गणेश जी के देश में रेल पटरियां पर कटते हाथी
नई दिल्ली(विवेक शुक्ला) रेल की पटरियां पर हाथियों का खून बह रहा। इसको लेकर सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय से पूछा है कि वे इन हाथियों के रेल पटरियों पर कटने को रोकने के लिए क्या उपाय कर रहा है। दरअसल गजराज का रेल पटरियों पर कटने का सिलसिला बदस्तूर जारी है।

अगर बात 1987 से करें तो अब तक 300 हाथियों को रेल ने कुचला। इस दौरान हजारों दूसरे जंगली जानवर भी हादसों के शिकार हुए। इनका कटना अखबारों की सुर्खियां नहीं बनता।
मतलब रेल हादसों के कारण हाथी और दूसरे जानवर जान गंवा रहे हैं। हाथियों को भारत में विरासत के जानवर घोषित किया जा चुका है और यहां तक कि भारतीय रेल का शुभंकर भी एक हाथी (भोलू) ही है।
इस आलोक में हाथियों का रेलों से कटना खलता है। यही नहीं, बहुत सारे सवाल भी छोड़ जाता है।
एलीफेंट कॉरिडोर के बावजूद हादसे
हाथी अनेक राज्यों में कट रहे हैं। ये सिलसिला कब थमेगा,कोई नहीं जानता। भारत में 78 एलिफेंट कॉरिडोर की पहचान की गई है। इनमें से 40 नेशनल हाइवे पर हैं, 20 रेल ट्रेक पर और 18 दोनों पर है।
इनके अलावा भी सैकड़ों किलोमीटर लंबे रेल और सड़क मार्ग है,जिनके इर्द-गिर्द वन्यजीव रहते हैं। तो हादसों को किस तरह से रोका जाए ? जाहिर है, चुनौती बड़ी है।
रेल और वन विभाग को अभ्यारण्यों के भीतर रेल लाइनों को हटाए बिना बात नहीं बनेगी। इसके अलावा उन जगहों की तलाश करनी होगी जिधर हादसे हुए हैं या हो सकते हैं।
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के सर्वे में सच आया सामने
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ ने ट्रेनों की टक्कर से हाथियों की मौत की वजहों का पता लगाने के लिए एक सर्वेक्षण किया। रिपोर्ट में कहा गया कि 33 फीसदी हादसे सुबह, 42 फीसदी शाम और 17 फीसदी आधी रात के बाद हुए।
इसमें उन रेलों की रफ्तार कम करने की सिफारिश की गई,जो अभ्यारण्यों के बीच से गुजरती हैं। हाथियों को बचाने के लिए सतर्कता बढ़ाने की बात कही गई।
मीटर गेज ट्रैक भी हैं जिम्मेदार
इसके अलावा, उन अभ्यारण्यों के तीखे मोड़ों को ठीक करने की जरूरत है,जिधर रेल के अचानक आने से हाथी या दूसरे जानवर कट जाते हैं। तीखे मोड़ों के आसपास घनी झाडिय़ों को समय-समय पर काटा भी जा सकता है।
हां, रेलों की रफ्तार के कारण भी हादसे होते हैं। हालांकि इस लिहाज से एक राय यह भी है कि रेल की रफ्तार पर नियंत्रण का लाभ तब ही है,जब अभ्यारण्यों से गुजरने वाली रेल लाइन छोटी हो।
उदाहरण के रूप में कुछ समय पहले बहरमपुर में रेल लाइन 11 किलोमीटर लंबी है, तो झारखंड के पलामू टाइगर रिजर्व के भीतर से आठ किलोमीटर लंबी लाइन गुजरती है। पर उत्तर बंगाल में बुक्सा टाइगर रिजर्व 100 किलोमीटर में फैला है।
इतने लंबे मार्ग पर रेल की गति घटाना कितना मुमकिन है, यह कहना मुश्किल है। बहरहाल, हाथियों को केन्या और दक्षिण अफ्रीका में रेल हादसों से बचाने के लिए अंडरपास का सहारा लिया जा रहा है।
दक्षिण अफ्रीका से सीख लेने की जरूरत
इनमें बने अभ्यारण्य सामान्य हाइवे अंडरपास की तुलना में दो गुना बड़े हैं। इनका डिजाइन इस तरह से तैयार किया गया है,जिससे कि तीन हाथी एक साथ चल सकते ।
इस पहल के अपेक्षित नतीजे सामने आए हैं। दक्षिण अफ्रीका क्वाजुलू नटाल प्रांत में स्थित अभ्यारण्य में पहले अंडरपास बना। पर्यावरणविद् डा. अनिल कुमार सिंह कहते हैं जिधर हाथी कटते हैं,उन्हें दोनों तरफ से कवर भी किया जा सकता है। ऐसा करने के फलस्वरूप भी हादसे रूक सकते हैं।
अंडरपास भी बड़ा विकल्प हो सकता है। उत्तर प्रदेश के दुधवा नेशनल पार्क को ही लें तो 1978 में इसकी स्थापना के समय से ही कहा जा रहा है कि पार्क के अन्दर और इसके इर्द-गिर्द बसे लोगों को हटाया जाये तभी यहां के बाघ और हाथी जैसे जंगली जानवरों को बचाया जा सकता है।
हाइटेंशन तारों को क्यों नहीं हटाते
हाथियों और बाघों के संरक्षण के लिये बनाये गये तमाम परियोजनाओं में इस बात पर खास जोर दिया जाता है कि संबंधित वनक्षेत्रों से वहां बसे लोगों को हटा दिया जाये, तभी वन्य प्राणियों को बचाया जा सकेगा।
अगर ऐसा हो भी जाता है तो जंगलों के अंधाधुंध कटान के कारण ये जीव बिजली की तारों और जंगल में सरपट दौड़ने वाली रेलों की चपेट में आकर नहीं मरेंगे?
