क्या भारत वाकई में अंतरिक्ष में सुपर पावर बन गया?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को ऐलान किया कि भारत अंतरिक्ष में एंटी सैटेलाइट मिसाइल लॉन्च करने वाले देशों में शामिल हो गया है.
अमरीका, रूस और चीन के बाद भारत चौथा देश है, जिसने यह क्षमता हासिल की है.
उन्होंने ऐलान किया कि भारत ने अंतरिक्ष में 300 किलोमीटर की ऊंचाई पर एक सैटेलाइट को मिसाइल से मार गिराया है.
यह भारत का एंटी सैटेलाइट हथियार का पहला प्रयोग है और यह इसे एक बड़ी सफलता के रूप में देखा जा रहा है.
विज्ञान पत्रकार पल्लव बागला ने बीबीसी को बताया कि कुछ दिन पहले इसरो ने माइक्रो सैट-आर को लोअर अर्थ ऑर्बिट में लॉन्च किया था.
उन्होंने कहा, "यह सैटेलाइट 24 जनवरी 2019 को लॉन्च किया गया था और तब मुझे इसरो के अध्यक्ष डॉ. के. सिवन ने मुझे यह बताया था कि यह सैटेलाइट डीआरडीओ के लिए छोड़ा गया था."
यह सैटेलाइट 277 किलोमीटर की ऊंचाई पर छोड़ा गया था और भारत ने इतनी कम ऊंचाई में कभी भी कोई सैटेलाइट लॉन्च नहीं किया है.
पल्लव बागला के मुताबिक बुधवार को भारत ने इसी सैटेलाइट के ख़िलाफ़ अपना परीक्षण किया है. हालांकि इसकी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है.
यह बताया जा रहा है कि भारत ने अपना पहला एंटी सैटेलाइट हथियार का परीक्षण ओडिशा से किया है.
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इस परीक्षण से भारत को क्या मिलेगा
पल्लव बागला बताते हैं कि जब चीन ने इस तरह के मिसाइल का परीक्षण किया था, तब दुनिया के देशों ने इसकी आलोचना की थी.
आमतौर पर ऐसे परीक्षण से अंतरिक्ष में कचरा बढ़ता है, जो बाद में ख़तरनाक साबित हो सकता है.
क्या इस सैटेलाइट के परीक्षण के बाद भारत अंतरिक्ष में सुपर पावर बन गया है, इस सवाल के जवाब में पल्लव बागला कहते हैं कि जब कोई दुश्मन देश का सैटेलाइट हम पर नज़र रखेगा तो हम उसे ध्वस्त कर सकते हैं. ऐसे में हम कह सकते हैं कि हमारी ताक़त अंतरिक्ष में बढ़ी है.
"हालांकि इसके इस्तेमाल के मौके बहुत कम आते हैं. अभी तक ऐसा कोई उदाहरण सामने नहीं आया है जब इसका इस्तेमाल किसी देश ने युद्ध के समय किया हो."
हालांकि अगर युद्ध के समय इसकी ज़रूरत पड़ती है तो भारत इसका इस्तेमाल कर सकता है. पाकिस्तान के पास इस ऑर्बिट में कोई सैटेलाइट नहीं है.
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अर्थ ऑर्बिट कितने तरह के होते हैं
वैज्ञानिक हर मिशन के लिए अलग-अलग अर्थ ऑर्बिट का इस्तेमाल करते हैं.
जिस सैटेलाइट को एक दिन में पृथ्वी के चार चक्कर लगाने होते हैं, उसे पृथ्वी के नजदीक वाले ऑर्बिट में लॉन्च किए जाते हैं.
अगर दो चक्कर लगाना है तो दूरी थोड़ी बढ़ानी होगी और अगर एक चक्कर लगाना हैं तो दूरी और ज़्यादा करनी होती है.
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अर्थ ऑर्बिट को मुख्य रूप से दो भाग में बांटे जाते हैं.
- सर्कुलर ऑर्बिट
- इलिप्टिकल ऑर्बिट
सर्कुलर ऑर्बिट को तीन भाग में बांटे जा सकते हैः लोअर अर्थ ऑर्बिट, मीडियम अर्थ ऑर्बिट और जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट.
लोअर अर्थ ऑर्बिट का दायरा 160 किलोमीटर से दो हज़ार किलोमटीर तक होता है. इसमें लॉन्च की गई सैटेलाइट दिन में पृथ्वी का क़रीब तीन से चार चक्कर लगा लेती है.
इस ऑर्बिट में मौसम जानने वाले सैटेलाइट, इंटरनेशनल स्पेश स्टेशन लगाए गए हैं. जासूसी करने वाले सैटेलाइट भी इसी ऑर्बिट में लगाए जाते हैं.
वहीं, मीडियम अर्थ ऑर्बिट का दायरा दो हज़ार किलोमीटर से 36 हज़ार किलोमीटर तक का होता है. इसमें लॉन्च की गई सैटेलाइट दिन में पृथ्वी के दो चक्कर लगाती है.
यह बारह घंटे में एक चक्कर लगा लेती है.
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पृथ्वी पर क्यों नहीं गिरी सैटेलाइट
वहीं जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट का दायरा 36 हज़ार किलोमीटर के बाद शुरू होता है. इसमें लॉन्च किया गया सैटेलाइट एक दिन में पृथ्वी के एक चक्कर लगाने में सक्षम होती है.
इसमें सामान्य रूप से कम्यूनिकेशन वाले सैटेलाइट लॉन्च किए जाते हैं.
चूँकि पृथ्वी 24 घंटे में एक चक्कर लगाती है, इसलिए कम्यूनिकेशन के सैटेलाइट 24 घंटे भारत के ऊपर रखने के लिए इस ऑर्बिट में लॉन्च किए जाते हैं.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की घोषणा के बाद एक सवाल जो आपके मन में आई होगी वो ये कि अगर लाइव सैटेलाइट को भारत ने मार गिराया है तो वो धरती पर क्यों नहीं गिरी.
दरअसल ये धरती की गुरुत्वाकर्षण की वजह से होता है. पृथ्वी से एक दूरी के बाद गुरुत्वाकर्षण का असर ख़त्म हो जाता है और मारे गए सैटेलाइट के टुकड़े अंतरिक्ष में बिखर जाते हैं.
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