दिलीप घोष: पश्चिम बंगाल में बीजेपी का कायाकल्प करने वाले जीत का उद्घोष करेंगे?

दिलीप घोष: पश्चिम बंगाल में बीजेपी का कायाकल्प करने वाले

"देश और समाज सेवा के प्रति बचपन से ही मेरे मन में झुकाव था. तब राज्य में नक्सलवाद चरम पर था और पश्चिम मेदिनीपुर ज़िला भी उससे अछूता नहीं था. खेलों में भी मेरी रुचि थी. उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इलाक़े के स्कूलों में बच्चों को फ़ुटबॉल और एथेलेटिक्स की ट्रेनिंग दे रहा था. वहीं से मेरे मन में संघ के प्रति लगाव पैदा हुआ. संघ कार्यकर्ताओं के संपर्क में आने के बाद ही मुझे आरएसएस, जनसंघ और उसके संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बारे में जानने को मिला."

पश्चिम बंगाल के प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष दिलीप घोष कुछ इसी तरह अपने बचपन और संघ के प्रति शुरुआती लगाव के बारे में बताते हैं.

संघ से नाता

पार्टी के ज़्यादातर नेता बीजेपी को टीएमसी और ममता बनर्जी को कड़ी चुनौती देने की स्थिति में लाने का श्रेय दिलीप घोष को देते हैं.

बीजेपी की राजनीति पर क़रीब से निगाह रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार तापस मुखर्जी कहते हैं, "बीते पाँच-छह वर्षों से भले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ही राज्य में होने वाले तमाम चुनावों में पार्टी के स्टार प्रचारक रहे हों. लेकिन यह घोष ही हैं, जिन्होंने लेफ़्ट और काँग्रेस को धकेलते हुए पाँच साल के भीतर ही बीजेपी को प्रमुख विपक्षी पार्टी के तौर पर स्थापित किया. अब इसी ताक़त के बूते पार्टी 200 से ज़्यादा सीटें जीत कर सरकार बनाने के दावे कर रही है."

दिलीप घोष: पश्चिम बंगाल में बीजेपी का कायाकल्प करने वाले

उनका कहना है कि वर्ष 2013 के पंचायत चुनावों में जहाँ पार्टी कुल 58,692 में से नौ हज़ार सीटों पर ही उम्मीदवार खड़ा कर सकी थी, वहीं 2018 में उसने न सिर्फ़ 34 हज़ार से ज़्यादा सीटों पर उम्मीदवार उतारे, बल्कि क़रीब साढ़े छह हज़ार सीटें जीत कर टीएमसी के बाद दूसरे नंबर पर आ गई.

वोट शेयर भी 2013 के तीन फ़ीसदी के मुक़ाबले 23 फ़ीसदी तक पहुँच गए. इसी तरह 2019 के लोकसभा चुनाव में भी पार्टी को दो से 18 सीटों तक पहुँचाने में उनकी अहम भूमिका की अनदेखी नहीं की जा सकती.

प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष बनने से पहले आम लोग उनका नाम तक नहीं जानते थे. लेकिन उनके राजनीतिक और सांगठनिक कौशल की बदौलत अब यह नाम घर-घर पहुँच चुका है.

पत्रकार पुलकेश घोष बताते हैं, "राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से आए दिलीप घोष ने 2015 में प्रदेश बीजेपी की कमान ऐसे मुश्किल दौर में संभाली, जब पार्टी में अंदरुनी गुटबाज़ी चरम पर थी. तब पार्टी में कई गुट बन गए थे. उसी दौरान 2016 के विधानसभा चुनावों से पहले केंद्रीय नेतृत्व ने तत्कालीन अध्यक्ष राहुल सिन्हा को हटा कर बंगाल की ज़िम्मेदारी घोष को सौंपी."

दिलीप घोष: पश्चिम बंगाल में बीजेपी का कायाकल्प करने वाले

लोकसभा में बीजेपी को दो से 18 सीट दिलाने में किरदार

इसके बाद उन्होंने संगठन में व्यापक फेरबदल किए और प्रदेश से ज़िलास्तर तक तमाम पदाधिकारियों को बदल डाला.

