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भारत ने क्या ज़ीका संक्रमण के मामलों को छुपाया?

भारत में ज़ीका संक्रमण के तीन मामलों की पुष्टि की गई है. मगर जानकारी कई महीने बाद दिए जाने पर सवाल.

ज़ीका संक्रमण
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विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने बीते शुक्रवार को बताया कि भारत के स्वास्थ्य मंत्रालय ने अहमदाबाद में मच्छर से पैदा होने वाली बीमारी ज़ीका के तीन मामलों की पुष्टि की थी.

गुजरात के अधिकारियों का कहना है कि ये मामले शहर के एक ही इलाक़े में 2016 के नवंबर और इस साल फ़रवरी के बीच दर्ज किए गए.

इस बीमारी में नवजात को जन्म से जुड़ी दिक्कतें होती हैं, जिसमें माइक्रोसिफैली के लक्षण पाए जाते हैं और नवजात का सिर छोटा और मस्तिष्क कम विकसित होता है.

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ये बीमारी 30 देशों में दर्ज की गई है. हालांकि यह मुख्य रूप से मच्छरों से फैलती है लेकिन ये सेक्स के मार्फ़त भी फैलती है.

डब्ल्यूएचओ ने एक बयान में कहा है कि इन तीन मामलों में से दो महिलाएँ हैं, जिनकी उम्र 22 और 34 वर्ष है, और 64 वर्ष का एक बुज़ुर्ग व्यक्ति है.

34 वर्षीय महिला ने 9 नवंबर 2016 को एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया; 22 वर्षीय दूसरी महिला गर्भावस्था के 37वें हफ़्ते में संक्रमित पाई गई. बताया जा रहा है कि इन तीनों में से किसी ने भी भारत से बाहर की यात्रा नहीं की.

गुजरात के मुख्य सचिव जेएन सिंह ने संवाददाताओं से कहा, "दोनों गर्भवती महिलाओं ने स्वस्थ बच्चों को जन्म दिया और 64 वर्षीय वरिष्ठ नागरिक की सेहत भी बिल्कुल अच्छा है. "

उन्होंने कहा कि सरकार ने "जान-बूझकर इन मामलों को सार्वजनिक नहीं किया" क्योंकि मामले बढ़े नहीं.

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क्या झूठ बोल रही थी सरकार?

लेकिन स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े कई पेशेवर लोगों और जानकार इससे हैरान हैं और वे पूछ रहे हैं कि आख़िर पता चलते ही लोगों को इनकी जानकारी क्यों नहीं दी गई.

हालांकि नाइजीरिया में इसके व्यापक रूप से फैलने के पहले 1953 में प्रकाशित एक शोधपत्र में भारत में जीका वायरस के संक्रमण की बात कही गई थी.

अब साठ साल बाद फिर से मामला सामने आया है.

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दिल्ली के जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में कम्युनिटी मेडीसिन डिपार्टमेंट में प्रोफ़ेसर राजीब दासगुप्ता ने बीबीसी से कहा, "भारत के जन-स्वास्थ्य इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है. ये बहुत परेशान करने वाली बात है और इससे आचार से जुड़े कई सवाल खड़े होते हैं. आपको सारे समुदाय को भरोसे में लेना चाहिए. आप बिना दहशत फ़ैलाए भी ऐसा कर सकते हैं. "

आलोचक कहते हैं, 17 मार्च को स्वास्थ्य राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने संसद में एक सवाल का जवाब देते हुए कहा, "अभी तक, ज़ीका के केवल एक मामले की पुष्टि की गई है. "

वे कहते हैं, "इसका मतलब है कि सरकार झूठ बोल रही थी, क्योंकि तीसरे और अंतिम मामले का पता जनवरी में चला था."

मगर एक स्वास्थ्य अधिकारी ने मंत्री को सही ठहराते हुए कहा, "जनवरी में दो मामलों का पता चला, और तीसरे का फ़रवरी में, मगर जिस वक़्त मंत्री संसद में जवाब दे रही थीं, तब केवल इतना ही पता था."

इन आरोपों-सफ़ाई से अलग, कई लोगों का मानना है कि ये हैरानी की बात है कि सरकार महीनों तक ख़ामोश रही, एक ऐसी बीमारी के बारे में जो एडीस मच्छरों से फ़ैलती है, जो डेंगू और चिकनगुनिया के भी वायरस फ़ैलाते हैं, जो भारत में बहुत ज़्यादा होते हैं.

