बेरोज़गारी: कैसे बढ़ेंगी नौकरियां और क्या कर सकते हैं नौकरी चाहने वाले

हाल ही में केंद्र सरकार ने संसद में बताया कि अप्रैल 2014 से मार्च 2022 के बीच आठ सालों में विभिन्न केंद्र सरकार के विभागों में स्थायी नौकरी पाने के लिए क़रीब 22 करोड़ लोगों ने आवेदन किया.

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इसी अवधि में जिन लोगों को अंततः केंद्र सरकार में स्थायी नौकरी मिली उनकी संख्या क़रीब 7.22 लाख थी.

आसान शब्दों में कहा जाए तो जितने लोगों ने नौकरी के लिए आवेदन किया उसमें से केवल 0.32 प्रतिशत लोगों को नौकरी मिली.

भारत में बेरोज़गारी से बनी स्थिति का ये सिर्फ एक उदाहरण है.

वर्ष 2020 और 2021 में कोविड-19 महामारी की वजह से लाखों-करोड़ों लोगों की नौकरियां गईं. महामारी की वजह से लगे प्रतिबंधों के चलते कई सरकारी भर्तियों पर भी असर पड़ा. इस सब का मिला-जुला नतीजा ये था कि भारत के कई राज्यों में बेरोज़गार लोगों की संख्या में उछाल आता दिखाई दिया.

सेंटर फॉर मॉनिटरिंग ऑफ़ इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) के मुताबिक कोविड-19 महामारी की वजह से देश भर में लगे पहले लॉकडाउन की वजह से करीब 12 करोड़ लोगों की नौकरियां गईं. सीएमआईई ने अपने शोध में ये भी पाया कि 2021 में कोविड-19 की दूसरी लहर के दौरान एक करोड़ भारतीयों ने नौकरी गँवाई.

शहरों में क्यों बढ़ रही है बेरोज़गारी?

हाल ही में सीएमआईई ने कुछ आंकड़े जारी किए जिनके मुताबिक जुलाई के महीने में भारत की बेरोज़गारी दर गिरकर 6.80 फ़ीसद हो गई जो पिछले छह महीनों में सबसे निचले स्तर पर थी.

सीएमआईई के आंकड़ों में कहा गया कि जुलाई में बेरोज़गारी दर घटकर 6.80 फ़ीसद रह गई जो जून में 7.80 फ़ीसद थी. मानसून के दौरान बढ़ती कृषि क्षेत्र की गतिविधियों को जुलाई में बेरोज़गारी घटने की एक बड़ी वजह माना गया.

इन आंकड़ों से पता लगा कि जहाँ भारत में एक तरफ ग्रामीण बेरोज़गारी घटी, वहीं दूसरी तरफ शहरी बेरोज़गारी में बढ़ोतरी देखी गई जिसका मुख्य कारण उद्योग और सेवा क्षेत्रों में नौकरियों की घटती संख्या को माना गया.

ऐसी स्थिति में बेरोज़गारी से जूझते लोग ही समझ सकते हैं कि रोज़गार ढूंढना कितना मुश्किल काम हो सकता है.

सरकार ने किया सीएमआईई के आंकड़ों का खंडन

सीएमआईई के बेरोज़गारी पर जारी किए आंकड़ों का केंद्र सरकार खंडन करती रही है. 28 जुलाई को राज्य सभा में दिए एक जवाब में केंद्र सरकार ने कहा कि सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा करवाए गए पीरिऑडिक लेबर फ़ोर्स सर्वे या आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण के मुताबिक भारत की बेरोज़गारी दर में गिरावट आई है.

सरकार ने कहा कि रोज़गार सृजन के साथ रोज़गार क्षमता में सुधार सरकार की प्राथमिकता है और केंद्र सरकार ने देश में रोज़गार पैदा करने के लिए विभिन्न कदम उठाये हैं और कई योजनाएं शुरू की हैं.

हमने कुछ ऐसी ही योजनाओं पर नज़र डाली जो सरकार के मुताबिक नौकरी के उम्मीदवारों के लिए फायदेमंद साबित हो रही हैं.

1. नेशनल करियर सर्विस पोर्टल

नेशनल करियर सर्विस या राष्ट्रीय करियर सेवा पोर्टल (https://www.ncs.gov.in) श्रम और रोज़गार मंत्रालय चलता है.

