क्यों बार-बार उठती है वेस्ट यूपी को अलग राज्य बनाने की मांग? ये हैं सबसे बड़ी वजहें
उत्तर प्रदेश को बांटने की मांग काफी समय से उठती रही है। जनसंख्या के आधार पर देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश एक बार फिर से विभाजन के कगार पर खड़ा है। एक बार फिर से उत्तर प्रदेश के पश्चिमी हिस्से को अलग करके नया राज्य बनाने की मांग उठी है।
केन्द्रीय राज्य मंत्री संजीव बालियान ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाने की मांग का समर्थन करते हुए कहा कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश अलग राज्य बनना चाहिए और मेरठ को इस नए प्रदेश की राजधानी बनाया जाना चाहिए। बालियान के बयान ने एक बार फिर से पश्चिमी यूपी की राजनीति को गर्मा दिया है।

बार-बार पश्चिमी यूपी के अलग करने का मांग के पीछे के कई कारण हैं। सबसे अहम कारण आबादी और आर्थिक संसाधनों का आसमान बंटवारा है। जिसे लेकर पश्चिमी यूपी के लोग समय समय पर अपनी दिक्कतों को उठाते रहे हैं। हम आपको वह पांच कारण बताने जा रहे हैं जिसके कारण वेस्ट यूपी को अलग राज्य बनाने की मांग हो रही है।
बड़ी आबादी का होना:
जनसंख्या के लिहाज से यूपी देश का सबसे बड़ा राज्य है। उत्तर प्रदेश में चौबीस करोड़ जनसंख्या और पिछत्तर जिलों के बड़े आकार की वजह से समस्याओं का अंबार है। प्रदेश के बड़ा होना से रोजगार, चिकित्सा, शिक्षा सभी क्षेत्रों में पिछड़ेपन है। छोटा प्रदेश होने पर रोजगार मिलने के साथ ही यूनिवर्सिटी, उद्योग धंधे स्थापित होंगे। अन्य राज्यों को युवाओं का पलायन भी रुकेगा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोग अच्छी सड़क, अस्पताल, विश्वविद्यालय, रोजगार, कानून व्यवस्था लिए परेशान हैं।
आर्थिक बोझ:
उत्तर प्रदेश की अधिकतर इडस्ट्रीज पश्चिम के कुछ जिलों गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर और मेरठ के आसपास है। राज्य में सबसे अधिक राजस्व इन्हीं जिलों से आता है। लेकिन सबसे अधिक राजस्व देने के बाद भी पश्चिमी जिलों में मूलभूत सुविधाओं की भारी कमी है। पश्चिमी यूपी के लोगों का मानना है कि अगर वेस्ट यूपी बन जाता है तो उनके इंडस्ट्रियल इलाकों से मिलने वाला राजस्व उनके उपर खर्च होगा। जिससे ना सिर्फ रोजगार बढ़ेगा बल्कि लोगों को मिलने वाली सुविधाओं में भी इजाफा होगा।
हाईकोर्ट का दूर होना:
उत्तर प्रदेश का उच्च न्यायालय प्रयागराज में है और उसकी एक मात्र बेंच भी लखनऊ में बनाई गई है। वह भी पूरब में मौजूद है। जिसके चलते पश्चिम में रहने वाली आबादी को न्याय प्रक्रियाओं के लिए लखनऊ या फिर इलाहाबाद जाना पड़ता है। मेरठ और प्रयागराज के बीच की दूरी बहुत अधिक है। ऐसे में लोगों को काफी दिक्कतें होती है। वेस्ट यूपी के लोगों का मानना है कि अगर राज्य अलग हो जाता है तो उनके लिए नया उच्च न्यायालय होगा। जो उनके जिले से अधिक दूरी पर नहीं होगा।
अधिकतर सरकारी मुख्यालय पूर्व में मौजूद हैं:
राज्य के अधितकर सरकारी मुख्यालय पूर्व के शहरों में मौजूद है। जिसके चलते सरकारी कामों को लेकर पश्चिमी यूपी के लोगों को लखनऊ (सरकार के मंत्रायलों के ऑफिस), प्रयागराज (यूपी बोर्ड और चयन सेवा आयोग) के चक्कर लगाने पड़ते हैं। जिससे ना सिर्फ लोगों के समय का नुकसान होता है बल्कि लोगों को अधिक पैसे भी खर्च पड़ने पड़ते हैं।
पश्चिम में IIM और IIT जैसे बड़े संस्थानों का टोटा:
सरकारों के क्षेत्रवाद के कारण पश्चिमी यूपी में न कोई उच्च स्तरीय विश्वविद्यालय है न ही आईआईटी, आईआईएम है। यूपी के इंजीनियरिंग और मेडिकल के सारे संस्थान पूर्वी यूपी में मौजूद हैं। आईआईटी कानपुर में, आईआईएम लखनऊ में , ट्रिपआईटी और MNIT प्रयागराज में, बीएचयू बनारस में। वेस्ट यूपी को लोगों का मानना है कि, इन संस्थानों के पूर्व में मौजूद होने से पश्चिम के युवाओं का बड़ा नुकसान होता है।
31 लोकसभा सीटों का गणित:
पश्चिमी यूपी में कुल 26 जिले आते हैं। जिनमें मेरठ, बुलन्दशहर, गौतमबुद्धनगर, गाजियाबाद, हापुड, बागपत, सहारनपुर, मुजफ्फरनगर, शामली, मोरादाबाद, बिजनोर, रामपुर, अमरोहा, संभल, बरेली, बदायूँ, पिलीभीत, शाहजहाँपुर, आगरा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, मथुरा, अलीगढ, एटा, हाथरस, कासगंज, इटावा, औरैया और फर्रुखाबाद शामिल हैं। लोकसभा 31 सीट के तौर पर पश्चिमी यूपी में देंखे तो उनमें शाहजहांपुर, बरेली, बदायूं, अमरोहा, गाजियाबाद, गौतम बुद्ध नगर, संभल, सहारनपुर, रामपुर, पीलीभीत, नगीना, मुजफ्फरनगर, मुरादाबाद, मेरठ, मथुरा, अलीगढ़, एटा, मैनपुरी, कैराना, हाथरस, फिरोजाबाद, फर्ररुखाबाद, फतेहपुर सीकरी, इटावा, बुलंदशहर, बिजनौर, बागपत, अमरोहा, आंवला, अलीगढ़ और आगरा शामिल है।
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