Election Commission Shiv Sena: शिंदे की जीत, उद्धव से छिनी 'सेना' और तीर-कमान, ECI का पूरा फैसला यहां पढ़िए
मुख्य चुनाव आयोग ने अहम फैसले में कहा- शिवसेना और तीर-कमान का निशान सीएम एकनाथ शिंदे की अगुवाई वाले शिवसेना गुट का है। इस फैसले के बाद उद्धव से शिवसेना का नाम और तीर कमान छिना। आयोग ने फैसले में कई अहम बातें कहीं। जानिए

Election Commission Shiv Sena पर अहम फैसले के कारण सुर्खियों में है। उद्धव ठाकरे पर सीएम एकनाथ शिंदे भारी पड़े। चुनाव आयोग ने कहा, शिवसेना का तीर-कमान का निशान शिंदे गुट का है। बता दें कि शिंदे ने शिवसेना से बगावत के बाद बीजेपी के समर्थन से सरकार बनाई थी। इस मामले में उद्धव ठाकरे गुट का दावा था कि पार्टी का चुनाव चिह्न उनके पास होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट तक हुई लड़ाई
शुक्रवार को भारत के चुनाव आयोग ने कहा, पार्टी का नाम "शिवसेना" और प्रतीक "धनुष और तीर" एकनाथ शिंदे गुट के पास रहेगा। बता दें कि इस दिलचस्प सियासी रार की शुरुआत उद्धव ठाकरे की सरकार गिरने के बाद हुई थी। शिवसेना दो फाड़ (एकनाथ शिंदे और उद्धव ठाकरे गुट) होने के बाद पार्टी के चुनाव चिह्न धनुष और तीर के निशान की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक लड़ी गई।
शिवसेना का संविधान अलोकतांत्रिक!
अंतिम फैसला चुनाव आयोग (ECI) को करना था। आयोग ने पाया कि शिवसेना पार्टी का वर्तमान संविधान अलोकतांत्रिक है। बिना किसी चुनाव के पदाधिकारियों के रूप में एक मंडली के लोगों को अलोकतांत्रिक रूप से नियुक्त करने के लिए इसे विकृत कर दिया गया है। इस तरह की पार्टी संरचना विश्वास को प्रेरित करने में विफल रहती है।