जंगल दुधवा का हो या राजाजी का या कोई और, वन्यजीवों को अगर बचाना है तो इस बात का जवाब तो सरकारों को देना ही होगा कि जिस जंगल में वनाश्रितों की मौजूदगी को अपराध के रूप में देखा जाता है,उसमें से गुजर कर आखिर हाईटेंशन तारें और रेलें क्यों जा रही हैं?
जलपाईगुड़ी में सबसे ज्यादा हादसे
अभी कुछ समय पहले ही पश्चिम बंगाल के जलपाइगुड़ी में एक बड़े रेल हादसे के कारण काफी हाथी मारे गए। राज्य के वन मंत्री हितेन बर्मन का कहना है कि उनकी याददाश्त में हाथियों से जुड़ी इससे बड़ी दुर्घटना नहीं है।
ट्रेन चपरामारी जंगलों से करीब 80 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से गुजर रही थी, जब यह 40 हाथियों के झुंड से टकरा गई। बर्मन ने बताया कि ये हाथी रेलवे लाइन पार कर रहे थे।
इसके बाद उनका झुंड तितर बितर हो गया। लेकिन फौरन रेलवे लाइन के पास लौट आया। बाद में वनरक्षकों और रेल कर्मचारियों को उन्हें वन में धकेलने में काफी वक्त लगा।
बर्मन का कहना है कि उनके विभाग ने कई बार मांग की है कि इस इलाके से गुजरते हुए ट्रेनों की रफ्तार कम कर दी जाए, लेकिन किसी ने उनकी नहीं सुनी। जलपाइगुड़ी का यह इलाका पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता से करीब 670 किलोमीटर दूर है।
भारतीय रेल कई जगहों पर वनों और पार्कों से होकर गुजरती है और इस इलाके में आए दिन हाथी इनसे कुचले जाते हैं। सबसे अफसोस कि बात ये है कि हमारे यहां पर इन हादसों को रोकने के लिए कोई व्यापक नीति नहीं बन रही। लगभग तीन साल पहले हाथियों के मारे जाने के बाद उस
वक्त के केंद्रीय पर्यावरण और वन मंत्री जयराम रमेश ने इलाके का दौरा किया था और हाथियों पर निगरानी रखने के लिए 10मीनार बनाने की बात कही थी और इसके लिए 25 लाख रुपये भी दिए गए। लेकिन इस साल जनवरी तक सिर्फ दो ऐसे टावर बन पाए।
रेल मंत्री को लिखी गई थी चिट्ठी
ट्रेनों से हाथियों के कुचले जाने के मामलों को लेकर एलिफैंट फैमिली नाम की संस्था ने इसी साल ब्लड ऑन ट्रैक (पटरियों पर खून) नाम का अभियान चलाया और इसके समर्थन में करीब 15,000 लोगों ने रेल मंत्री को चिट्ठी लिखी।
संस्था की वेबसाइट पर जानकारी दी गई है, 'मामला संसद में उठा और विशेषज्ञों की टीम बना कर ट्रेनों की गति कम करने का काम चल रहा है। इसमें मालगाड़ी को रात में नहीं चलाने का भी प्रस्ताव है।'
दरअसल हाथियों के रेलों से बार-बार कटने से ये सवाल खड़ा होता है कि हमें जंगलों और वन्यजीवों को लेकर अलग से नीति बनानी होगी। जंगलों और हाथियों के कटने पर एकाध दिन तक शोक व्यक्त करने से बात नहीं बनेगी।
अगर हमें अपने जंगलों और वन्य जन्तुओं को बचाना है तो हमें ईमानदारी से नीति बनाकर उसका पालन करना होगा। नहीं तो हाथी कटते रहेंगे।












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