वो कहते हैं कि ये हैरानी की बात है कि सरकार, जो डेंगू और चिकनगुनिया के मामलों की लगातार ताज़ा जानकारी देती रहती है, उसने ज़ीका वायरस के बारे में महीनों तक चुप्पी रखने का फ़ैसला किया.

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सख़्त नियमों के बावजूद देरी

और ये तब हुआ है जब भारत में ज़ीका को लेकर सख़्त स्वास्थ्य नीति बनी हुई है.

अलग-अलग मंत्रालयों के बड़े अधिकारियों का एक पैनल नियमित रूप से इस वायरस की वैश्विक स्थिति की समीक्षा करता है. अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डों और बंदरगाहों पर इस वायरस को लेकर सूचना दी जाती है. वहाँ स्वास्थ्य अधिकारी यात्रियों की भी निगरानी करते हैं.

पिछले साल से अब तक, पूरे देश में 25 प्रयोगशालाओं में ज़ीका के टेस्ट के बारे में बताया गया है. तीन विशेषज्ञ अस्पतालों में मच्छरों के नमूनों पर ज़ीका वायरस का टेस्ट किया जा रहा है.

अमरीका में विकसित ऐसे टेस्ट किट, जो एक साथ ज़ीका, डेंगू और चिकनगुनिया की जाँच कर सकते हैं, उनका इस्तेमाल किया जा रहा है.

34,000 से ज़्यादा इंसानों के नमूने और लगभग 13,000 मच्छरों के नमूनों में ज़ीका की जाँच की गई है. इनमें से 500 मच्छरों के नमूने अहमदाबाद के उसी बापूनगर इलाक़े से लिए गए जहाँ से तीन मामलों की पुष्टि हुई है.

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स्थानीय लोगों में नाराज़गी

लेकिन जब पहले मामले का पता चला, तो सरकार ने इसे गोपनीय रखते हुए लोगों को, यहाँ तक कि स्थानीय अधिकारियों से भी छिपाए रखा, जिनमें नगरपालिका आयुक्त और शहर के मेयर भी शामिल हैं.

दिलचस्प है कि, स्थानीय नगरपालिका के एक वरिष्ठ मेडिकल ऑफ़िसर ने न्यूज़ वेबसाइट स्क्रॉल को बताया कि भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने जनवरी और फ़रवरी में मलेरिया नियंत्रण के लिए एक राष्ट्रीय अभियान के तहत शहर की निगरानी बढ़ा दी थी.

अधिकारी ने कहा, "हमसे ज़ीका वायरस या इनके मामलों के बारे में कुछ नहीं कहा गया."

इस वेबसाइट के एक पत्रकार ने बापूनगर का दौरा कर बताया कि वहाँ के लोग ज़ीका संक्रमण की जानकारी नहीं देने को लेकर नाराज़ हैं.

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देरी क्यों की?

तो सरकार ने ज़ीका संक्रमण की जानकारी इतनी देर से क्यों दी?

स्थानीय मीडिया में ख़बर आ रही है कि गुजरात की बीजेपी की सरकार ने ऐसा इसलिए किया क्योंकि वहाँ जनवरी में एक बड़ा अंतरराष्ट्रीय बिज़नेस सम्मेलन होने जा रहा था. वैसे स्थानीय प्रशासन इससे इनकार करता है जो कि स्वाभाविक है.

अंग्रेज़ी अख़बार हिंदू की हेल्थ और साइंस मामलों की संपादिका विद्या कृष्णन ने कहा, "ये जनस्वास्थ्य समुदाय और मीडिया का अपमान है. स्थानीय लोगों को जानकारी देनी चाहिए जिससे वो ख़ुद की, औरतों की और अपने बच्चों की सुरक्षा कर सकें. विदेशी पर्यटकों के लिए यात्रा सलाह भी जारी करनी चाहिए. "

वो कहती हैं, "कोई जानकारी छिपाने या देर से देने के परिणाम ख़तरनाक हो सकते हैं. अगर भारत बीमारियों और महामारियों के बारे में छिपाने लगे, तो स्थिति हाथ से बाहर जा सकती है. उसकी अंतरराष्ट्रीय साख पर असर पड़ सकता है. "

याद है, जब चीन पर 2003 में सार्स महामारी के प्रभाव पर "पर्दा डालने" का आरोप लगा था?

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