यह पोर्टल रोज़गार से संबंधित सेवाएं जैसे जॉब मैचिंग, करियर काउंसलिंग, व्यावसायिक मार्गदर्शन, कौशल विकास पाठ्यक्रमों की जानकारी, इंटर्नशिप आदि प्रदान करता है. इस पोर्टल पर उपलब्ध सभी सेवाएं नौकरी चाहने वालों, नियोक्ताओं, प्रशिक्षण प्रदाताओं और प्लेसमेंट संगठनों के लिए निःशुल्क हैं.

इस पोर्टल पर लॉग-इन करके सरकारी और निजी क्षेत्र की नौकरियों के आवेदन किया जा सकता है. साथ ही इस पोर्टल के ज़रिए आयोजित किए जाने वाले रोज़गार मेलों में भी हिस्सा लिया जा सकता है.

सरकार के मुताबिक एनसीएस पोर्टल पर अब तक 94 लाख से अधिक रिक्तियां जुटाई जा चुकी हैं और इसके अलावा इस योजना के तहत आयोजित रोज़गार मेलों के माध्यम से 2 लाख से अधिक नौकरी चाहने वालों को रोज़गार मिला है.

2. दीन दयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल्य योजना

केंद्र सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा चलायी जा रही इस योजना का उद्देश्य ग्रामीण युवाओं को कौशल प्रदान करके उन्हें नियमित मासिक मजदूरी या न्यूनतम मजदूरी से ऊपर की नौकरी दिलवाना है.

इस योजना के तहत चलाये जा रहे प्रशिक्षण कार्यक्रमों का लाभ 15 से 35 वर्ष की आयु तक के लोग उठा सकते हैं. महिलाओं और अन्य कमज़ोर समूहों जैसे विकलांग व्यक्तियों के लिए ऊपरी आयु सीमा 45 वर्ष तय की गई है.

नौकरी तलाश रहे लोग न केवल परामर्श और मार्गदर्शन प्राप्त कर सकते हैं बल्कि ये भी पता लगा सकते हैं कि वो किस तरह के काम करने के लिए उपयुक्त हैं. इसके बाद वे अपनी योग्यता के आधार पर किसी ट्रेड के लिए चुने जा सकते हैं.

सरकार का कहना है कि कार बनाने वाले वेल्डर से लेकर प्रीमियम शर्ट बेचने वाले सेल्स पर्सन से लेकर कंप्यूटर पर काम करने वाले बैक-ऑफिस पेशेवर 550 से अधिक तरह के कामों में से अपने लिए उपयुक्त काम ढूंढ सकते हैं.

योजना के तहत सरकारी प्रशिक्षण केंद्रों में नए कौशल सीखने के बाद नौकरी के इच्छुक लोग सरकारी मान्यता प्राप्त कौशल प्रमाणपत्र अर्जित कर सकते हैं.

इस योजना का लाभ उठाने के लिए आपको अपनी ग्राम पंचायत या ग्राम रोज़गार सेवक के साथ नामांकन करना होगा. ग्राम रोज़गार सेवक पास के प्रशिक्षण केंद्र के मोबिलाइजेशन स्टाफ को आपसे मिलने की सिफारिश करेगा और आपको परामर्श और मार्गदर्शन देगा.

आवेदक https://kaushalpanjee.nic.in/ पर भी रजिस्टर कर सकते हैं.

3. प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (पीएमएमवाई)

सरकार की ओर से लागू की जा रही एक अन्य प्रमुख योजना प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (पीएमएमवाई) है जिसका उद्देश्य स्वरोज़गार की सुविधा प्रदान करना है.

इस योजना के तहत 10 लाख रुपये तक के कोलैटरल-फ्ऱी लोन (यानी ऐसा लोन जिसमें किसी गारंटी की ज़रूरत नहीं होती) सूक्ष्म और लघु व्यवसाय उद्यमों और व्यक्तियों को दिए जाते हैं ताकि वे अपनी व्यावसायिक गतिविधियों को स्थापित या विस्तारित किया जा सके. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस योजना के तहत 8 जुलाई 2022 तक क़रीब 36 करोड़ कर्ज मंजूर किए गए.

इस योजना के तहत दिए जाने वाले लोन कॉमर्शियल बैंक, रीजनल रूरल बैंक, लघु वित्त बैंक, माइक्रो-फाइनेंस इंस्टीटूशन, और नॉन-बैंकिंग फिनांशियल कंपनियों के द्वारा दिए जाते हैं.

लोन लेने के इच्छुक लोग या तो ऊपर बताई गई संस्थाओं से सीधे संपर्क कर सकते हैं या www.udyamimitra.in पोर्टल पर ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं.

