Dussehra Special:यूपी के इस गांव में मुसलमान करते हैं 'नीलकंठ' दर्शन का इंतजाम, जानिए इसका महत्त्व
लखनऊ, 5 अक्टूबर: Dussehra 2022 उत्तर प्रदश के देवरिया जिले के एक गांव में दशकों से एक परंपरा है कि गांव के हिंदुओं के लिए नीलकंठ दर्शन का इंतजाम एक मुसलमान परिवार करता है। यह रिवाज कई पीढ़ियों से चली आ रही है और इस बार भी यह शुभ कार्य संपन्न किया गया है। इसके लिए उस मुस्लिम परिवार ने करीब दस दिन पहले ही गांव छोड़ दिया था और जंगलों में भटककर बहुत ही शुभ मानी जाने वाली नीलकंठ पक्षी लेकर लौटा था। नीलकंठ का दर्शन क्यों शुभ माना जाता है, दशहरे पर इसके दर्शन का क्या महत्त्व है और हिंदुओं की धार्मिक मान्यता के प्रति मुसलमानों का विश्वास कैसे बना हुआ है। इस आर्टिकल में इस सब बात पर चर्चा की जा रही है।

मुस्लिम परिवार करवाता है नीलकंठ दर्शन
दशहरे के दिन की शुरुआत इस बार भी नीली गर्दन वाली पक्षी 'नीलकंठ' की तस्वीर के साथ शुभकामना संदेशों से हुई है। सोशल मीडिया पर ऐसी तस्वीरें खूब वायरल हो रही हैं। लेकिन, अगर कोई दूसरों को इस शुभ मानी जाने वाली इस पक्षी का प्रत्यक्ष दर्शन कराने के लिए हफ्ते-दस दिनों तक जंगलों की खाक छानने निकल जाए तो यह बहुत बड़ी बात है। खासकर तब जब ऐसा करने वाले का धर्म अलग हो। उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में एक गांव है रामनगर जहां ना जाने कितने दशकों से यह परंपरा चली आ रही है। एक मुस्लिम परिवार अपने हिंदू भाइयों के लिए कई दिनों तक कड़ी मेहनत करके दशहरे से पहले 'नीलकंठ' पक्षी लेकर आता है, ताकि वह विजयादशमी के दिन सबसे पहले पवित्र नीलकंठ का दर्शन कर सकें।

'इस गांव में यह परंपरा 250 साल पुरानी है'
रामनगर का एक मुस्लिम परिवार इस साल भी 9 दिनों तक भटककर अपने हिंदू भाइयों के लिए पवित्र 'नीलकंठ' पक्षी लेकर आया है। इस बार यह शुभ परिंदा दशहरे के एक दिन पहले ही महानवमी को ही गांव में आ चुका था। हिंदुओं के विजयादशमी को शुभ बनाने के लिए किसी मुस्लिम परिवार का यह समर्पण अपने आप में आश्चर्य की बात है। क्योंकि, इस गांव के लोगों का मानना है कि जब तक नीलकंठ का दर्शन ना कर लें, तबतक दशहरे की शुरुआत नहीं होती। न्यूइंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक गांव के मुस्लिम भाइयों की ओर से निभाई जाने वाली इस परंपरा के बारे में गांव के रामचंद्र यादव ने कहा, 'मुस्लिम परिवार के लोग हमारे लिए नीलकंठ का दर्शन संभव करते हैं। बिना इसके दर्शन किए हम दशहरा पूजा और बाकी कार्यक्रम शुरू नहीं कर सकते। इस गांव में यह परंपरा 250 साल पुरानी है।'