ख़ुद उन्होंने 2016 के लोकसभा चुनावों में पूर्व मेदिनीपुर ज़िले की खड़गपुर सदर सीट पर काँग्रेस के दिग्गज ज्ञानसिंह सोहनपाल को हराया, जो (ज्ञानसिंह) लगातार सात बार उस सीट से जीत चुके थे.

उसके बाद 2019 में वे लोकसभा का चुनाव जीते. लेकिन सांसद होने के बावजूद ज़्यादातर समय वे बंगाल में ही गुज़ारते हैं. उन्हें ज़ेड प्लस सुरक्षा दी गई है और बीते वर्ष उन्होंने अपना आवास भी बदल दिया है.

2019 के लोकसभा चुनावों में घोष के ही नेतृत्व में पार्टी ने शानदार प्रदर्शन किया. बीजेपी की सीटें 2014 के मुक़ाबले दो से बढ़ कर 18 पहुँच गई. यहाँ तक कि वोट शेयर भी 40.25 फ़ीसदी पर पहुँच गया.

खुद घोष भी मेदिनीपुर लोकसभा सीट से 88 हज़ार से ज़्यादा वोटों के अंतर से जीते. उसी वर्ष वे राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के शिष्ट मंडल के सदस्य के तौर पर सात दिनों के अफ़्रीकी दौर पर भी भेजे गए.

20 की उम्र में पूर्णकालिक प्रचारक बने

1 अगस्त 1964 को पश्चिम मेदिनीपुर ज़िले में सुवर्णरेखा नदी के किनारे बसे कुलियाना गाँव में जन्मे घोष, पिता भोलानाथ घोष और माँ पुष्पलता देवी की चार संतानों में से दूसरे नंबर पर हैं.

गाँव में प्राथमिक तक पढ़ाई करने के बाद स्कूली शिक्षा मामा के घर हुई. घोष के मुताबिक, उसके बाद उन्होंने झाड़ग्राम पॉलिटेकनिक में पढ़ाई की और दो साल तक महिंद्रा एंड महिंद्रा कंपनी में भी काम किया. लेकिन नियति तो कुछ और ही थी.

दिलीप घोष: पश्चिम बंगाल में बीजेपी का कायाकल्प करने वाले

घोष 20 साल की उम्र में वर्ष 1984 में आरएसएस के पूर्णकालिक प्रचारक बन गए थे. उन्होंने अपने माता-पिता से कहा था कि वे घर बनाने में नहीं, बल्कि राष्ट्र के निर्माण में योगदान देना चाहते हैं. उन्होंने लंबे समय तक अंडमान द्वीप समूह में भी काम किया है.

वैसे तो आरएसएस प्रचारक के तौर पर उनका ज़्यादातर समय पूर्वी भारत में ही बीता है. लेकिन वे पश्चिमी और दक्षिण भारत में भी काम कर चुके हैं. आरएसएस के तत्कालीन प्रमुख केएस सुदर्शन ने घोष को अपने दफ़्तर में सचिव बनाया था. जानकारों के मुताबिक़ घोष को उनका बेहद क़रीबी माना जाता था.

अंडमान निकोबार द्वीप समूह में चार साल तक रहने के दौरान उन्होंने 2004 की सुनामी के दौरान आरएसएस के बचाव अभियान में अहम भूमिका निभाई थी. इसके साथ ही वे द्वीप पर काम करने वाले विदेशी ग़ैर-सरकारी संगठनों की गतिविधियों पर भी नज़दीकी निगाह रखते थे.

उनके काम को देखते हुए बीजेपी के कई केंद्रीय नेता घोष को पार्टी में लेना चाहते थे. लेकिन घोष के मुताबिक, सुदर्शन ने इसकी इजाज़त नहीं दी. वे ख़ुद भी आरएसएस के साथ काम करते हुए बेहद संतुष्ट थे.