चालू वित्त वर्ष 2022-2023 के दौरान 1.31 करोड़ लोन मंज़ूर किए गए हैं. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस वित्तीय वर्ष में कुल मंज़ूर किए गए 91,115 करोड़ रुपये के लोन में से 85,817 करोड़ रुपये के लोन वितरित किए जा चुके हैं.

सरकारी रिक्तियों की भरमार?

जुलाई के महीने में सरकार ने संसद में बताया कि 1 मार्च 2021 तक 40.35 लाख की स्वीकृत संख्या के मुक़ाबले केंद्र सरकार के विभागों में लगभग 9.79 लाख रिक्त पद थे. ये रिक्त पद ग्रुप ए, बी और सी के पदों के थे.

हाल ही में सरकार ने संसद में बताया कि तीनो सशस्त्र बलों में हर साल औसतन 60,000 रिक्तियां होती हैं जिनमें से क़रीब 50,000 रिक्तियां थल सेना में होती हैं. सरकार ने यह भी कहा कि पिछले दो वर्षों में कोविड-19 के कारण भर्ती रैलियों के निलंबन के कारण भारतीय सेना में क़रीब 1 लाख से अधिक जवानों की कमी है.

पिछले कुछ महीनों में सैंकड़ों सरकारी रिक्तियों का न भरा जाना भी एक चर्चा का विषय रहा है. इस साल फ़रवरी में रेलवे भर्ती बोर्ड की चयन प्रक्रिया को लेकर हज़ारों युवाओं का हिंसक विरोध हुआ.

जून के महीने में एक ऐसा मामला सामने आया जो चौंकाने वाला था.

आंध्र प्रदेश में साल 1998 में सरकारी स्कूल टीचरों की भर्ती की जो प्रक्रिया शुरू हुई वो 22 साल बाद इस साल जून के महीने में पूरी हुई जब परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले उम्मीदवारों को उनकी नियुक्ति के पत्र मिले. ये पत्र पाने वाले बहुत से लोग अब सेवानिवृति के क़रीब हैं.

जून के महीने में ही सशस्त्र बलों के लिए केंद्र सरकार की नई भर्ती योजना अग्निपथ को देश के कई हिस्सों में भारी विरोध का सामना करना पड़ा, प्रदर्शनकारियों ने ट्रेनों में आग लगा दी और रेलवे पटरियों को अवरुद्ध कर दिया.

14 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने घोषणा की कि उनकी सरकार अगले 18 महीनों के भीतर "मिशन मोड" में 10 लाख कर्मियों की भर्ती करेगी.

प्रोफ़ेसर रवि श्रीवास्तव दिल्ली स्थित इंस्टिट्यूट ऑफ़ ह्यूमन डेवलपमेंट के सेंटर फॉर एम्प्लॉयमेंट स्टडीज़ के निदेशक हैं.

वे कहते हैं, "सरकारी नौकरियों में रिक्त पदों को भरने को लेकर केंद्र और राज्य सरकारें खूब बोलती रही हैं. लेकिन अभी तक वो ज़्यादा कुछ नहीं कर पाई हैं. इसका मुख्य कारण यह है कि सरकार सभी स्तरों पर कॉन्ट्रैक्ट या अनुबंध के रूप में लोगों नौकरियों दे रही है. लंबे समय से स्थाई रिक्तियों को नहीं भरा जा रहा है. मिसाल के तौर पर सशस्त्र बलों में नौकरियों का क्या हो रहा है?"

वे कहते हैं कि मूल रूप से पेंशन और अन्य लाभों के भार को कम करने के लिए सरकार सशस्त्र बलों में कॉन्ट्रैक्ट की नौकरियों की शुरुआत कर रही है. "स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में भी यही हो रहा है. सरकारी क्षेत्र में भरी जा रही स्थायी रिक्तियों की संख्या बहुत कम है."

कौशल विकास और नौकरियां

केंद्र सरकार समय समय पर कौशल विकास के लिए चलायी जा रही योजनाओं की बात करती रही है. लेकिन क्या कौशल विकास से नौकरियां मिलने में आसानी हुई है?

प्रोफ़ेसर श्रीवास्तव का कहना है कि अक्सर ये देखा गया है कि कौशल विकास से जुड़ी योजनाएं लोगों को नौकरियां दिलाने में बहुत सफल नहीं हुई.

वे कहते हैं, "उदाहरण के लिए परिधान बनाने वाली कंपनियां अपने कर्मियों के लिए कौशल विकास की योजनाएं चला रही हैं और सरकार द्वारा प्रदान की जाने वाली कुछ सब्सिडी का उपयोग कर पाती हैं. फिर वे लोगों को अपनी परिधान फर्मों में रोज़गार देते हैं. लेकिन उनके द्वारा सृजित नौकरियों की गुणवत्ता बहुत अच्छी नहीं है."