नीलकंठ की तलाश में कई दिन पहले घर छोड़ देता है मुस्लिम परिवार
दशहरा के लिए नीलकंठ का इंतजाम करने की वजह से असत्य पर सत्य की जीत के इस पवित्र त्योहार से हिंदुओं जितना ही मुसलमान भी जुड़े रहते हैं। गांव के लोग बताते हैं कि प्रत्यक्ष दर्शन के लिए नीलकंठ का जुगाड़ करना बहुत मुश्किल काम है। काफी मेहनत करनी पड़ती है। श्री कृष्ण नाम के एक पूर्व पुलिसकर्मी ने बताया कि पहले मुख्तार नाम के व्यक्ति दशहरे के लिए नीलकंठ लेकर आते थे और उनके निधन के बाद उनकी पत्नी जिस्मारा अपने परिवार के इस पवित्र अभियान को जिंदा रख रही हैं। गांव वालों का कहना है कि दशहरे से पहले हर हाल में गांव में नीलकंठ आ जाए, इसके लिए जिस्मारा के परिवार वाले करीब 10 दिन पहले ही उसकी तलाश में गांव छोड़ देते हैं।

दशहरे की रात ही नीलकंठ को आजाद कर दिया जाता है
गांव के हिंदू भाइयों के लिए इस परंपरा को जीवित रखने के बारे में जब जिस्मारा से पूछा गया तो उन्होंने कहा, 'दशहरा से हमें जानवरों और पक्षियों के प्रति दया दिखाने की सीख मिलती है, क्योंकि रावण के कब्जे से माता सीता को वापस लाने के भगवान राम के अभियान में बड़ी संख्या में जानवर और पक्षियों ने भी हिस्सा लिया था।' गांव वालों ने बताया कि दशहरे के दिन गांव के सभी लोग नीलकंठ का दर्शन करते हैं और शाम में हिंदू और मुसलमान दोनों हनुमान मंदिर में जुटते हैं और साथ भजन करते हैं। भजन की अगुवाई लियाकत अली करते हैं, जो कि भगवान राम और माता सीता को समर्पित होता है और हिंदू भक्त भजन में उनका साथ देते हैं। गांव के ही स्कूल में पढ़ाने वाले अजय सिंह का कहना है कि 'पूरे दिन पूजा-पाठ में लगे रहने के बाद जब शाम को हनुमान मंदिर में भजन-कीर्तन समाप्त हो जाता है तो रात में नीलकंठ की आराधना की जाती है, क्योंकि यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। सब धार्मिक कार्य संपन्न होने के बाद दशहरे की रात में ही नीलकंठ को आजाद कर दिया जाता है। '

नीलकंठ दर्शन का महत्त्व
हिंदू आस्था के अुनसार रावण वध से पहले भगवान राम ने नीलकंठ का दर्शन किया था, तभी जाकर उन्हें लंका की लड़ाई में विजयी मिली थी और वे माता सीता को उसके कब्जे से वापस ला पाए थे। सनातन धर्म से जुड़ी पौराणिक कहानियों में नीलकंठ का वर्णन मिलता है। नीलकंठ का शाब्दिक अर्थ है नीला कंठ, जो कि भगवान शिव का प्रतीक है। जब समुद्र मंथन के बाद भगवान भोलेनाथ ने ब्रह्माण्ड की रक्षा के लिए विष ग्रहण किया था, जो उनका कंठ जहर के प्रभाव से नीला हो गया था। उत्तर भारत में एक कहावत प्रचलित है। जब भी लोग नीलकंठ का दर्शन करते हैं तो कहते हैं- 'नीलकंठ तुम नीले रहियो, दूध भात का भोज करियो, हमारी बात भगवान राम से कहियो।'

इन राज्यों का राज्य पक्षी है नीलकंठ
कुछ साल पहले तक उत्तर प्रदेश के बिजनौर में नीलकंठ अक्सर नजर आते थे। लेकिन, अब इसका सामान्य दर्शन काफी दुर्लभ हो गया है। दक्षिणी राज्यों की बात करें तो वहां इसकी संख्या अभी भी ज्यादा है और 50 पक्षी प्रति वर्ग किलोमीटर मौजूद होने का दावा किया जाता है। नीलकंठ या इंडियन रॉलर को आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना ने अपना राज्य पक्षी भी घोषित कर रखा है। (तस्वीरें-सौजन्य: वायरल सोशल मीडिया)
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