आर्थिक नीतियों के बिना 'आम आदमी पार्टी' कैसे बदलेगी देश

Economic policies of Aam Admi Party
नई दिल्‍ली। आम आदमी के समर्थन से पहले ही चुनाव के बाद सत्‍ता संभालने वाली 'आम आदमी पार्टी' ने आधे दाम पर बिजली और मुफ्त पानी देकर लोगों के विश्‍वास पर खरा उतरने की जिस क्षमता का प्रदर्शन किया, उस पर पुलिस अधिकारियों के निलंबन के लिए धरना प्रदर्शन और एफडीआई पर रोंक लगाने के निर्णय से सवाल उठना शुरू हो गये हैं। जिसके बाद कहा जा रहा है कि उन्‍हें प्रशासन चलाने की कला अभी सीखनी होगी।

एक ऐसे देश के लिए जो इतना स्वार्थी है, यहाँ आम आदमी पार्टी का उभर कर आना एक परी कथा की तरह लगता है। महज़ एक साल पहले स्थापित हुई यह पार्टी देश के एक प्रमुख राज्य में सत्ता में आ गयी। यही नहीं, इस पार्टी ने सभी जाति और वर्ग के बीच अपनी पैठ बना ली पर पार्टी के सबसे प्रमुख नेता अरविन्द केजरीवाल को मुख्यमंत्री बने अभी एक महीना ही हुआ है लेकिन ऐसा लगने लगा है कि उनका हनीमून काल अब ख़त्म हो चुका है। हम उन परेशानियों की बात नहीं कर रहे जिसमें यह सरकार आई जब विधि मंत्री सोमनाथ भारती के नेतृत्व में कुछ 'आप' के कार्यकर्ताओं ने ड्रग और वेश्यावृत्ति छापे के नाम पर कई अफ़्रीकी महिलाओं के साथ बदसलूकी की। हम विद्रोही विधायक विनोद कुमार बिन्नी को केजरीवाल को झूठा और तानाशाह बोलने के जुर्म में पार्टी से निकाले जाने की बात भी नहीं कर रहे। अगर 'आप' की संचालन नीति पर ध्यान दिया जाए तो यह बात काफी चिंताजनक है कि उनकी आर्थिक नीति सही नहीं है।

'आप' के प्रवक्ता दिलीप के. पाण्डेय ने यह कहा था कि सरकार आठ लोगों का एक पैनल बनाएगी पर अभी तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है। जब 'आप' की आर्थिक नीतियों के बारे में पूछा गया तो पाण्डेय ने फर्स्टपोस्ट डॉट कॉम से कहा "यह सवाल आर्थिक नीतियों से जुड़े हैं जिसपर अभी काम होना बाकी है। इसलिए तब तक इंतज़ार करिये जब तक टीम अंतिम आर्थिक दृष्टि दस्तावेज़ के साथ नहीं आती।"

छह महीने पहले बनाई थी टीम

अगर 'आप' की वेबसाइट पर नज़र डाली जाए तो पार्टी ने इस कार्य के लिए छः महीने पहले ही एक टीम बना ली थी। वेबसाइट पर डाले के नोट के अनुसार, "कर्ता समिति को अर्थव्यवस्था और पर्यावरण के प्रति पवित्र दृष्टिकोण विकसित करना चाहिए। उसको आर्थिक नीतियों का विकास, शेयर, गहरा होता लोकतंत्र और पर्यावरणीय निरंतरता को ध्यान में रखकर करना चाहिए। समिति के अंदर आने वाली नीति समूह को बनाने का कार्य समिति का ही है। इस समिति की सिफारिश के बाद ही नीति समूह सक्रिय होंगे।" आप' प्रवक्ता ने इस प्रश्न का उत्तर नहीं दिया कि पार्टी अपने दृष्टि दस्तावेज़ पर अंतिम निर्णय कब लेगी। यह आश्चर्य की बात है कि पार्टी ने अभी तक अपनी नीतियों के बारे में नहीं सोचा है जबकि ऐसा माना जा रहा था कि केजरीवाल और उनकी टीम ने कुछ प्रमुख आर्थिक फैसले लिए थे जिसको विशेषज्ञों ने 'दुर्भाग्यपूर्ण' और 'अनिश्चित नीति' का संदेशवाहक बताया। एक महीने से भी कम समय में पार्टी ने राज्य के लिए पानी और बिजली अनुदान की घोषणा कर दी। पार्टी ने पहले की सरकार के रिटेल सेक्टर में सीधा विदेशी निवेश रवैये के विपरीत काम किया।

'लेफ्ट ऑफ लेफ्ट' की आलोचनाओं के बीच, पार्टी के योजना और नीति गुरु योगेन्द्र यादव ने इकनोमिक टाइम्स को दिए हाल ही में एक इंटरव्यू में कहा उनकी पार्टी का प्रस्ताव उससे काफी अलग है जिसे भारत में 'समाजवाद' कहते हैं। यादव ने कहा कि पार्टी आँख बंद कर किसी 'पूर्व प्रत्यय नमूने' पर नहीं चलने वाली और वह सरकार को "निर्णायक, नियामक और सेवा उद्धारकर्ता" की तरह नहीं देखते। यादव का यह वक्तव्य काफी अस्पष्ट है। क्या 'आप' लेफ्ट की नीतियों के ऊपर चलेगी? क्या यह उस भ्रम को तोड़ पायेगी कि सिर्फ राईट विंग के लोग व्यापार और अर्थव्यवस्था से दोस्ताना रख सकते हैं? टीम 'आप' में किसी को न ज्यादा जानकारी है और न ही उन्हें इस बात से कोई फर्क पड़ता है, निगम से सम्बंधित बड़े लोग जो 'आप' में उनके भ्रष्टाचार विरोधी एजेंडा के कारण सम्मिलित हुए, अब इन नीतियों की आलोचना कर रहे हैं और इसपर दृढ़मत नहीं रख पा रहे हैं।