प्रोफ़ेसर श्रीवास्तव के मुताबिक इसका कारण यह है कि केवल कुशल लोगों का एक पूल बना लेना काफी नहीं है.

वे कहते हैं, "जब तक आप श्रम बाज़ार के बारे में कुछ नहीं करते हैं और जब तक आप श्रम बाज़ार में उन कुशल नौकरियों को प्रीमियम के साथ प्रदान नहीं करते हैं, लोगों को अच्छी नौकरियां नहीं मिलती हैं. इसलिए आदिवासी महिलाएं बुनकर के रूप में प्रशिक्षित होने में छह महीने लगाती हैं लेकिन बाद में वे बैंगलोर या दिल्ली में किसी परिधान बनाने वाली कंपनी में न्यूनतम मजदूरी पर ही काम कर पाती हैं."

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कैसे बढ़ेंगी नौकरियां?

प्रोफ़ेसर श्रीवास्तव कहते हैं कि देश में नौकरियों को बढ़ाने के लिए सरकार कि समग्र रणनीति लेबर-इंटेंसिव या श्रम-प्रधान होनी चाहिए. वे कहते हैं, "हमें श्रम प्रधान रणनीति को आक्रामक रूप से आगे बढ़ाना होगा.

इसका मतलब है कि पूँजी को सब्सिडी देने के बजाय श्रम-रोज़गार को सब्सिडी दी जाय. उदाहरण के लिए केंद्र की प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम विकास को बढ़ावा देने के नाम पर पूँजी को सब्सिडी देती है. अगर आप रोज़गार को बढ़ावा देना चाहते हैं तो इस तरह की योजना काम नहीं करेगी."

घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने और आयात बिलों में कटौती करने के लिए केंद्र सरकार ने साल 2020 में प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव स्कीम शुरू की जिसका उद्देश्य घरेलू इकाइयों में निर्मित उत्पादों से बढ़ती बिक्री पर कंपनियों को प्रोत्साहन देना है.

साथ ही विदेशी कंपनियों को भारत में दुकान स्थापित करने के लिए आमंत्रित करने के अलावा इस योजना का उद्देश्य स्थानीय कंपनियों को मौजूदा मैन्युफैक्चरिंग इकाइयों की स्थापना या विस्तार के लिए प्रोत्साहित करना भी है.

प्रोफ़ेसर श्रीवास्तव का मानना है कि नौकरियों को बढ़ावा देने के लिए सरकार को एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम) क्षेत्र पर ध्यान केंद्रित करना होगा और ये सुनिश्चित करना होगा कि उनके विकास को सुविधाजनक बनाया जाए. उनके मुताबिक सरकार को ये पता लगाना होगा कि सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों को आगे बढ़ने में क्या रुकावटें हैं और उन रुकावटों को दूर करने में उनकी मदद करनी होगी.

वे कहते हैं, "अगर आप बहुत छोटे उत्पादकों की उत्पादकता बढ़ाते हैं तो यह न केवल रोज़गार बढ़ाता है बल्कि आय भी बढ़ाता है. भारत में काम करने वाले बहुत से लोग पर्याप्त नहीं कमाते हैं. आपके पास एक ऐसी रणनीति होनी चाहिए जो छोटे उद्योग को नापसंद न करे, बल्कि उन्हें बढ़ने में मदद करें."

प्रोफ़ेसर श्रीवास्तव का कहना है कि डीमॉनेटाइज़ेशन, जीएसटी और महामारी के असर सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों पर नकारात्मक और संगठित क्षेत्र की बड़ी कंपनियों के लिए सकारात्मक रहा है.

जानकारों का कहना है कि करीब 20 प्रतिशत नौकरियां ही संगठित क्षेत्र से आती हैं जबकि अस्सी प्रतिशत नौकरियां असंगठित क्षेत्र से आती हैं.

श्रीवास्तव के मुताबिक पिछले 7-8 वर्षों में उत्पादन और लाभ इन बहुत बड़ी फर्मों के पक्ष में स्थानांतरित हो गए हैं. "लेकिन इन फर्मों के पास उन सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों की तुलना में रोज़गार पैदा करने की क्षमता बहुत कम है जिन्होंने बाज़ार में अपना हिस्सा खो दिया है. यही मुख्य कारण है कि जॉब स्पेस का विस्तार नहीं हो रहा है."

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