'नोटबंदी अवैध थी', 4 जजों से अलग राय रखने वाली जस्टिस नागरत्ना ने केंद्र के इरादे पर क्या कहा ? जानिए

सुप्रीम कोर्ट ने नोटबंदी के फैसले को भले ही जायज ठहराया है। लेकिन, एक जज जस्टिस बीवी नागरत्ना ने इसे गैरकानूनी करार दिया है। उन्होंने इसके कई कारण बताए हैं। लेकिन, केंद्र सरकार के इरादे को नेक कहा है।

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सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने भले ही नोटबंदी के फैसले को बरकरार रखकर केंद्र सरकार को बहुत बड़ी राहत दी है। लेकिन, पांच से एक जज जस्टिस बीवी नागरत्ना ने अपने चारों सहयोगियों से असहमति जताते हुए उतनी ही सख्त अंदाज में नोटबंदी के कदम को गैरकानूनी करार दिया है। जस्टिस नागरत्ना ने अपने अलग फैसले के पीछे कई कारण गिनाए हैं। लेकिन, सबसे बड़ी बात उन्होंने नोटबंदी के पीछे केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के इरादों को लेकर कही हैं। उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा है कि नोटबंदी के फैसले के उद्देश्य पर सवाल नहीं उठाया जा सकता और इसका काफी इरादा नेक था। यहां तक कि उन्होंने इस फैसले की वजह से कालाधान, आतंकी फंडिंग और जालसाजी को निशाना बनाए जाने की बात से भी सहमति जताई है।

नोटबंदी अवैध थी- जस्टिस बीवी नागरत्ना

नोटबंदी अवैध थी- जस्टिस बीवी नागरत्ना

सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 4:1 के बहुमत से केंद्र सरकार के नोटबंदी के फैसले को बरकरार रखा है। लेकिन, जस्टिस बीवी नागरत्ना ने अपने चार सहयोगियों की राय से पूरी तरह से उलट फैसला सुनाया है। जस्टिस बीवी नागरत्ना ने अपने फैसले में नोटबंदी पर सरकार की अधिसूचना को 'अवैध' करार देते हुए कहा है कि केंद्र की ओर से 1,000 और 500 रुपए की सभी करेंसी नोट को प्रतिबंधित करने की प्रक्रिया को नहीं अपनाई जानी चाहिए थी। जबकि, संविधान पीठ के पांच में से चार जजों ने मोदी सरकार के नोटबंदी के फैसले को कायम रखा है।

'अब यथास्थिति बहाल नहीं की जा सकती है'

'अब यथास्थिति बहाल नहीं की जा सकती है'

जस्टिस नागरत्ना ने 8 नवंबर, 2016 के केंद्र सरकार की अधिसूचना को 'गैरकानूनी' बताते हुए, याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिसूचना को चुनौती देने से सहमति जताते हुए कहा है कि आरबीआई ऐक्ट की धारा 26 के मुताबिक नोटबंदी की सलाह स्वतंत्र रूप से आरबीआई के सेंट्रल बोर्ड की ओर से दी जानी चाहिए थी और यह सरकार की सलाह से नहीं होनी चाहिए थी। उन्होंने कहा कि आरबीआई ने स्वतंत्र रूप से अपना दिमाग नहीं लगाया। उन्होंने कहा, 'मेरे विचार से 8 नवंबर को अधिसूचना के माध्यम से हुई नोटबंदी की कार्रवाई अवैध थी। लेकिन, अब यथास्थिति बहाल नहीं की जा सकती है, क्योंकि यह 2016 में हुआ था।' उन्होंने कहा कि नोटबंदी, 'कानून के विपरीत,शक्ति का उपयोग और इसलिए गैरकानूनी' था।

फैसला अच्छे इरादे और अच्छी सोच पर आधारित था- जस्टिस नागरत्ना

फैसला अच्छे इरादे और अच्छी सोच पर आधारित था- जस्टिस नागरत्ना

हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि वो नोटबंदी के 'नेक उद्देश्य' पर सवाल नहीं उठा रही हैं, बल्कि सिर्फ कानूनी नजरिया बता रही हैं। क्योंकि, जिस तरह से इसे लागू किया गया, वह कानून के मुताबिक नहीं था। जस्टिस नागरत्ना ने कहा, 'निःसंदेह, नोटबंदी सुविचारित था। बेहतर इरादा और नेक उद्देश्य को लेकर सवाल नहीं है। इस कदम को सिर्फ विशुद्ध रूप से कानूनी विश्लेषण को लेकर गैरकानूनी माना गया है, न कि नोटबंदी के उद्देश्यों पर....' उन्होंने नोटबंदी को लेकर आगे यहां तक कहा कि यह फैसला, 'अच्छे इरादे और अच्छी सोच' पर आधारित था। उन्होंने कहा कि इससे कालाधान, आतंकी फंडिंग और जालसाजी को निशाना बनाया।

रिजर्व बैंक के बारे में क्या कहा ?

रिजर्व बैंक के बारे में क्या कहा ?

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि याचिकाकर्ताओं का तर्क मूल रूप से इसपर आधारित था कि 'आरबीआई ऐक्ट के तहत नोटबंदी की सिफारिश रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के बोर्ड से निकलनी चाहिए...' लेकिन,इस मामले में केंद्र ने 7 नवंबर को आरबीआई को एक पत्र लिखकर ऐसी सिफारिश करने की सलाह दी। जस्टिस नागरत्ना के मुताबिक पिछले उदाहरणों की तरह नोटबंदी संसद के एक ऐक्ट के माध्यम से शुरू की जा सकती थी, न कि कार्यपालिका की अधिसूचना के माध्यम से। उन्होंने कहा, 'केंद्र और आरबीआई के दस्तावेजों को देखने के बाद 'केंद्र सरकार द्वारा वांछित' जैसे वाक्यांशों से पता चलता है कि आरबीआई ने स्वतंत्रत रूप से दिमाग नहीं लगाया'

सुप्रीम कोर्ट ने नोटबंदी के फैसले को को जायज करार दिया है

सुप्रीम कोर्ट ने नोटबंदी के फैसले को को जायज करार दिया है

इसके ठीक उलट बहुमत की राय रही कि केंद्र को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के साथ परामर्थ करके कार्रवाई करने की आवश्यकता है और यह एक 'अंतर्निहित सुरक्षा' है। चार जजों ने पाया कि यह परामर्थ दोनों के बीच 6 महीनों से जारी था। नोटबंदी के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 58 याचिकाएं डाली गई थी। इसमें यह दावा किया गया था कि यह सरकार का सोच-समझकर लिया गया निर्णय नहीं था और अदालत को इसे रद्द कर देना चाहिए।


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