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उत्तर प्रदेश के चुनाव में क्या प्रियंका गांधी फ़ेल हो गईं

उत्तर प्रदेश की 403 सीटों वाली विधानसभा चुनाव के नतीजों में बीजेपी को स्पष्ट बहुमत मिला है. यहां एक तरफ़ योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बीजेपी एक बार सत्ता पर क़ाबिज़ होने वाली है, तो दूसरी तरफ़ केंद्र की राजनीति में दूसरी बड़ी पार्टी की भूमिका निभाने वाली कांग्रेस राज्य में दो सीटों पर सिमट गई है.

2017 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को कुल सात सीटें मिली थीं और पार्टी का मत प्रतिशत 6.25 फ़ीसदी था. वहीं इस बार चुनाव में उसका मत प्रतिशत घटकर 2.34 फ़ीसदी रह गया है.

नतीजे आने के बाद प्रियंका ने ट्वीट कर ये स्वीकार किया कि पार्टी अपनी मेहनत को वोट में तब्दील करने में कामयाब नहीं हुई. उन्होंने लिखा, "लोकतंत्र में जनता का मत सर्वोपरि है. हमारे कार्यकर्ताओं और नेताओं ने मेहनत की, संगठन बनाया, जनता के मुद्दों पर संघर्ष किया. लेकिन, हम अपनी मेहनत को वोट में तब्दील करने में कामयाब नहीं हुए."

हालांकि विधानसभा चुनाव के नतीजों से पहले प्रियंका गांधी वाड्रा ने पार्टी कार्यकर्ताओं से बात की थी और उन्हें कहा था कि वे मायूस ना हों. उनका कहना था, "हमारी लड़ाई अभी बस शुरू हुई है और हमें नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ना है."

वहीं कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने ट्वीट कर कहा, "मैं नतीजों को विनम्र भाव से स्वीकार करता हूं. उन लोगों को बधाई जिन्हें जनादेश मिला. मैं कांग्रेस के तमाम कार्यकर्ताओं का उनकी मेहनत के लिए आभार व्यक्त करता हूं. हम इससे सबक लेंगे और लोगों के हित में काम करते रहेंगे."

ऐसे में इस बात की चर्चा तेज़ है कि क्या कांग्रेस को इस बात का अंदाज़ा था कि वो इस चुनाव में जीत से कोसों दूर रहेगी? हालांकि पार्टी की महासचिव प्रियंका गांधी ने विधानसभा चुनाव के दौरान राज्य में पार्टी के पंजे को मज़बूती से संभाला और रोड शो और रैलियों के ज़रिए भीड़ भी बहुत जुटाई, लेकिन वो इसे वोटों में तब्दील करने में नाकामयाब रहीं.

https://twitter.com/priyankagandhi/status/1468477314535100419

प्रियंका गांधी ने उत्तर प्रदेश चुनाव के मद्देनज़र, 'लड़की हूं लड़ सकती हूं' का नारा दिया और लखनऊ में 'महिला घोषणापत्र' या 'वीमेन्स मेनिफ़ेस्टो' जारी करते हुए कहा कि उनकी पार्टी की प्राथमिकता महिलाएं होंगी.

साथ ही उन्होंने महिला सशक्तीकरण के लिए कई वायदे किए जिसमें प्रमुख था 40 फ़ीसद सीटों पर महिलाओं की उम्मीदवारी.

वे अपने इस वायदे पर खरी भी उतरीं और पार्टी ने पहली सूची में ही 50 महिलाओं को अपना उम्मीदवार चुना. इनमें ऐसी कई महिला उम्मीदवार थीं जिन्होंने पहले कभी चुनाव नहीं लड़ा था.

प्रियंका गांधी
BBC
प्रियंका गांधी

लीडरशिप पर सवाल

वरिष्ठ पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी कहते हैं, "प्रियंका गांधी का 40 फ़ीसद टिकट दिए जाने की घोषणा एक पब्लिसिटी स्टंट था. इसका न ही कोई राजनीतिक आधार था और न ही सामाजिक."

इसी बात को आगे बढ़ाते हुए वरिष्ठ पत्रकार अमिता वर्मा कहती हैं कि ''ये प्रियंका गांधी की लीडरशिप पर सवाल उठाता है. उन्होंने अपना ध्यान चुनाव प्रचार पर केंद्रित रखा, लेकिन कांग्रेस में चल रही अंदरूनी लड़ाई पर उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया. साथ ही उनका कैंपेन राजनीतिक से ज़्यादा सामाजिक लगा.

वे कहती हैं, "कांग्रेस के राज्य में जो चेहरे थे जैसे जितिन प्रसाद, आरपीएन सिंह और ललितेशपति त्रिपाठी वो उनसे नाराज़ थे. उन्होंने सोनिया गांधी को लिखा, राहुल गांधी के पास गए और उन्होंने कहा कि प्रियंका गांधी से बात करो, लेकिन उन्होंने मुलाक़ात ही नहीं की. इतने लोग पार्टी छोड़ कर गए, उन्हें हटाया गया, लेकिन संगठन पर उन्होंने ध्यान ही नहीं दिया, जो कमज़ोर हो रहा था. वहीं जिन महिलाओं को टिकट दिया गया उनमें कोई बढ़िया उम्मीदवार ही नहीं था और विक्टिम कार्ड खेलने की कोशिश की गई, जैसेकि रेप पीड़ित की मां को टिकट देना."