अपनी वेबसाइट पर जानकारी दें राजनीतिक दल
राजनीतिक दलों और उनके आचरण पर दूरगामी प्रभाव वाले इस ऐतिहासिक निर्णय में, ECI ने सभी राजनीतिक दलों को सलाह दी कि वे लोकतांत्रिक लोकाचार और आंतरिक पार्टी लोकतंत्र के सिद्धांतों के अनुसार काम करें। नियमित रूप से अपनी संबंधित वेबसाइटों पर पार्टी के आंतरिक कामकाज के पहलुओं का खुलासा करें। इसमें संगठनात्मक विवरण, चुनाव कराना, पार्टी के संविधान की प्रति और पदाधिकारियों की सूची जैसे विवरण शामिल हों।
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पार्टी के संविधान संशोधन पर क्या बोला ECI
चुनाव आयोग ने कहा, "राजनीतिक दलों के संविधान में पदाधिकारियों के पदों के लिए स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव और आंतरिक विवादों के समाधान के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष प्रक्रिया होनी चाहिए। इन प्रक्रियाओं में संशोधन करना मुश्किल होना चाहिए। संशोधन संगठनात्मक सदस्यों के बड़े समर्थन के बाद ही सुनिश्चित होना चाहिए।"
24 साल पुरानी बात, ECI ने शिवसेना को आईना दिखाया
ECI ने कहा, "2018 में संशोधित शिवसेना का संविधान चुनाव आयोग को नहीं दिया गया। संशोधन के बाद 1999 के पार्टी संविधान में लोकतांत्रिक मानदंडों को पेश करने के कार्य को पूर्ववत कर दिया था। आयोग के आग्रह पर स्वर्गीय बालासाहेब ठाकरे ने शिवसेना के संविधान में संशोधन किए थे।" शिवसेना के मूल संविधान के अलोकतांत्रिक मानदंडों को रेखांकित करते हुए चुनाव आयोग ने सख्त लहजे में कहा, 1999 में आयोग ने इसे स्वीकार नहीं किया था। इसे गुप्त तरीके से वापस लाया गया है, जिससे पार्टी एक जागीर के समान (party akin to a fiefdom) हो गई है।
राजनीतिक पार्टियों की राष्ट्रीय कार्यकारिणी पर ECI
चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों की राष्ट्रीय कार्यकारिणी पर भी टिप्पणी की। ECI ने कहा, राष्ट्रीय कार्यकारिणी एक ऐसा निकाय है जिसका 'निर्वाचिन' आम तौर पर 'नियुक्त' की गई प्रतिनिधि सभा के माध्यम से होता है। आयोग ने वर्ष 1999 में बाला साहेब को आजीवन सेना का नेता बनाए जाने पर मसौदा संशोधनों का जिक्र कर शिवसेना से कहा, "संक्षेप में कहें तो, पार्टी संविधान में अध्यक्ष द्वारा निर्वाचक मंडल (Electoral College) को नामांकित करने की परिकल्पना की गई है, उन्हें ही पार्टी अध्यक्ष चुनना है। इसलिए, वर्तमान विवाद के मामले को निर्धारित करने के लिए ''पार्टी संविधान की परीक्षा'' पर कोई भी भरोसा अलोकतांत्रिक होगा और पार्टियों में इस तरह की प्रथाओं को फैलाने में भी मददगार साबित होगा।
प्रतिद्वंद्वी समूहों के सभी विकल्पों को दबाने के प्रयास
चुनाव आयोग ने कहा कि शिवसेना का 2018 का संविधान, असहमति के उपाय/तरीके के महत्वपूर्ण बिंदु पर प्रतिद्वंद्वी समूहों के सभी विकल्पों को दबा देता है। इससे एक ही व्यक्ति को विभिन्न संगठनात्मक नियुक्तियां करने की व्यापक शक्तियां मिलती हैं।
शिंदे और उद्धव ठाकरे के पास कितना 'जनाधार'?
आयोग ने एकनाथ शिंदे बनाम उद्धव ठाकरे की लड़ाई का नंबर गेम भी स्पष्ट किया। ECI के अनुसार "शिंदे गुट का समर्थन करने वाले 40 विधायकों ने कुल 47,82440 वोटों में से 36,57327 वोट हासिल किए। इस आधार पर महाराष्ट्र विधानसभा में संख्याबल पर आयोग ने कहा, यह वोट प्रतिशत शिवसेना के 55 विजयी विधायकों के पक्ष में डाले गए वोटों का कुल 76 प्रतिशत है। लोक सभा में शिवसेना के 19 सांसद हैं। ECI के अनुसार जिन 15 विधायकों के समर्थन का उद्धव ठाकरे गुट ने दावा किया उन्हें 25113 वोट मिले। जीतने वाले 55 विधायकों के पक्ष में पड़े वोटों का ये 23.5 फीसदी है।
एकनाथ शिंदे को अधिक विधायकों का समर्थन
2019 में महाराष्ट्र की विधानसभा चुनाव में शिवसेना प्रत्याशियों को कुल 90,49,789 वोट मिले थे। इसमें हारने वाले उम्मीदवारों को मिले वोट भी शामिल हैं। इस पैमाने पर भी शिंदे गुट का समर्थन करने वाले 40 विधायकों को 40 प्रतिशत वोट मिले, जबकि उद्धव ठाकरे गुट को समर्थन देने वाले 15 विधायकों के पास कुल वोटों का केवल 12 प्रतिशत वोट था।
लोक सभा में उद्धव गुट का जनाधार
आयोग ने लोक सभा और राज्य सभा में शिवसेना सांसदों की संख्या के बारे में कहा, "लोकसभा चुनाव 2019 में 18 सांसदों के पक्ष में कुल 1,02,45143 वोट पड़े। शिंदे गुट का समर्थन करने वाले 13 सांसदों को 74,88,634 वोट हासिल हुए। यानी कुल वोटों का 73 प्रतिशत। उद्धव ठाकरे गुट के समर्थन वाले 5 सांसदों को 27,56,509 वोट मिले, जो केवल 27 प्रतिशत वोट हैं। यह भी रोचक है कि छह सांसदों के समर्थन का दावा करने वाला उद्धव गुट केवल 4 हलफनामे दायर कर सका।
लोक सभा में शिंदे गुट को अधिक वोट
आयोग ने कहा, लोकसभा चुनाव 2019 में हारने वाले उम्मीदवारों सहित शिवसेना को कुल 1,25,89064 वोट मिले। इस आधार पर भी शिंदे गुट का समर्थन करने वाले 13 सांसदों के वोट शेयर 59 प्रतिशत हैं, जबकि उद्धव ठाकरे गुट का समर्थन करने वाले 5 सांसदों को केवल 22 प्रतिशत वोट मिले हैं।
तीन महीने पहले ECI का अंतरिम आदेश
बता दें कि पिछले महीने, महाराष्ट्र के वर्तमान मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और पूर्व सीएम उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले दोनों गुटों ने शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न पर नियंत्रण के अपने दावों के समर्थन में अपने लिखित बयान चुनाव आयोग को सौंपे थे। पिछले साल नवंबर में अंधेरी पूर्व विधानसभा क्षेत्र में उपचुनाव के लिए ECI शिवसेना के इलेक्शन सिंबल- धनुष और तीर को फ्रीज कर दिया एकनाथ शिंदे गुट की शिवसेना को 'दो तलवारें और ढाल का प्रतीक' आवंटित किया था। उद्धव ठाकरे गुट को 'ज्वलंत मशाल' (मशाल) चुनाव चिह्न दिया गया था।
दिल्ली हाईकोर्ट में भी हारे थे उद्धव ठाकरे
उद्धव ठाकरे ने शिवसेना के इलेक्शन सिंबल- तीर-कमान को फ्रीज करने के फैसले के खिलाफ दिल्ली उच्च न्यायालय में एक रिट याचिका दायर की थी। हालांकि, अदालत ने याचिका खारिज कर दी थी। चुनाव आयोग ने अंधेरी पूर्व सीट पर उपचुनावों के समय अंतरिम आदेश में कहा, दोनों समूहों में से किसी को भी "शिवसेना" के लिए आरक्षित प्रतीक "धनुष और तीर" का उपयोग करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।












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