'जमानत से इनकार मौलिक अधिकारों का उल्लंघन, SC ने क्यों की ये टिप्पणी, UAPA का भी किया जिक्र
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने मंगलवार को संदिग्ध आतंकवादियों को शरण देने के मामले में आरोपी जमानत देते हुए अहम टिप्पणी की। सर्वोच्च अदालत ने कहा कि कानूनी सिद्धांत "जमानत नियम है और जेल एक अपवाद है" गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम जैसे विशेष कानूनों के तहत अपराधों पर भी यही बात लागू होती है। मामले में एक व्यक्ति को जमानत देते हुए पीठ ने कहा जब कोई मामला जमानत देने के लिए बनता है, तो अदालतों को जमानत देने में कोई झिझक नहीं होनी चाहिए।
सर्वोच्च अदालत मंगलवार को सेवानिवृत्त पुलिस कांस्टेबल जलालुद्दीन खान की याचिका पर सुनवाई के दौरान रिहाई का आदेश दिया। दरअसल ये मामला भारतीय दंड संहिता तहत सुनवाई के लिए कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया गया था। केस पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) से जड़ा है, जिसे अब प्रतिबंधित किया जा चुका है।

मामले में याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कड़ी जमानत शर्तों वाले मामलों में भी, सिद्धांत वही है कि अगर कानून में निर्दिष्ट शर्तें पूरी होती हैं तो जमानत दी जा सकती है। अपनी टिप्पणी में अदालत ने स्पष्ट कहा, "जब कोई मामला जमानत देने के लिए बनता है, तो अदालतों को जमानत देने में कोई झिझक नहीं होनी चाहिए। अभियोजन पक्ष के आरोप बेहद गंभीर हो सकते हैं. लेकिन, अदालतों का कर्तव्य कानून के अनुसार जमानत देने के मामले पर विचार करना है। जमानत एक नियम है और जेल एक अपवाद है, यह एक स्थापित कानून है।"
कोर्ट की टिप्पणी में आगे कहा गया, "नियम का यह भी अर्थ है कि एक बार जमानत देने का मामला बन जाने के बाद, अदालत जमानत देने से इनकार नहीं कर सकती। यदि अदालतें योग्य मामलों में जमानत देने से इनकार करना शुरू कर देती हैं, तो यह अनुच्छेद 21 तहत गारंटीकृत अधिकारों का उल्लंघन होगा।"












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