उनके अनुसार, "कांग्रेस अपनी पारंपरिक सीटों जैसे अमेठी और रायबरेली में भी नहीं है तो ऐसे में सवाल इनके लीडरशिप पर भी उठता है."

कांग्रेस के पास खोने के लिए कुछ नहीं

बिजनेस स्टेंडर्ड में राजनीतिक पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस कहते हैं कि ''कांग्रेस को ये अंदाजा था कि उसके पास न खोने के लिए था न पाने के लिए और ये चुनाव बड़े पैमाने पर उनके लिए एक प्रयोग था क्योंकि पिछली बार जो उम्मीदवार चुनाव लड़े वो पार्टी छोड़ चुके हैं.''

साल 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने सपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था और कांग्रेस को सात सीटें मिली थीं.

सिद्धार्थ कलहंस के मुताबिक, "इस बार पार्टी ने ज़मीन से जुड़े कार्यकर्ताओं, नौजवानों को टिकट दिया. भले ही इस चुनाव में कांग्रेस ने कोई उल्लेखनीय प्रदर्शन नहीं किया, लेकिन 2017 में जिन 300 सीटों पर पार्टी अपने सिंबल पर नहीं उतरी थी, इस बार प्रियंका गांधी के ज़रिए उसके वोटर्स तक पहुंच सकी है."

उनके अनुसार, "ऐसे में ये भी चर्चा रही कि वो चुनाव लड़तीं तो शायद थोड़ा असर होता, लेकिन वो कांग्रेस पार्टी की स्टार कैंपेनर थीं और क्राउडपुलिंग या भीड़ जुटाने में भी अहम भूमिका निभा रही थीं. ऐसे में अगर वो चुनाव लड़तीं तो पूरे राज्य को समय नहीं दे पातीं."

कमज़ोर संगठन

रामदत्त त्रिपाठी और अमिता वर्मा दोनों की राय है कि अखिलेश यादव और प्रियंका गांधी के रोड शो में भीड़ तो बहुत जुटी, लेकिन दोनों ही पार्टियों ने अपने संगठन पर ध्यान नहीं दिया.

कांग्रेस ने न ही किसी क्षेत्रीय नेता को उभारा और न ही संगठन या समुदाय का नेता ही किसी को बनाया, ऐसे में प्रियंका गांधी का हाथरस का मामला या लखीमपुर खीरी के किसानों का मुद्दा जो उन्होंने बड़े ही मुखर अंदाज में उठाया था, वो भी कोई ठोस असर नहीं छोड़ पाया क्योंकि लोगों में ये आम धारणा बनी कि वो दिल्ली से आई हैं और फिर लौट जाएंगी.

सिद्धार्थ कलहंस उत्तर प्रदेश में हुए इस चुनाव को दो ध्रुवीय बताते हैं. वे कहते हैं, "मुख्य मुक़ाबला बीजेपी और सपा के बीच था. ऐसे में इन दोनों बड़ी पार्टियों के मतों का शेयर बढ़ना लाज़मी है, कांग्रेस का वोट शेयर कम ज़रूर हुआ है, लेकिन प्रियंका गांधी के प्रयासों को सराहा जाना चाहिए."

पिछले कुछ सालों में प्रियंका गांधी राजनीति में बहुत सक्रिय नहीं रही हैं, लेकिन यूपी में जिस तरह से वे दिखाई दीं, उससे कहीं न कहीं जानकार मानते हैं कि कांग्रेस को अंदाज़ा था कि इन चुनावों में पार्टी कोई चमत्कार नहीं कर पाएगी, दरअसल ये तैयारी 2024 की है.

सिद्धार्थ कालहंस कहते हैं, "प्रियंका चुनाव के दौरान भी कह चुकी हैं कि उत्तर प्रदेश को नहीं छोड़ेंगी, ऐसे में इससे यही लगता है कि वो राज्य को नहीं छोड़ने वाली हैं. वो समझ रही हैं कि यहां पार्टी की ज़मीन को मज़बूत करना है क्योंकि अंदरूनी तौर पर उन्हें पता था कि पार्टी अधिक कुछ कर पाने की स्थिति में नहीं है. वहीं, जो काम चुनाव से पहले यानी पीसटाइम में एक्सरसाइज़ के तौर पर किया जाना चाहिए था वो उन्होंने वॉरटाइम में किया है यानी चुनावों से पहले संगठन को ठोस बनाने का काम किया है."

उनके अनुसार, "जनता के मन में कांग्रेस पार्टी के लिए सहानुभूति उपजी है. लेकिन वोट एक विश्वास के साथ आता है अगर वो लोगों के बीच और बनी रहतीं तो शायद ये वोटों में तब्दील हो पाता, क्योंकि लोगों में अभी संदेह है कि वो चुनाव के बाद आएंगी या नहीं."

जानकार मानते हैं कि बीते वर्षों में प्रियंका गांधी राजनीति में बहुत सक्रिय नहीं रही हैं, लेकिन अब उन्हें ये समझ आ गया है कि ऐसे ज़्यादा दिन नहीं चल पाएगा क्योंकि अगर साल 2024 में नरेंद्र मोदी को चुनौती देनी है तो पार्टी को उत्तर प्रदेश में हर हाल में मज़बूत करना होगा.

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