हाथी ऐसा मरा कि माया के हाथ शून्य बटा सन्नाटा
लखनऊ। कहावत है कि मरा हाथी भी लाख का होता है। मगर यूपी में मोदी लहर में बीएसपी का हाथी ऐसा मरा कि मायावती के हाथ जीरो बटा सन्नाटा लगा. ये उस पार्टी के साथ हुआ है, जो दलितों की चैंपियन और अल्पसंख्यकों की इकलौती हितैषी होने का दावा करती है. जिसके 15वीं लोकसभा में 21 सांसद थे। यह वही भाजपा है, जिसके बारे में कहा जाने लगा था कि वह उत्तर प्रदेश में अपनी सियासी जमीन पूरी तरह से खो चुकी है, लेकिन मोदी के सिपहसालार अमित शाह के 'मैनेजमेंट' का ऐसा करिश्मा चला कि उत्तर प्रदेश में सब कुछ भाजपा मय हो गया।
बसपा का सूपड़ा साफ होना 16वीं लोकसभा के लिए उत्तर प्रदेश की बेहद अहम सियासी घटना रही। उत्तर प्रदेश के सियासी नतीजे सपा के लिए इसलिए चौकाने वाले हैं, क्योंकि ज्यादा वक्त नहीं गुजरा जब वर्ष 2012 में हुए विधानसभा चुनाव में पार्टी ने कुल 403 में से 224 सीटों पर जीत हासिल कर स्पष्ट बहुमत प्राप्त किया था। तब भाजपा को 47 सीटें मिली थीं और राज्य में सत्तारूढ़ रही बसपा 80 सीटों पर सिमट आई थी, लेकिन वर्ष 2014 आते-आते सपा की ये स्थिति हो जाएगी, तीसरा मोर्चा के सहारे केंद्र की सत्ता पर काबिज होने का उसका सपना धरा रह जाएगा, पार्टी ने कभी नहीं सोचा होगा।
चुनाव परिणाम से जुड़ी हर खबर
मायावती इस झटके से उबर कर वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव की तैयारियांे में जुट गई थीं। उनकी ओर से सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला एक बार फिर अपनाया गया। पार्टी ने मुस्लिम मतदाताओं को रिझाने के लिए इस वर्ग से 19 प्रत्याशियों को भी टिकट दिए, लेकिन मोदी लहर में उनकी पार्टी का उत्तर प्रदेश से सूपड़ा ही साफ हो गया। बसपा की ऐसी हालत होगी, इसका अंदाजा राजनीतिक विश्लेषकों ने भी नहीं लगाया था।
बसपा की ये हालत इसलिए भी उसके लिए चिंताजनक है, क्योंकि चुनाव में वोट प्रतिशत बढ़ाना उसकी खासियत रही है। इस बार मायावती स्वयं तो चुनावी मैदान में नहीं थीं, लेकिन उनकी पार्टी के प्रमुख नेताओं के बेटा-बेटी और पत्नी से लेकर अन्य रिश्तेदार चुनाव में ताल ठोक रहे थे। हालत ये रही कि ये नेता अपने परिजनों के संसदीय क्षेत्र में ही सिमटे रहे और बाकी लोकसभा के प्रत्याशियों का भविष्य मायावती पर छोड़ दिया गया।












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