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चुनाव प्रचार का सिर्फ एक ही मकसद, वो है जीतना : नवनीत कुमार

नई दिल्ली, 17 मार्च। ईटीजी रिसर्च (ETG Research) के प्रोजेक्ट लीड नवनीत कुमार ने चुनाव अभियान को केवल एक जीत का एजेंडा बताया है। उन्होंने एक एक्सक्ल्यूसिव इंटरव्यू में यह बात कही है। साक्षात्कार में नवनीत कुमार (Navneet Kumar) ने कहा है कि किस प्रकार चुनावी प्रचार का एजेंडा तैयार किया जाता है। इसके लिए एक शोध रणनीति तैयार की जाती है, जिसमें राजनीतिक संगठनों को जनता के बीच में भावनात्मक रूप से जोड़ने का मसौदा तैयार किया जाता है। साथ ही प्रचलित भावनाओं और मतदाताओं की अधिक महत्वपूर्ण जरूरतों को पूरा करने की रणनीति होती है। आइए जानते हैं कि ईटीजी रिसर्च के प्रोजेक्ट लीड नवनीत कुमार ने विशेष इंटरव्यू में क्या प्रमुख बातें कही हैं-

 election campaign has only aim to win said etg lead navneet

सवाल: राजनीतिक पार्टियों के लिए चुनावी एजेंडे की रणनीति तैयार करने में ​​कौन से घटक आवश्यक हैं?

जवाब: सभी राज्यों में मतदान का अलग ट्रेंड है। प्रत्येक राज्य मतदान करने का अलग तरीका है। व्यक्तिगत रूप से मतदाता अपने में अद्वितीय होते हैं। इसलिए सभी वोटर के लिए एक मानक चेकलिस्ट नहीं हो सकती है, जिसका पालन राजनीतिक दलों या संगठनों द्वारा अपनी चुनावी रणनीति तैयार करते समय किया जा सके। जबकि एक बात जो सभी राज्यों में समान होती है, वह है मतदाताओं की समझदारी। इस स्थिति में संगठन को केवल अपने विवेक का प्रयोग करना होता है और मतदाताओं की बात सुननी होती है। इसका कारण यह है कि मतदाता इस बात को अच्छी तरह से जानते हैं कि उनके लिए सही गलत क्या है। देखने में तो यह लग सकता है कि उन्होंने मतदान के दौरान जाति, धार्मिक या फिर संस्कृति का विचार किया होगा। लेकिन यह सिर्फ एक अनुमान हो सकता है। अगर मतदातओं से गहराई से बात की जाए तो पता चलेगा कि उनके मतदान का आधार क्या है और उनका मत क्या है।

चुनावी एजेंडा की रणनीति बनाते समय एक पार्टी को लोगों की बात सुनकर समस्याओं के कारणों का पता लगाना चाहिए। जनता सरकार से क्या चाहते हैं? वे अपने उम्मीदवार के रूप में किसे चाहते हैं? उनके प्रमुख मुद्दे क्या हैं? इन सब सवालों के इर्द गिर्द घूमते हुए अगर चुनावी एजेंडे की रणनीति बनाए जाए तो राजनीतिक दलों को एक अलग तरीके जन समर्थन प्राप्त होता है। यह समर्थन किसी भी राजनीतिक दल को जीत तक पहुंचा सकता है।

सवाल: ग्राउंड रिसर्च की ठोस रणनीति की तैयारी कैसे की जाती है?

जवाब: एक प्रभावी अभियान तभी बन सकता है जब पर्याप्त जमीनी शोध किया गया हो। वह जमीनी शोध जिसमें लोगों की बात सुनी गई हों और उनकी आवश्यताओं और अपेक्षाओं को समझा गया हो। एक प्रभावी और विस्तृत रूप से किया गया जमीनी शोध किसी भी चुनावी अभियान के निर्माण का पहला चरण है। बहुत प्रभावी चुनावी अभियान तो तैयार किया जा सकता है लेकिन अगर जमीनी शोध (Ground Research) प्रभावी नहीं है तो यह बाद में फेल हो सकता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इसमें अधिकतर जन अपेक्षाओं और आवश्यकताओं की बात कहने की कमी रह जाती है। इसलिए चुनावी अभियान की रणनीति में जमीनी अनुसंधान और जमीनी शोध दोनों ही पहले भी अत्यंत महत्वपूर्ण थे और आज भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। आजकल हम वर्चुअल तरीके से लोगों के बीच होना अधिक पसंद करते हैं। जबकि हमें अभी भी यह समझने की आवश्यकता है कि चुनाव अब भी जमीन पर ही लड़े जाते हैं। जिसके कारण जमीनी उपस्थिति का महत्व अधिक है। हालांकि जीतने वाले प्रत्याशी को अपने प्रतिद्वंद्वी को सभी प्लेटफार्मों पर मात देनी होती है। इसलिए डिजिटल उपस्थिति आवश्यक है और इससे आप हार नहीं सकते। इसके बावजूद डिजिटल और जमीनी उपस्थिति के बीच संतुलन बनाना आवश्यक होता है।

