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डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर: नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में प्रगति पर नज़र

डीबीटी का मतलब है कि सरकार द्वारा प्रदान की जाने वाले सब्सिडी लाभ को चेक जारी करने,नकद भुगतान या सेवाओं अथवा वस्तुओं पर कीमत छूट प्रदान करने की बजाय सीधे लाभार्थी के खाते में स्थानांतरित करना होता है।

नई दिल्ली। डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी )या प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण विश्व में सामाजिक कल्याण के लाभ को प्रदान करने के प्रमुख साधन के रूप में तेजी से उभर रहा है। भारत को भी इस तंत्र की क्षमता का एहसास हुआ और कई पायलट कार्यक्रम यूपीए सरकार द्वारा शुरू किए गए। हालाँकि, पिछली सरकार के शुरुआती प्रयास कम वित्तीय समावेशन और अपर्याप्त आईटी इन्फ्रास्ट्रक्चर के कारण बुरी तरह से विफल रहे। क्या मोदी सरकार ने डीबीटी की वास्तविक क्षमता को साकार करने के लिए कुछ अलग किया है? प्रधानमंत्री मोदीजी के नतृत्व में डीबीटी पर क्या प्रगति हुई है?

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डीबीटी क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?

अगर आम भाषा में कहें तो, डीबीटी का मतलब है कि सरकार द्वारा प्रदान की जाने वाले सब्सिडी लाभ को चेक जारी करने, नकद भुगतान या सेवाओं अथवा वस्तुओं पर कीमत छूट प्रदान करने की बजाय सीधे लाभार्थी के खाते में स्थानांतरित करना होता है। यह तर्क दिया जाता है कि डीबीटी से सामाजिक कल्याण प्रणाली में सरकारी धन की चोरी काफी कम हो जाती है। इस तंत्र के माध्यम से कई सरकारी कार्यक्रमों में मध्यस्थों की भूमिका भी समाप्त हो जाती है जिसके कारण चोरी रुक जाती है।

मोदीजी सरकार के नेतृत्व में प्रगति किस प्रकार हुई है?

सभी अच्छी सोच की तरह, किसी भी राष्ट्र के लिए डीबीटी का क्रियान्वयन बेहद कठिन काम है। इसमें विभिन्न विभागों के एक साथ समेकित प्रयास के साथ-साथ एक बहु-आयामी पहल की आवश्यकता होती है। मूल आवश्यकता के रूप में भरपूर वित्तीय समावेशन और पर्याप्त आईटी इन्फ्रास्ट्रक्चर होना जरूरी है। ऐसा लगता है कि मोदी सरकार ने सरकारी कार्यक्रमों में डीबीटी को लागू करने के लिए एक व्यवस्थित पहल की है। यूपीए सरकार के अतंर्गत एलपीजी सब्सिडी के लिए डीबीटी के असफल होने के कारणों में से एक कारण बैंकिंग सुविधाओं की सीमित पहुंच और बुनियादी ढांचे की कमी थी। इसके विपरीत, एनडीए ने पहली बार वित्तीय समावेशन के लिए एक विशाल कार्यक्रम जन-धन योजना की शुरूआत की जिससे निम्न वर्ग के लिए बैंक सुलभ हुए। डीबीटी की सफलता के लिए 28 करोड़ से अधिक जन धन खाते अतिमहत्वपूर्ण साबित हुए। इसके साथ ही, आधार जारी करने में सुविधा विस्तार और आधार संख्या को बैंक खाते के साथ जोड़ने पर सरकार ने बहुत ध्यान दिया जिससे डीबीटी पहल को लागू करने में बहुत मदद मिली। वर्तमान में, 15 से अधिक मंत्रालयों की 80 से अधिक योजनाएं डीबीटी के अंतर्गत आती हैं।

सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार, डीबीटी लागू होने से पिछले तीन सालों में 50,000 करोड़ रूपए से अधिक की बचत हुई है। यूपीए के कार्यकाल के दौरान, 2013-14 में डीबीटी के माध्यम से लगभग 7,367 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था जिससे लगभग 10.71 करोड़ लोगों को फायदा मिला। एनडीए के नेतृत्व में वर्ष 2016-17 के लिए यह राशि बढ़कर 74,502 करोड़ रुपये हो गई और 33 करोड़ से अधिक लोगों को फायदा मिला।

पहल -एक सफलता

एलपीजी सब्सिडी की डीबीटी के लिए नवंबर 2014 में "पहल" कार्यक्रम की घोषणा की गई। शुरू में इसे स्वैच्छिक पंजीकरण के रूप में लागू किया गया, अब एलपीजी सब्सिडी को केवल डीबीटी के माध्यम से ही दिया जाता है। वर्तमान में, 17.50 करोड़ से अधिक एलपीजी उपभोक्ता अपने बैंक खाते में सीधे सब्सिडी प्राप्त करते हैं। इस योजना की सफलता से सरकार को सिलेंडर की काला बाज़ारी रोकने में मदद मिली है।

मिट्टी के तेल में डीबीटी

अपनी पहल को आगे बढ़ाते हुए, सरकार की देश भर में मिट्टी के तेल की सब्सिडी को डीबीटी के माध्यम से देने की योजना बना रही है। एक केंद्रीय प्रोत्साहन योजना शुरू होगी जहाँ राज्यों को पहले चार सालों के लिए वार्षिक स्लैब आधारित प्रोत्साहन राशि प्राप्त होगी। यह योजना देश के कई राज्यों द्वारा पहले ही अपनाई जा चुकी है।

उर्वरक सब्सिडी -डीबीटी के माध्यम से सुधार

बहुप्रतीक्षित उर्वरक सब्सिडी सुधार योजना की वर्ष 2017 के खरीफ फसल के दौरान लागू होने की उम्मीद है। 70,000 करोड़ रूपए की उर्वरक सब्सिडी को 2 लाख प्वाइंट-ऑफ-सेल (पीओएस) के माध्यम से किसान के बॉयोमेट्रिक प्रमाणीकरण द्वारा पूरे देश में बाँटें जाने की उम्मीद है। बिक्री के बाद की सब्सिडी योजना को 17 जिलों में पहले ही पायलट योजना के रूप में शुरू की जा चुकी है। अगर इसे ठीक से लागू किया गया तो, यह एक ऐतिहासिक आर्थिक सुधार होगा और खाद सब्सिडी में बड़े पैमाने पर हो रही चोरी को कम करने में मील का पत्थर साबित हो सकता है।

निष्कर्ष

डीबीटी के सफलता से लागू होने पर सरकारी कार्यक्रमों तक पहुँचने के लिए नागरिकों द्वारा महसूस किए जा रहे "मूल स्तर" के भ्रष्टाचार को कम करने में यह महत्वपूर्ण साधन साबित होगा। चोरी में कमीं से लोगों में सरकारी कार्यक्रमों के प्रति अवधारणा बदलेगी और बढ़े हुए विश्वास से पंजीकरण में और बढ़ोत्तरी हो सकती है। इसके साथ ही, अगर सरकार यूनिवर्सल बेसिक इंकम (यूबीआई) को लागू करने का फैसला करती है तो डीबीटी के लिए बनाया गया बुनियादी ढांचा भविष्य में महत्वपूर्ण साबित होगा। इससे एक कदम आगे बढ़ते हुए, सरकार का अनुमान है कि जेएएम त्रिमूर्ति (जन धन - आधार - मोबाइल) डीबीटी कार्यक्रम को बढ़ावा देने में मददगार साबित होगा।

(नितिन मेहता, मैनेजिंग पार्टनर, रणनीती कंसल्टिंग एण्ड रिसर्च। प्रणव गुप्ता एक स्वतंत्र शोधकर्ता हैं।)

अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

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