रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ ED की चार्जशीट में 5 खास बातें, नक्शा बदलकर कैसे हुआ 58 करोड़ का सौदा?
राहुल गांधी द्वारा देश में कथित 'वोट चोरी' की नई बहस छेड़े जाने के बीच उनके बहनोई व कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी के पति कारोबारी रॉबर्ट वाड्रा पर ईडी का शिकंजा कसता नजर आ रहा है।
रॉबर्ट वाड्रा जमीन घोटाला केस में अब ईडी की नई चार्जशीट व कोर्ट के आदेश में विस्तार से पहली बार कई चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। बड़ा आरोप है कि हरियाणा के गुरुग्राम के पास शिकोहपुर में जमीन सौदे में भूमि का असली आकार बढ़ाकर दिखाया गया था।

दरअसल, आकार बढ़ाने की असल वजह टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग (T&SP) के रिकॉर्ड में सेक्टर रोड को नक्शे से हटाकर 'कम से कम दो एकड़' वाली पात्रता शर्त पूरी करने में हेरफेर करना था। इसके अलावा कई फाइलों में बैक डेट में भी काम हुआ।
7.5 करोड़ से 58 करोड़
मीडिया की खबरों के अनुसार कि यह जमीन स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी प्राइवेट लिमिटेड ने ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज प्राइवेट लिमिटेड से 7.5 करोड़ रुपए में खरीदी बताया गया था। जबकि यह सौदा करीब 15 करोड़ में हुआ था, जिसमें आधे हिस्से के तो दस्तावेज ही गायब कर दिए गए। बाद में यह जमीन स्काईलाइट ने DLF को 58 करोड़ में बेच दी थी।
ईडी चार्जशीट की खास बातें
1. ईडी ने रॉबर्ट वाड्रा से जुड़ी कुल 43 अचल संपत्तियों को अस्थायी रूप से जब्त किया है। कुल 38.69 करोड़ रुपए की इन संपत्तियों में नोएडा-गुरुग्राम के कई भूखंड, अहमदाबाद में फ्लैट, मोहाली और गुरुग्राम की कमर्शियल यूनिट व बीकानेर की जमीन शामिल है।
2. ईडी ने रॉबर्ट वाड्रा केस में फर्जी दस्तावेज और झूठे मूल्यांकन से संपत्ति का ट्रांसफर की नई धारा भी जोड़ी है। हरियाणा पुलिस ने एक सितंबर 2018 को आईपीसी की धारा 120बी, 420, 467, 471 और पीसी एक्ट की धारा 13 के तहत एफआईआर दर्ज की थी। अब केस में धारा 423 (अचल संपत्ति के हस्तांतरण में धोखाधड़ी) भी जोड़ दी गई है।
3. पूरे केस में ईडी ने कोर्ट से अपील की है कि सभी 43 संपत्तियों का कब्जा सरकार को देने और आरोपियों को पीएमएलए की धारा 4 के तहत तीन से सात साल तक की कठोर सजा दी जानी चाहिए।
4. ईडी की ताजा चार्जशीट में पीएमएलए की धारा 70 लागू होने के कारण कंपनी स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी प्रा. लि., एसजीवाई व अन्य कोई कंपनी अपराध करती है तो उस समय के निदेशक व जिम्मेदारी अधिकारी दोषी माने जाएंगे।
5. रॉबर्ट वाड्रा केस में कई सरकारी अफसरों पर भी गाज गिरनी तय मानी जा रही है, क्योंकि टाउन एंड कंट्री प्लानिंग विभाग के अफसरों ने सियासी दबाव में सेक्टर रोड का नक्शा ही बदल डाला था। बैक डेट फाइल व पात्रता पूरी नहीं होने के बावजूद लाइसेंस जारी किया गया था।
रॉबर्ट वाड्रा जमीन घोटाला केस क्या है?
1. जमीन खरीद का तरीका: रॉबर्ट वाड्रा की कंपनी स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी प्रा. लि. ने शिकोहपुर (गुरुग्राम) और आसपास के क्षेत्रों में कृषि भूमि खरीदी। जमीन के रजिस्ट्री रिकॉर्ड के मुताबिक, यह खरीद औसतन करीब ₹7-₹10 लाख प्रति एकड़ के हिसाब से हुई, जो उस समय भी बाजार भाव से काफी कम थी। अधिकतर जमीन किसानों और स्थानीय मालिकों से सीधे खरीदी गई।
2. CLU (Change of Land Use) का रोल: कृषि भूमि को रियल एस्टेट प्रोजेक्ट में बदलने के लिए सरकार से CLU (Change of Land Use) की अनुमति जरूरी होती है। आरोप है कि उस समय के हरियाणा मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने वाड्रा की कंपनी को तुरंत CLU दे दी, जबकि आम प्रोजेक्ट्स के लिए यह प्रक्रिया 6 महीने से 1 साल लेती थी। CLU मिलने के बाद जमीन का मूल्य कई गुना बढ़ गया।
3. नियमों में विशेष छूट: आरोप है कि वाड्रा की कंपनी को कुछ ज़ोनिंग और डेवलपमेंट नियमों में ढील दी गई। जैसे-डेवलपमेंट चार्ज और इंफ्रास्ट्रक्चर फीस में रियायत। पर्यावरणीय मंजूरी प्रक्रियाओं को आसान करना। इस तरह कंपनी को वह सभी लाभ मिले, जो बड़े बिल्डर लॉबियों को भी आसानी से नहीं मिलते।
4. DLF को जमीन बेचना: CLU मिलने के तुरंत बाद Sky Light Hospitality ने यह जमीन DLF Universal Ltd. को बेच दी। बिक्री की कीमत-लगभग ₹58 करोड़ (कुछ रिपोर्टों के अनुसार इससे भी ज्यादा)। खास बात यह कि जमीन खरीदने और बेचने के बीच का समय 1-2 साल से भी कम था। इस दौरान जमीन का दाम 5-6 गुना बढ़ गया।
5. आरोप और विवाद: विपक्षी पार्टियों (खासतौर पर BJP) का आरोप था कि यह एक "quid pro quo" डील थी-सरकार ने वाड्रा को फायदा दिलाया। बदले में रियल एस्टेट लॉबी और राजनीतिक गठजोड़ को लाभ मिला। कुछ RTI और मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया कि DLF ने वाड्रा को कुछ लोन और फ्लैट भी रियायती दरों पर दिए, लेकिन वाड्रा और DLF दोनों ने इन आरोपों से इनकार किया।
6. जांच की स्थिति: 2015 में BJP सरकार बनने के बाद हरियाणा सरकार ने जस्टिस एस.एन. ढींगरा कमीशन बनाया। कमीशन ने कहा कि CLU मंजूरी में नियमों का उल्लंघन हुआ और इससे वाड्रा की कंपनी को अनुचित फायदा मिला।












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