घोष जल्दी ही आरएसएस के सहयोगी संगठन हिंदू जागरण मंच के पूर्वी भारत प्रमुख बन गए और 2015 तक वहाँ काम किया. उस साल उनको बंगाल बीजेपी का महासचिव बनाया गया और कुछ महीने बाद ही पार्टी की कमान सौंप दी गई.

घोष के कमान संभालने के बाद अब बीजेपी को आरएसएस के अलावा बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद और हिंदू जागरण मंच जैसे सहयोगी संगठनों का भी पूरा समर्थन हासिल है. घोष बीते कई महीनों से लगातार पार्टी की जड़ें मज़बूत करने की रणनीति के तहत उत्तर और दक्षिण 24-परगना ज़िलों के अल्पसंख्यक बहुल इलाक़ों का दौरा कर रैलियाँ आयोजित करते रहे हैं.

आम लोगों से संपर्क

घोष हर रोज तड़के उठकर मार्निंग वॉक पर निकलते हैं. इस दौरान वे चाय पर आम लोगों से मुलाक़ात कर उनकी समस्याओं को सुनते हैं. उनकी यह दिनचर्या लंबे समय से चल रही है.

बीजेपी के एक महासचिव बताते हैं, "मैंने पहले कभी ऐसा कोई नेता नहीं देखा, जो पार्टी के काम में इतना डूबा रहे. सुबह से देर रात तक वे या तो कार्यकर्ताओं से बात कर रहे होते हैं या फिर कहीं रैली को संबोधित कर रहे होते हैं. उनकी पूरी दिनचर्या पार्टी को आगे बढ़ने के ईर्द-गिर्द ही सिमटी रहती है."

दरअसल, घोष के कमान संभालने के बाद ही पार्टी ने राज्य में टीएमसी का जवाब आक्रामक रूप से देना शुरू किया.

उन्होंने छोटी से छोटी बात को मुद्दा बनाते हुए राज्य सरकार को घेरा और अब हालत यहाँ तक पहुँच गई है कि बीजेपी के सत्ता में आने की स्थिति में राजनीतिक हलकों में उनको मुख्यमंत्री की कुर्सी की होड़ में शीर्ष उम्मीदवार माना जा रहा है. हालाँकि, केंद्रीय नेतृत्व ने अब तक किसी को मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं बनाया है. इसकी वजह यह है कि पार्टी में कई लोग इस पद के दावेदार हैं.

हिंदुत्व को नहीं बनाते मुद्दा

2021 के चुनावों की तैयारी घोष लंबे समय से कर रहे हैं. बीते छह-सात महीनों के दौरान वे दुनिया भर के 30 से ज़्यादा देशों में रहने वाले बंगालियों के साथ वीडियो कॉल पर बातें करते रहे हैं.

घोष बताते हैं, "प्रवासी बंगाली राज्य में भावी बदलाव से उत्साहित हैं. ज़्यादातर ने बंगाल लौट कर इसके विकास में योगदान करने का भरोसा दिया है."

आरएसएस का आदमी होने के बावजूद घोष ख़ासकर बंगाल के ग्रामीण इलाक़ों में अपने भाषणों में हिंदुत्व पर ज़ोर नहीं देते.

राजनीतिक पर्यवेक्षक प्रोफेसर समीरन पाल कहते हैं, "उनका निशाना राज्य सरकार का भ्रष्टाचार और आतंक पर ही होता है. इससे अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों में भी बीजेपी के प्रति धारणा कुछ हद तक बदली है."

दिलीप घोष: पश्चिम बंगाल में बीजेपी का कायाकल्प करने वाले

घोष की भाषा पर आपत्ति

लेकिन कुछ लोग घोष की आक्रामकता पसंद नहीं करते. हैदराबाद की एक सॉफ़्टवेयर कंपनी में काम करने वाले कोलकाता के सुनंद घोष कहते हैं, "घोष एक कट्टर हिंदू नेता हैं. लेकिन उनको अभी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ से बहुत कुछ सीखना होगा. योगी प्रशासनिक मामलों में तो कड़ा रुख़ अपनाते हैं. लेकिन बातचीत में कट्टरता नहीं दिखाते."

