यावसायिक संस्था में नौकरी नहीं कर सकता। यदि कोई अधिकारी इन नियमों का उल्लंघन करता है, तो सरकार उसकी पेंशन रोक सकती है या रद्द कर सकती है।

पूर्व सेना प्रमुख नरवणे की किताब क्यों बनी विवाद की जड़?

यह पूरा विवाद पूर्व सेना प्रमुख नरवणे की अप्रकाशित आत्मकथा से शुरू हुआ जिसमें उन्होंने अगस्त 2020 में पूर्वी लद्दाख के कैलाश रेंज क्षेत्र में भारत-चीन सैन्य टकराव के दौरान की घटनाओं का जिक्र किया है। किताब में यह दावा किया गया है कि उस समय सेना को राजनीतिक नेतृत्व से तत्काल स्पष्ट निर्देश नहीं मिले थे जो कि एक अत्यंत संवेदनशील विषय है। इन्हीं दावों को लेकर संसद में बीते दो हफ्तों से हंगामा चल रहा है।

संसद में एम नरवणें की किताब का मुद्दा कैसे उठा ?

2 फरवरी को लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने नरवणे की किताब का हवाला देकर सरकार पर सवाल उठाने की कोशिश की। सरकार ने कड़ा ऐतराज जताया और कहा कि किताब न तो प्रकाशित हुई है और न ही आधिकारिक रूप से सार्वजनिक की गई है। इसके बाद राहुल गांधी संसद में किताब की एक प्रति लेकर पहुंचे जिससे यह साबित किया जा सके कि यह अस्तित्व में है। कुछ ही समय बाद किताब की PDF सोशल मीडिया पर वायरल हो गई जिसने विवाद को और भड़का दिया।

पेंगुइन रैंडम हाउस इंडिया (PRHI) ने साफ कहा कि किताब अब तक प्रकाशित नहीं हुई है और जो भी इसकी कॉपी डिजिटल या प्रिंट फैलायी जा रही है वह कॉपीराइट उल्लंघन है। प्रकाशक ने कानूनी कार्रवाई की चेतावनी भी दी। इसके कुछ ही घंटों बाद दिल्ली पुलिस ने किताब के अवैध प्रसार को लेकर FIR दर्ज कर जांच शुरू कर दी।

जनरल एम.एम नरवणे ने क्या कहा?

जनरल नरवणे ने पहली बार इस विवाद पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने पब्लिशर के बयान का समर्थन करते हुए कहा कि उनकी किताब न तो प्रकाशित हुई है और न ही किसी भी रूप में सार्वजनिक की गई है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि रक्षा मंत्रालय से अभी तक किताब को अंतिम मंजूरी नहीं मिली है। दरअसल, किताब जनवरी 2024 में प्रकाशित होनी थी। दिसंबर 2023 में पीटीआई ने इसका एक अंश प्रकाशित किया था जिसमें अग्निवीर योजना से जुड़ी टिप्पणी थी। इसी के बाद रक्षा मंत्रालय ने किताब को सेना की समीक्षा और क्लीयरेंस के लिए भेजने को कहा।

अभिव्यक्ति की आजादी बनाम राष्ट्रीय सुरक्षा पर बहस

इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि क्या रिटायर्ड अधिकारियों को अपने अनुभव साझा करने की पूरी आज़ादी होनी चाहिए? या फिर राष्ट्रीय सुरक्षा, गोपनीयता और कूटनीतिक संतुलन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए? सरकार का संभावित 20 साल का कूलिंग-ऑफ नियम इसी संतुलन को साधने की कोशिश माना जा रहा है। अगर यह प्रस्ताव लागू होता है तो इसका असर सिर्फ सैन्य अधिकारियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूर्व नौकरशाहों खुफिया एजेंसियों के अधिकारी और संवेदनशील पदों पर रहे वरिष्ठ प्रशासनिक अफसर सभी पर पड़ेगा।

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