आरबीएस इंडिया की भूतपूर्व प्रधान मीरा सान्याल जो 2009 के चुनाव में स्वतंत्र उम्मीदवार रहीं, 'आप' की पंक्ति में दिखायी देने वाला बड़ा निगम से सम्बंधित चेहरा है। फर्स्टपोस्ट को दिए गए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि वह 'आप' में सम्मिलित इसलिए हुईं क्योंकि वह राजनीति में रचनात्मक योगदान देना चाहती थीं ना कि सिर्फ व्यवस्था को कोसना चाहती थीं। मई में मैं और मेरे पति अरविन्द केजरीवाल से मिले और पाया कि हमारी सोच काफी मिलती थी। उसके कुछ समय बाद तक हमारी बात होती रही और हम उनकी आदर्शवादी सोच, ईमानदारी और साहस से काफी प्रभावित हुए। पार्टी के कई लोगों से हमारी बातचीत ने हमें यह विश्वास दिलाया कि यह ऐसी पार्टी है जो नैतिक मान्यताओं से प्रेरित है और इनमें देश के लिए कुछ करने की चाहत है। यह एक ऐसी चीज़ थी जिससे हमने अपने आप को जोड़ा और इसलिए हमने 'आप' से जुड़ने का फैसला लिया।" हालांकि, जब सान्याल को 'आप' की हाल की नीतियों के बारे में कुछ बोलने को कहा गया उन्होंने यह कह कर मना कर दिया कि उनका कुछ भी बोलना 'पार्टी संचार विज्ञप्ति' के खिलाफ होगा।

एफडीआई पर रोक से निवेश को लगेगा झटका

समीर नैयर, मीडिया कार्यपालक और भूतपूर्व स्टार इंडिया के सीईओ सबसे पहले 'आप' से जुड़े थे। ऐसा माना जाता था कि नैयर पार्टी को 'संचार योजना' में मदद कर रहे थे पर आजकल वह भी चर्चा से दूर हैं। भारत में कम दामों वाले एयरलाइन्स से चर्चा में आये जीआर गोपीनाथ हाल ही में 'आप' से जुड़े हैं। उन्होंने 'आप' के रिटेल में सीधा विदेशी निवेश के विपरीत कदम उठाने पर आलोचना करते हुए कहा है कि वह अल्पाधिकार और 'पूंजीवादी विचारधारा' को बढ़ावा दे रहे हैं। यह निवेशकों के पास गलत सन्देश ले जाएगा कि आर्थिक नीतियों के मद्देनज़र भारत एक अस्थायी देश है।

कुछ ऐसे लोग हैं जिनका मानना है कि सरकार का विदेशी निवेशों के प्रति अपने दरवाज़े बंद कर लेने का यह निर्णय निवेशों को नुकसान पहुंचाएगा, नीति अनिश्चितता बढ़ाएगा और युवाओं को नौकरियां मिलने में परेशानी होगी। रिटेल के राष्ट्रीय आयोग के अध्यक्ष जे सुरेश ने भारतीय उद्योग के संगठन के दौरान कहा कि "यह एक दुःखद निर्णय है और यह तय है कि यह व्यापक रूप से गलत सन्देश भेजेगा। भारत की अस्थायी नीति की धारणा इस बात से मजबूत नहीं होनी चाहिए।" इंडिया इंक ने कहा कि इस निर्णय से दिल्ली में निवेश को एक भारी झटका लगेगा और यह उपभोक्ता की पसंद को नाकारेगा।

अस्‍पष्‍ट आर्थिक नीति

फिक्‍की के अध्यक्ष सिद्धार्थ बिरला ने कहा कि "एक सही विकल्प की खोज के बिना इस सीधी असहमति से राज्य की निवेशीय भावना आहत होगी। मल्टी ब्रांड रिटेल से खाद्य उत्पाद की बर्बादी में कमी होती है, जिससे महंगाई को काबू में किया जा सकता है और सीधा विदेशी निवेश एक दूसरा पूँजी और तकनीकी स्त्रोत है।" आप' की आर्थिक नीतियां लोकवाद से मार्गदर्शित दिखती हैं और यह आर्थिक सिद्धांत नहीं लगते। यह एक विडम्बना ही कही जायेगी कि वह पार्टी 2014 के वर्ल्ड इकनोमिक फोरम में चर्चा में आ गयी जिसने अपनी कोई आर्थिक नीति ही नहीं बनायी है-फिर चाहे वह लेफ्ट हो या राईट। जैसे देश चुनाव की ओर अग्रसर हो रहा है, दूसरी पार्टियां 'आप' की लोकवाद की नक़ल में एक दूसरे के साथ स्पर्धा कर रही हैं। और यह देश के लिए बिलकुल भी अच्छा संकेत नहीं है।

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