सवाल: वह कौन सी 3 तकनीकों की सूची है जिसे वर्तमान जनभावना का आकलन करते समय अनिश्चितता अलग करने के लिए अपनाया जाता है?

जवाब: नमूना आकार के अतिरिक्त कई अन्य महत्वपूर्ण चीजें है-

1- नमूनाकरण: एक विस्तृत नमूना आकार पत्र महत्वपूर्ण है। इसके अलावा मतदाताओं का प्रतिनिधि नमूना भी अधिक महत्वपूर्ण है। यह सुनिश्चित करना भी आवश्यक है कि नमूने में प्रत्येक सामाजिक आधार का सही अनुपात है कि नहीं। इसके साथ ही यह भी देखा जाना चाहिए की नमूने में प्रत्येक जनसांख्यिकीय खंड का सही प्रतिनिधित्व भी है। यह अक्सर सुना जाता है कि हमने गलत किया क्योंकि हमने महिलाओं की आवाज नहीं सुनी। यह गलती भी इसलिए हो सकती है क्योंकि जब हम नमूना आकार पत्र बनाते हैं तो उसमें महिला आबादी का कम नमूना लेते हैं।

2- सही सवाल पूछना: इसके अलावा एक और महत्वपूर्ण पहलू है। वह यह है कि जब ग्राउंड पर होते हैं तो हमें विभिन्न स्तरों की समझ और बुद्धि वाले लोग मिलते हैं। ऐसे लोगों के लिए प्रश्नावली की भाषा सरल करनी पड़ती है। जिससे कम बौद्धिक स्तर वाले लोगों को समझाने में आसानी हो सके। राह चलते हर कोई लंबी प्रश्नावली होने और कठिन भाषा सुनकर उत्तर आसानी से नहीं दे पाता। ऐसे में प्रतिक्रिया दर कम हो जाती है और गणनाकर्ताओं के बीच एक उच्च स्तर का गतिरोध (बाधा) की समस्या हो जाता है।

3- डेटा विश्लेषण: कई बार डेटा संग्रह के उच्च मानक और सभी समुदाय से सही प्रतिनिधित्व को बनाए रखना बहुत प्रयास किया जाता है लेकिन आपको डेटा में कुछ ऐसा भी मिलता है जिसे शोर समझा जाता है। ये शोर करने वाले कुछ सामाजिक समूह हो सकते हैं जिनका अधिक नमूना लिया गया जबकि कुछ ऐसे भी हो सकते हैं जिनका नमूना लिया जा सकता है। इसलिए सही आउटपुट प्राप्त करने के लिए डेटा को सरत तरीके से प्रस्तुत किया जाना आवश्यक होता है।

सवाल: घोषणापत्र की योजना बनाने में सहायता करते समय चुनाव अनुसंधान फर्में किन कमियों को भर सकती हैं?

जवाब: चुनावी घोषणापत्र के दो प्रमुख भाग होते हैं। पहला है पार्टियों की वैचारिक प्रतिबद्धताएं जो वे लोगों से करते हैं। पार्टी की सरकार बनने पर वैचारिक प्रतिबद्धताओं को पूरा करने पर पूरा जोर रहता है। चुनावी घोषणा पत्र का दूसरा हिस्सा होता है लोगों के बीच मुख्य मुद्दों की पहचान करना और उसके समाधान का प्रस्ताव देना। इस प्रकार के समाधान के प्रति लोगों को स्वीकार्यता होनी चाहिए या फिर कुछ मामलों में सहमत होने का प्रस्ताव उनकी ओर से दिया जाना चाहिए। चुनावी शोध फर्म प्रमुख मुद्दों और प्रस्तावित समाधान की पहचान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। इसके बाद पार्टी के पदाधिकारी इन मुद्दों की व्यवहारिकता पर मंथन करते है। इसके बाद इस कार्य करने के लिए विचार किया जाता है। बाद में यही जन समस्या पार्टी के घोषणापत्र का हिस्सा बन सकती है।

प्रश्न: टिकट आवंटन से पहले उम्मीदवारों की प्रोफाइलिंग करते समय किन बातों को ध्यान में रखना चाहिए?