दूसरी ओर, घोष के रवैए का समर्थन करने वालों की भी कमी नहीं है. उत्तर 24 परगना ज़िले के अल्पसंख्यक बहुल सीमावर्ती इलाके में अपनी दुकान चलाने वाले श्यामल मित्र कहते हैं, "घोष ही ममता से मुक़ाबले के लिए सबसे आदर्श और सक्षम नेता है. क्या हम वामपंथियों की भाषा भूल गए हैं? विपक्ष में रहते ममता की भाषा को भी याद रखना चाहिए? उनकी पार्टी (टीएमसी) के लोगों ने तो विधानसभा में भी तोड़-फोड़ की थी."

घोष के कट्टर आलोचक भी इस बात से सहमत हैं कि महज पाँच-छह वर्षों में ही उन्होंने बंगाल में बीजेपी का कायाकल्प कर दिया है.

लेफ़्ट के सत्ता में रहने के दौरान राज्य में बीजेपी का कोई वजूद नहीं था. भले उसके दो नेता लोकसभा चुनाव जीत कर केंद्र में मंत्री बने थे. घोष ने अपने कार्यकाल में कई कट्टर वामपंथियों को भी बीजेपी में लाने में कामयाबी हासिल की है.

आरएसएस के एक कार्यकर्ता बताते हैं कि घोष में कड़े फ़ैसले लेने और उनको अक्षरशः लागू करने की अद्भुत क्षमता है. उनकी निगाहें कभी लक्ष्य से नहीं भटकतीं.

दिलीप घोष: पश्चिम बंगाल में बीजेपी का कायाकल्प करने वाले

"सभ्यता और संस्कृति भी सीख लूंगा"

प्रदेश बीजेपी के एक नेता नाम नहीं छापने की शर्त पर बताते हैं कि वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी की भारी कामयाबी के बाद घोष को केंद्र में मंत्री बनने का भी प्रस्ताव दिया गया था. लेकिन विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए उन्होंने राज्य में ही काम करने की इच्छा जताई थी.

तृणमूल काँग्रेस नेता घोष पर तमाम आरोप लगाते रहे हैं. ममता के भतीजे और डायमंड हार्बर सीट से टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी उनको गुंडा तक कह चुके हैं.

टीएमसी के प्रवक्ता सौगत राय भी उनको असभ्य कह चुके हैं.

राज्य के पंचायत मंत्री सुब्रत मुखर्जी कहते हैं, "घोष की हिंसा की राजनीति के लिए बंगाल में कोई जगह नहीं है. वे अपने विरोधियों के ख़िलाफ़ हिंसा के समर्थक हैं."

लेकिन घोष का कहना है, "अगर मैं ऐसा नहीं रहूँ, तो चोरों और डकैतों से निपटने में कामयाब नहीं हो सकता. यहाँ सरकार बनाने के बाद मैं सभ्यता और संस्कृति भी सीख लूँगा. जहाँ तक आक्रामक रवैए की बात है, मैं अपने उन राजनीतिक विरोधियों का हँस कर स्वागत नहीं कर सकता, जिन लोगों ने मेरी पार्टी के 130 कार्यकर्ताओं की हत्या की है."

काँग्रेस के एक वरिष्ठ नेता नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं, "मैं दिलीप की भाषा और टिप्पणियों से सहमत नहीं हूँ. लेकिन उनमें एक बात ऐसी है, जो बंगाल में बहुत कम नेताओं के पास है. और वह है रीढ़ की हड्डी."

दिलीप घोष: पश्चिम बंगाल में बीजेपी का कायाकल्प करने वाले

घोष से जुड़े विवादों की लंबी है फ़ेहरिस्त

घोष ने बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर पार्टी के भीतर और बाहर भले काफ़ी प्रशंसा बटोरी हो, उनके साथ विवाद भी कम नहीं जुड़े हैं.

