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आम चुनाव में जिस EVM पर हुआ सबसे ज्यादा बवाल, VVPAT से मिलान के अब आए असल आंकड़े

नई दिल्ली- लोकसभा चुनाव नतीजे आने के लगभग दो महीने बाद चुनाव आयोग ने जो आंकड़े जारी किए हैं, उससे ईवीएम पर सवाल उठाने वाले ही सवालों के घेरे में आ सकते हैं। चुनाव आयोग के मुताबिक बीते लोकसभा चुनाव सिर्फ 8 इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) और वोटर वेरिफियेबल पेपर ऑडिट ट्रेल (वीवीपीएटी) के नतीजों में अंतर पाया गया है।

महज 0.0004% वोटों में अंतर

महज 0.0004% वोटों में अंतर

चुनाव आयोग ने जिन 8 ईवीएम में पड़े वोट और वीवीपीएटी मशीनों की पर्चियों की गिनती में अंतर पाया है, वह देश के उन 20,687 पोलिंग स्टेशन्स के हैं, जहां सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के मुताबिक वोटों का फिजिकल वेरिफिकेशन कराने की बाध्यता थी। इकोनॉमिक्स टाइम्स के मुताबिक चुनाव आयोग के अधिकारियों ने बताया है कि वोटों और पर्चियों के मिलान में जो अंतर सामने आया है, वह महज 0.0004% है, जिससे अंतिम नतीजों पर किसी भी तरह का प्रभाव नहीं पड़ा है। चुनाव आयोग ने ये भी कहा है कि प्रथम दृष्टि में जो अंतर सामने आया भी है, उसका कारण मानवीय भूल माना जा सकता है।

सिर्फ 51 वोटों का मिलान नहीं हो पाया

सिर्फ 51 वोटों का मिलान नहीं हो पाया

लोकसभा चुनाव में जिन 8 ईवीएम और वीवीपीएटी मशीनों की गिनती में अंतर दर्ज किया गया है, वे राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय और आंध्र प्रदेश से सामने आए हैं। सबसे बड़ी बात ये है कि 8 में से ज्यादातर मशीनों में मतों का अंतर सिर्फ एक या दो वोट ही पाया गया है। सिर्फ एक मामले में यह अंतर 34 वोटों का पाया गया है और इसके पीछे भी वजह ये बताई जा रही है कि हो सकता है कि पोलिंग स्टाफ ने औपचारिक वोटिंग शुरू होने पहले पोलिंग एजेंट्स के लिए करवाए जाने वाले मॉक पोल की पर्चियां वीवीपीएटी से हटाना भूल गए हों। सबसे बड़ी बात ये है कि अगर 8 मशीनों में आए इस अंतर को मतों की संख्या के आधार पर देखें तो देशभर में सिर्फ 51 वोट ऐसे पड़े हैं, जिनका मिलान वीवीपीएटी की पर्ची से नहीं हो पाया है।

चुनाव आयोग की जांच में पहली बार अंतर सामने आया

चुनाव आयोग की जांच में पहली बार अंतर सामने आया

ऐसा पहली बार हुआ है, जब चुनाव आयोग ने 51 वोट ही सही, लेकिन इस अंतर की बात को स्वीकार किया है। 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले चुनाव आयोग ने इस तरह के 1,500 मामलों की पड़ताल की थी, लेकिन एक भी मामले में ईवीएम में पड़े वोटों और वीवीपीएटी में गिरी पर्चियों में अंतर नहीं पाया था। गौरतलब है कि 1961 के चुनाव संचालन अधिनियम के नियम 56डी (4) (बी) के तहत अगर ईवीएम के वोटों और वीवीपीएटी की पर्चियों में मिलान नहीं होता है, तो जो वीवीपीएटी की गिनती होती है, वही मान्य होता है। वोटों और पर्चियों की मिलान की यह प्रक्रिया जिला निर्वाचन अधिकारी और मुख्य निर्वाचन अधिकारी की देखरेख में पूरी की जाती है। अगर जरूरी पड़ता है, तो इसमें चुनाव आयोग के टेक्निकल एक्सपर्ट कमिटी (टीईसी) के लोगों की भी मदद ली जाती है। टीईटी के एक सदस्य रजत मूना ने इस पूरी प्रक्रिया के बारे में कहा है कि, "हम वीवीपीएटी और ईवीएम की प्रक्रिया और परफॉर्मेंस से बहुत ही खुश हैं।"

मशीन में खामी नहीं, मानवीय भूल के कारण आया अंतर

मशीन में खामी नहीं, मानवीय भूल के कारण आया अंतर

पूरी छानबीन के बाद चुनाव आयोग इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि वीवीपीएटी और ईवीएम की गिनती में कोई तकनीकी अंतर नहीं पाया गया है। जो भी थोड़े-बहुत अंतर सामने आए हैं, उसका कारण भी मानवीय भूल रहा है। इसका कारण मॉक पोल डाटा को ईवीएम से नहीं हटाना या वीवीपीएटी में ही मॉक पोल की पर्ची छोड़ दिया जाना रहा है। मूना ने यहां तक कहा है कि कुछ मामलों में हाथ से पर्चियों की गिनती में भी गलतियां हुई हैं। मसलन वीवीपीएटी से चिपकी हुई पर्ची को बिना गिने ही छोड़ दिया गया है। कुल मिलाकर जो भी खामियां सामने आई हैं, वह बहुत ही सामान्य सी हैं, इसलिए चुनाव आयोग के मुताबिक ईवीएम और वीवीपीएटी से चुनाव कराने की प्रक्रिया बहुत ही संतोषजनक साबित हुआ है।

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