जवाब: उम्मीदवारों की प्रोफाइलिंग से पहले मुख्य बातें हैं, जिन्हें ध्यान में रखने की अत्यंत आवश्यकता है-

1- उम्मीदवार की स्वीकृति : कई क्षेत्र ऐसे होते हैं जहां पार्टी से अधिक महत्वपूर्ण उम्मीदवार होता है। ऐसा तब होता है जब कोई क्षेत्रीय की किसी क्षेत्र में विशेष पकड़ होती है। ऐसे में लोगों के बीच उम्मीदवार की स्वीकृति मायने रखती है।

2- उम्मीदवार की आर्थिक स्थिति : पार्टियां टिकट आवंटन में आमतौर पर ऐसे व्यक्ति को पसंद करती हैं जिसकी जेब गहरी हो। लेकिन फिर भी यह एक अनिवार्य पैरामीटर नहीं है। वर्तमान की बदली परिस्थितियों में चुनाव प्रचार काफी महंगा हो चुका है। पार्टी का संदेश जन- जन तक पहुंचाने के लिए एक व्यापक जन संपर्क अभियान में अधिक वित्त की आवश्यकता होती है। ऐसे में जो व्यक्ति आर्थिक रूप से मजबूत नहीं है और चुनाव लड़ रहा है तो उसे नुकसान उठाना पड़ सकता है।

3- उम्मीदवार का राजनीतिक अनुभव: हमेशा से पार्टियों को एक जिताऊ उम्मीदवार की तलाश रहती है। उनके चुनाव प्रचार का भी यही मकस होता है। ऐसे में उन्हें सामाजिक जीवन में सक्रिय और स्थापित राजनीतिक पृष्ठभूमि वाला उम्मीदवार की तलाश पार्टियों को रहती है। ऐसे व्यक्ति का हमेशा चुनावी क्षेत्र में नए व्यक्ति से बेहतर दांव होगा।

4- सामाजिक समूह संबद्धता: राजनीतिक पार्टियां चुनाव आवंटन के दौरान सामाजिक संरचना का भी विशेष ध्यान रखती हैं। कुछ सीटों में सामाजिक रचनाएँ ऐसी होती हैं कि किसी विशेष समुदाय के उम्मीदवारों को देने से पार्टी को उस सीट को आसानी से जीतने में मदद मिलती है। यह सीट अन्य सीटों से भिन्न हो सकती है।

5- विद्रोही गतिविधि मूल्यांकन: कुछ सीटों ऐसी होती हैं जहां एक को टिकट देने से दूसरे उम्मीदवार को चोट लग सकती है। वह विद्रोह कर सकता है और किसी अन्य पार्टी के टिकट या फिर निर्दलीय रूप से चुनाव लड़ सकता है। ऐसे में पार्टी इस नुकसाने से बचने के लिए सही विकल्प चुनने से पहले बागी उम्मीदवार से होने वाले नुकसान का आकलन करना होता है।

सवाल: मीडिया के लिए सामग्री बनाने में चुनावी रिसर्च फर्म की क्या भूमिका हैं?

चुनाव से वर्षों पहले से जो पोल हम देखते हैं वही सबसे आसानी से उपलब्ध सामग्री है। इसे मीडिया चाहता भी है। जब रिसर्च फर्म के ट्रैक रिकॉर्ड के आधार पर कोई विषय विश्वसनीयता के साथ प्रस्तुत होता है तो वहीं मीडिया के लिए बेहतर सामग्री होती है। भविष्य में क्या होने वाला है यह जानने की लोगों में सबसे अधिक उत्सुकता होती है। जब मीडिया को फर्म के रिसर्च आंकड़े मिलते हैं तो यही उसके लिए सामग्री होती है।

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