चुनाव आयोग के समक्ष पेश हलफ़नामे में उन्होंने झाड़ग्राम स्थित पॉलिटेक्निक कॉलेज से इंजीनियरिंग में डिप्लोमा की पढ़ाई का दावा किया था. इस मुद्दे पर कलकत्ता हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका भी दायर की गई थी. लेकिन अदालत ने उसे ख़ारिज कर दिया.

इलाक़े में स्थित एकमात्र ईश्वर चंद्र विद्यासागर पॉलिटेक्निक ने तब कहा था कि घोष ने 1975 से 1990 के बीच डिप्लोमा की पढ़ाई नहीं की थी.

देश में कोरोना वायरस महामारी के फ़ैलने के बाद उन्होंने कहा था कि गोमूत्र पीने में कोई बुराई नहीं है और वे खुद इसका सेवन करते हैं. इससे कोरोना ठीक हो सकता है. उनके इस बयान की काफ़ी आलोचना हुई थी.

उसी साल यानी सितंबर 2020 में उन्होंने कहा कि बंगाल में कोरोना महामारी ख़त्म हो चुकी है और ममता बनर्जी ने राज्य में जान-बूझ कर लॉकडाउन किया है, ताकि बीजेपी को रैलियों के आयोजन से रोका जा सका.

बंगाल को कोरोना-मुक्त घोषित करने वाले घोष इसके एक महीने बाद 16 अक्तूबर 2020 को ख़ुद कोरोना की चपेट में आ गए और उन्हें एक निजी अस्पताल में भर्ती होना पड़ा.

2016 के विधानसभा चुनावों के बाद उसी साल सितंबर में वे पार्टी के ख़र्च पर एक हफ़्ते के लिए अमेरिका के दौरे पर गए थे. उनका मक़सद पश्चिम बंगाल में हिंदुओं पर होने वाले कथित अत्याचार और बांग्लादेश से मुसलमानों के कथित घुसपैठ का प्रचार करना था.

घोष ने एक बार सड़क पर बीफ़ के सेवन के लिए कुछ बुद्धिजीवियों की आलोचना करते हुए उनसे घर में कुत्ते का मांस खाने को कहा था.

चाय पे चर्चा नामक अपने अभियान के दौरान एक बार उन पर हमला भी हुआ. घोष ने इसके लिए तृणमूल क़ाँग्रेस को ज़िम्मेदार ठहराया था.

बीते साल जनवरी में दोबारा प्रदेश अध्यक्ष नियुक्त होने के बाद उन्होंने कहा था कि टीएमसी के शासनकाल में बंगाल राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का केंद्र बन गया है.

इसी तरह एक बार उन्होंने विवादास्पद नागरिकता क़ानून (सीएए) का विरोध करने वाले बुद्धिजीवियों को शैतान और परजीवी कहा था.

इसके अलावा वे अपनी रैलियों में विरोधियों के ख़िलाफ़ अभद्र भाषा का इस्तेमाल करने के साथ ही हिंसा का जवाब हिंसा से देने जैसी टिप्पणियाँ भी कर चुके हैं.

मई 2016 में उन्होंने यह कह कर विवाद खड़ा कर दिया था कि जादवपुर विश्वविद्यालय की छात्राओं का स्तर काफी नीचे है और वे बेशर्म हैं. हमेशा छात्रों के साथ का मौक़ा तलाशती रहती हैं.

इसी तरह अगस्त, 2019 में उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को टीएमसी कार्यकर्ताओं और पुलिस की हिंसा का जवाब हिंसा से देने के लिए कहा था.

उसके अगले महीने ही उन्होंने जादवपुर विश्वविद्यालय के छात्रों को राष्ट्रविरोधी औऱ आतंकवादी करार देते हुए कहा था कि पार्टी परिसर से वामपंथियों को खदेड़ने के लिए वहाँ बालाकोट जैसी सर्जिकल स्ट्राइक करेगी. घोष के विवादास्पद बयानों की वजह से उनके ख़िलाफ़ कई मामले भी दर्ज हो चुके हैं.

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+