नई सरकार की 'कड़वी दवा' से बढ़ सकता है बिजली का बिल

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नई दिल्ली। नई सरकार की कड़वी दवा भले ही एक रोग को ठीक कर दे पर कई रोगाें का इलाज कैसे होगा, इस पर ना तो विचार हुआ है और ना ही विमर्श। रेल माल भाड़े में 6.5 पर्सेंट की बढ़ोतरी के बाद पावर टैरिफ कम से कम 7 पैसे प्रति यूनिट बढ़ सकते हैं।

ऊर्जा उत्पादकों का कहना है कि कोल ट्रांसपोर्टेशन पर उन्हें ज्यादा खर्च करना पड़ेगा और इस वजह से बिजली कीमत बढ़ना तय है। देश के ज्यादातर पावर प्लांट्स अपने मुख्य रॉ मैटीरियल कोल की सप्लाई के लिए रेलवे पर निर्भर करते हैं।

देश की सबसे बड़ी पावर प्रड्यूसर एनटीपीसी के एक सूत्र ने बताया कि 'रेलवे फ्रेट का पावर प्राइसेज पर बड़ा असर पड़ेगा। हर बार फ्रेट बढ़ने पर जनरेशन कॉस्ट में इजाफा होता है। इससे रेलवे की ओर से पावर कंपनियों को दी जाने वाली कॉस्ट बढ़ जाती है।'

500-1,000 यूनिट की खपत करने वाले एक औसत कंज्यूमर के लिए बिल प्रतिमाह लगभग 70 रुपये बढ़ सकता है, लेकिन जनरेशन कॉस्ट में छोटी बढ़ोतरियां वर्ष के दौरान कई कारणों से होती रहती हैं।

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एनटीपीसी जैसी पावर जनरेशन कंपनियां दावा करती हैं कि कोल प्राइस चढ़ने, फ्रेट चार्जेज और राज्य सरकारों की ओर से रॉयल्टी वसूलने की वजह से उन्हें पावर प्राइस बढ़ाना पड़ता है। हालांकि नई सरकार को उम्मीद ही नहीं, पूरा यकीन है कि यह कड़वी दवा देशवासियों के लिए पैदा हुआ महंगाई कैंसर जड़ से मिटा देगी।

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