जानिए क्यों हारे केजरीवाल और उनकी पार्टी आप?

बैंगलोर। चुनाव शुरू होने से ठीक पहले ही आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल ने बीजेपी के खिलाफ चुनाव प्रचार शुरू कर दिया था। गडकरी से लेकर मोदी तक में उन्होंने किसी को भी बेईमान कहने में परहेज नहीं किया। मात्र पांच महीने पहले जिस व्यक्ति और पार्टी को दिल्ली की जनता ने सर-आंखों पर बिठाया था वो आज लोगों की नजर से उतर चुका है।

अपने आप को ईमानदार कहते-कहते ना थकने वाले केजरीवाल आज बनारस में नंबर 2 की सीट पर खड़े हैं तो वहीं जिस दिल्ली के दम पर वो भारत जीतने निकले थे उसी दिल्ली ने उनकी पार्टी को नमस्ते बोल दिया।

अपनी और अपनी पार्टी के चुनावी नतीजों पर बात करते हुए केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली में लोकसभा चुनाव के परिणाम पार्टी के लिए निराशाजनक है, उन्होंने कहा, "हमारे पास न पैसा था न संसाधन। यह हमारा नहीं जनता का चुनाव है। हमने देश को सही मंच दिया है। लेकिन लोकतंत्र में जनता का फैसला सर्वोच्च होता है। इसलिए हम अपनी हार स्वीकार करते हैं।

लेकिन क्या केजरीवाल और उनकी पार्टी का संघर्ष यूं ही खत्म हो जायेगा और अरविंद केजरीवाल के वो वादे औऱ दावे खत्म हो जायेंगे जिनके बल पर वो सत्ता में आये थे।

आईये जानते हैं क्यों हारे केजरीवाल और उनकी पार्टी आप?

दिल्लीवासियों का भरोसा खोना

दिल्लीवासियों का भरोसा खोना

अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी पर दिल्ली के लोगों ने भरोसा किया था लेकिन जिस कांग्रेस को वो गरियाते फिर रहे थे उन्हीं के साथ मिलकर उन्होंने सरकार बना ली। जो कि लोगों को नागवार गुजरा।

अपने वादों को पूरा ना करना

अपने वादों को पूरा ना करना

अरविंद केजरीवाल ने दावा किया था कि वो अगर सीएम बनें तो दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को जेल भेज देंगे लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

संगठन में कमी

संगठन में कमी

अरविंद और उनकी पार्टी दोनों में संगठन की कमी देखी गयी, उनके ही दल वालों ने उन पर हिटलर होने का आरोप लगाया।

तथ्यहीन बातें

तथ्यहीन बातें

अरविंद केजरीवाल ने अपनी पूरी चुनाव रैली के दौरान केवल बीजेपी पर आरोप लगाये, उन्होंने कहा कि उनके पास सबूत हैं बीजेपी वालों के खिलाफ लेकिन वो कोर्ट ना जाकर प्रेसवार्ता करते रहे और बाद में मीडिया पर ही बिकने का आरोप लगा दिया।

बनारस से केजरीवाल का चुनाव लड़ना

बनारस से केजरीवाल का चुनाव लड़ना

केजरीवाल के हार की सबसे बड़ी वजह बनारस से उनका मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ना रहा। समीक्षकों की नजर में यह उनकी ओर से पॉलिटिकल सोसाइड है।

जल्दबाजी का फैसला

जल्दबाजी का फैसला

लोकपाल मुद्दे पर दिल्ली के सीएम पद को ठोकर लगाना और बार-बार अपने वक्तव्य से पलट जाना उनकी हार के बड़े कारणों में से एक है।

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