Elections: कब तक सहयोगियों से सीटें मांगते फिरेंगे? कांग्रेस नेता को क्यों कहनी पड़ गई दिल की बात

लोकसभा चुनावों के दौरान जहां कांग्रेस पार्टी कई राज्यों में पूरी तरह से सहयोगी दलों के समर्थन के भरोसे चुनाव लड़ रही है। लेकिन, उसकी अपनी पार्टी के भीतर से अब इस रवैए को चुनौती मिलनी शुरू हो गई है। कांग्रेस में यह आवाज उठाई है तमिलनाडु में पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष के सेल्वापेरुन्थागई ने जहां पहले ही चरण में लोकसभा चुनाव संपन्न हो चुका है।

तमिलनाडु में पांच दशकों से भी पहले कांग्रेस जो सत्ता से बाहर हुई, वह आजतक नहीं लौट पाई है। उसे सत्ता में रहने के लिए कभी डीएमके तो कभी एआईएडीएमके का सहारा चाहिए। लेकिन, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष ने 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनावों को लेकर बड़े सपने देखने शुरू कर दिए हैं।

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57 वर्षों से सीटों के लिए सहयोगियों के भरोसे- कांग्रेस नेता
सेल्वापेरुन्थागई ने बुधवार को धर्मपुरी में पार्टी कार्यकर्ताओं की एक बैठक में बिना डीएमके या अन्नाद्रमुक का नाम लिए कहा, 'कांग्रेस 1967 से 57 वर्षों तक चुनाव के समय सीटों के लिए गठबंधन सहयोगियों पर निर्भर रही है।'

सीटें मांगने की जगह सीटें बांटने वाले बनें- कांग्रेस नेता
उन्होंने कहा, 'स्थिति बदलनी चाहिए। पार्टी को सीटें मांगने की जगह सीटें बांटने की स्थिति में आना चाहिए। पार्टी कार्यकर्ताओं को दिवंगत मुख्यमंत्री कामराज के नियम स्थापित करने के लिए कड़ी मेहनत करनी चाहिए।' उन्होंने दो वर्ष बाद होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए अभी से कार्यकर्ताओं को कमर कसने के लिए कहा है।

'हम कबतक सीटें मांगते फिरेंगे?'
उन्होंने कहा, 'क्या हमें अभी भी चुप रहना चाहिए? हमें और देरी नहीं करनी चाहिए। पार्टी के इंफ्रास्ट्रक्चर को और मजबूत बनाना चाहिए। हम कबतक सीटें मांगते फिरेंगे? यह हमें अपना कद बढ़ाने और सहयोगियों को सीटें देने का समय है।' उनका कहना है कि तमिलनाडु में कांग्रेस ने बिना सत्ता के '57 साल गंवा दिए हैं।'

2004 से डीएमके के साथ सटी हुई है कांग्रेस
कांग्रेस पार्टी ने 1947 से लेकर 1967, 20 वर्षों तक तमिलनाडु में राज किया। लेकिन, उसके बाद द्रविड़ राजनीति के जन्म लेने से इसकी हालत पतली हो गई। तब से पार्टी को राज्य में चुनाव के सहारे के लिए डीएमके या अन्नाद्रमुख के भरोसे रहना पड़ता है। 2004 से यह पूरी तरह से डीएमके साथ सटी हुई है।

1989 में कांग्रेस की ऐसी एक कोशिश हो चुकी है फेल
इससे पहले 1989 में कांग्रेस ने द्रविड़ राजनीतिक गठबंधन से अलग होकर अपने दम पर खड़े होने की कोशिश जरूर की थी। तब जीके मूपनार पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे। लेकिन, लक्ष्य हासिल नहीं हो पाया। बाद में पार्टी में टूट हो गई और मूपनार ने 1996 में तमिल मानिला कांग्रेस बना ली। टीएमसी ने तब एम करुणानिधि की अगुवाई वाले डीएमके के साथ गठबंधन कर लिया।

मूपनार के निधन के बाद उनके बेटे जीके वासन ने टीएमसी का 2002 में कांग्रेस में विलय कर दिया। लेकिन, 2014 में वह फिर से अलग हो गए। अभी वासन बीजेपी के सहयोगी हैं।

कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष ने एक बार फिर से कामराज के नाम पर जोश दिखाने की शुरुआत की है। हालांकि, बहुत कुछ आने वाले लोकसभा चुनावों के परिणामों पर निर्भर करता है, जिसमें कांग्रेस डीएमके की छोटी पार्टनर बनकर चुनाव मैदान में है।(इनपुट-पीटीआई)

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