इन खूबियों के चलते भाजपा ने दी देवेन्द्र फडणवीस को बिहार चुनाव की जिम्मेदारी

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देवेन्द्र फडणवीस भाजपा नवरत्न समूह के नये 'माणिक्यमणि’ हैं। उन्होंने अपनी चमत्कारी चमक अभी तक केवल महाराष्ट्र में बिखेरी थी। अब इस रत्न की चमक से पूरा देश वाकिफ होगा। महाराष्ट्र का यह मणि अब बिहार में भाजपा का चुनावी मार्ग निष्कंटक बनाएगा। बिहार चुनाव में टिकट वितरण से लेकर गठबंधन समन्वय तक में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। बिहार चुनाव पर पूरे देश की नजर है। कोरोना संकट के बीच यह भारत का पहला विधानसभा चुनाव होगा। भाजपा ने इस चुनाव में अपने ग्रहों की दशा मंगलकारी बनाने के लिए ही इस माणिक्यमणि को धारण किया है। 50 साल के देवेन्द्र फडणवीस आखिर कैसे भाजपा के 'नवरत्न’ बन गये ? उन्हें बिहार चुनाव की अहम जिम्मेदारी क्यों दी गयी ? ऐसा नहीं है कि उन्हें केवल सुशांत मामले को भुनाने के लिए बिहार लाया गया है, वे तो खूबियों की खान हैं। वे दूसरी पीढ़ी से तैयार हो रहे भाजपा के नये खेवनहार हैं।

खूबियों का खजाना हैं फडणवीस
देवेन्द्र फडणवीस में एक नहीं अनेक खूबियां हैं। उन्होंने अपनी सादगी, ईमानदारी, मेहनत और परिश्रम से कम उम्र में ही इतनी बड़ी-बड़ी उपलब्धियां हासिल कर लीं कि उनके नाम का डंका बज गया। जब वे 22 साल के थे तब नागपुर नगर निगम के पार्षद चुने गये। जब 27 साल के हुए तो नागपुर के सबसे युवा मेयर चुने गये। 1997 में जब वे नागपुर के मेयर बने तो उन्होंने देश के दूसरे सबसे कम उम्र के मेयर बनने का रिकॉर्ड बनाया। 29 साल के हुए तो पहली बार विधायक (1999) निर्वाचित हुए। 43 साल की उम्र में ही उन्हें महाराष्ट्र भाजपा के अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी दी गयी। वे भाजपा के सबसे युवा प्रदेश अध्यक्ष हैं। 44 साल की उम्र में देवेन्द्र फडणवीस महाराष्ट्र के दूसरे सबसे युवा मुख्यमंत्री बने। महाराष्ट्र के सबसे युवा मुख्यमंत्री होने का रिकॉर्ड शरद पवार के नाम है जब उन्होंने 1978 में 38 साल की उम्र में इस गौरव को प्राप्त किया था। महाराष्ट्र में भाजपा के किसी नेता के मुख्यमंत्री बनने का सपना देवेन्द्र फडणवीस ने ही पूरा किया था। वे महाराष्ट्र में भाजपा के पहले सीएम हैं। उन्हें व्यापारिक मामलों का विशेषज्ञ माना जाता है। उनकी छवि एक ओजस्वी वक्ता की है और वे किसी भी विषय पर तर्कपूर्ण चर्चा करने की क्षमता रखते हैं। विरोधी भी उनकी इस योग्यता के कायल हैं।

सबके प्रिय नेता
देवेन्द्र फडणवीस विलक्षण प्रतिभा के धनी हैं। महाराष्ट्र भाजपा के कई अधिकारियों का कहना है कि फडणवीस में एक दुर्लभ गुण यह है कि वे अपनी बात पर हमेशा कायम रहते हैं। अपनी कही बात से कभी पलटते नहीं। आज की राजनीति में ऐसे लोग खोजे नहीं मिलते। इस गुण के कारण वे सभी लोगों के प्रिय हैं। उनसे बड़ी उम्र के नेता भी उन्हें सम्मान की नजर से देखते हैं। संगठन सहकर्मियों के मुताबिक फडणवीस जमीन से जुड़े नेता हैं जो सबको साथ लेकर चलते हैं। उनकी बेदाग छवि उन्हें और विशिष्ट बनाती है। 2013 में जब देवेन्द्र फडणवीस को महाराष्ट्र भाजपा का अध्यक्ष बनाया गया था उस समय प्रदेश संगठन में उथल-पुथल की स्थिति थी। भाजपा की स्थानीय राजनीति में वर्चस्व के लिए नितिन गडकरी और गोपीनाथ मुंडे में रस्साकशी चल रही थी। देवेन्द्र फडणवीस इस गुटबाजी से अलग संगठन के काम में जुटे हुए थे। लेकिन कुछ लोगों का मानना था कि देवेन्द्र गोपीनाथ मुंडे से सहानुभूति रखते थे। इस गुटबाजी को खत्म करने के लिए भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने युवा देवेन्द्र पर दांव खेलने का फैसला किया। जैसे ही नये प्रदेश अध्यक्ष के रूप में उनके नाम पर मुहर लगी देवेन्द्र सबसे पहले नितिन गड़करी के घर गये। उन्होंने नितिन गड़करी से अपनी नयी जिम्मेवारी के लिए आशीर्वाद मांगा। इस अतिशय सम्मान को देख कर नितिन गड़करी गदगद हो गये। फिर तो वे उनके प्रिय नेता बन गये। देवेन्द्र फडणवीस सबको मिला कर चलने वाले नेता साबित हुए जिससे महाराष्ट्र भाजपा की गुटबाजी बेअसर हो गयी। या यूं कहें कि खत्म हो गयी।

“केवल ब्राह्मण होने के चलते मुझे खारिज नहीं कर सकते”
देवेन्द्र फडणवीस का जन्म नागपुर के एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता गंगाधर राव फडणवीस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के समर्पित कार्यकर्ता थे। वे महाराष्ट्र विधान परिषद के सदस्य भी रहे। वे स्नातक कोटे वाली सीट से विधान पार्षद चुने गये थे। उन्होंने अपने पुत्र देवेन्द्र में उच्च संस्कारों के बीज डाले। गंगाधर राव ने देवेन्द्र को ईमानदारी के साथ खुद अपनी राह बनाने की सीख दी। देवेन्द्र मेहनत और समर्पण के साथ संघ और भाजपा के लिए काम करने लगे। जो भी जिम्मेदारी मिली सफलतापूर्वक निर्वहन किया। जब वे भाजपा की राजनीति में सक्रिय हुए तो जातिवादी राजनीति की बेडियां उनकी राह रोकने लगीं। मौजूदा राजनीति में संख्याबल के लिहाज से सवर्णों की उपयोगिता कम हो रही थी। लेकिन देवेन्द्र इन बातों की अनदेखी कर आगे बढ़ते रहे। पार्टी में उनकी लोकप्रियता बढ़ रही थी। उन्होंने आगे बढ़ने के लिए अपना नया तर्क गढ़ा। उनका कहना था, मैं उत्तरदायित्व की हर परीक्षा में पास होता रहा हूं। परीक्षा के परिणाम मेरी योग्यता के प्रमाण हैं। आप मेरा आकलन जाति से नहीं बल्कि मेरी योग्यता से कीजिए। आप केवल मुझे इसलिए नहीं खारिज कर सकते क्यों कि मैं ब्राह्मण हूं। जाति आधारित राजनीति में ऐसा कहने का साहस शायद ही किसी नेता में हो। देवेन्द्र फडणवीस का यही आत्मविश्वास उनका सबसे बड़ा संबल बना। 2014 में जब नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री बने तो राजनीति नया शक्ल अख्तियार करने लगी। नरेन्द्र मोदी ने योग्यता और छवि को अपने चयन का आधार बनाया। उन्होंने जब अक्टूबर 2014 में एक ब्राह्मण नेता देवेन्द्र फडणवीस को महाराष्ट्र का मुख्यमंत्री बनाया तो देश के सारे सोशल इंजीनियर हक्के-बक्के रह गये। फडणवीस ने अपनी योग्यता से राजनीति की प्रचलित धारा को मोड़ दिया था। इन्हीं खूबियों के कारण भाजपा ने उन्हें बिहार चुनाव की बड़ी जिम्मेवारी सौंपी है।












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