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दिल्ली प्रदूषण: स्मॉग से बचाने में एयर प्यूरीफायर्स कितने कामयाब?

दिल्ली प्रदूषण: स्मॉग से बचाने में एयर प्यूरीफायर्स कितने कामयाब?

दिल्ली में बीते पाँच दिनों से हवा इतनी ज़्यादा प्रदूषित हो चुकी है कि बेहद ख़तरनाक प्रदूषक पीएम 2.5 की हवा में मौजूदगी अपने उच्चतम स्तर पर जा पहुँचीहै.

बीते गुरुवार से लेकर शनिवार, रविवार और सोमवार को दिल्ली समेत उत्तर भारत के कई शहरों में वायु प्रदूषण अपने उच्चतम स्तर पर दर्ज किया गया.

इस हवा में साँस लेना इतना ख़तरनाक है कि वरिष्ठ नागरिकों, बच्चों और अस्थमा एवं साँस से जुड़ी बीमारियां झेल रहे लोगों को आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएं लेनी पड़ सकती हैं. वहीं, स्वस्थ लोगों के लिए लंबे समय तक इस हवा में साँस लेना नुकसानदायक साबित हो सकता है.

लेकिन ये पहला मौका नहीं है, जब नवंबर महीने के पहले-दूसरे हफ़्ते में ही दिल्ली की हवा इतनी प्रदूषित हो गई हो. पिछले कई सालों से दिल्ली समेत उत्तर भारत के कई राज्यों में सर्दियां आते आते वायु प्रदूषण की समस्या खड़ी हो जाती है.

दिल्ली के गंगा राम अस्पताल में लंग कैंसर विशेषज्ञ डॉ. अरविंद कुमार के मुताबिक़, उत्तर भारत के बड़े शहरों में प्रदूषण का ये ट्रेंड अगर इसी तरह जारी रहा तो इस क्षेत्र में फेफड़ों के कैंसर के मामलों में बेतहाशा वृद्धि हो सकती है. बीते साल ही दिल्ली की रहने वाली एक 28 वर्षीय महिला को लंग कैंसर होने की बात सामने आई थी जबकि वह सिगरेट या बीड़ी आदि नहीं पीती थीं.

ऐसे में सवाल ये उठता है कि इसका समाधान क्या है?

डॉ. अरविंद समेत देश के तमाम विशेषज्ञ मानते हैं कि वायु प्रदूषण की समस्या का सिर्फ एक समाधान है – वायु प्रदूषण को कम करना.

लेकिन पिछले कई सालों से वायु प्रदूषण कम होने की बजाए बढ़ता ही दिख रहा है. ऐसे में लोगों ने एन 95 मास्क और एयर प्यूरीफायर इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है जिससे इस इंडस्ट्री में बेहद तेज़ उछाल आया है.

दिल्ली प्रदूषण: स्मॉग से बचाने में एयर प्यूरीफायर्स कितने कामयाब?

ई-कॉमर्स वेबसाइट ऐमेज़ॉन के मुताबिक़, साल 2016 में लोगों ने 2015 के मुक़ाबले 400% ज़्यादा एयर प्यूरीफ़ायर ख़रीदे थे. वहीं, 2017 में लोगों ने 2016 के मुक़ाबले 500 प्रतिशत ज़्यादा एयर प्यूरीफ़ायर ख़रीदे और एयर प्यूरीफायर आहिस्ता-आहिस्ता से टीवी, फ्रिज़, एसी जैसे होम एप्लाएंस कहे जाने वाले उत्पादों में शामिल हो चुका है.

बाज़ार में इस समय 5,000 रुपये से लेकर 50,000 रुपये तक के एयर प्यूरीफायर्स उपलब्ध हैं. लेकिन सवाल ये है कि क्या इस ज़हरीली हवा से बचने के लिए एयर प्यूरीफायर का सहारा लिया जा सकता है?

कितने कामयाब हैं एयर प्यूरीफायर?

एयर प्यूरीफायर बनाने वाली कंपनियां अपने विज्ञापनों में अलग-अलग तकनीकी शब्दों का प्रयोग करके ये जताने की कोशिश करती हैं कि उनके ब्रांड के एयर प्यूरीफायर आपको वायु प्रदूषण की समस्या से एक हद तक निजात दिला सकते हैं.

लेकिन अब तक किसी वैज्ञानिक अध्ययन में ये सिद्ध नहीं हुआ है कि एयर प्यूरीफायर दिल्ली जैसे विशाल शहर की आबादी को वायु प्रदूषण के नकारात्मक प्रभावों से बचा सकता है.

सेंटर फॉर साइंस एंड स्टडीज़ से जुड़े विशेषज्ञ विवेक चट्टोपाध्याय मानते हैं कि एयर प्यूरीफायर को एक समाधान मानना ग़लती होगी.

वे कहते हैं, “अभी हम जिस हवा में साँस ले रहे हैं, वह स्वास्थ्य के लिहाज़ से बेहद ख़तरनाक है. हम ख़राब, बहुत ख़राब स्तरों की बात नहीं कर रहे हैं. ये वो स्तर है जो कि सबसे ज़्यादा ख़राब है. इस हवा में साँस लेने से स्वस्थ लोगों को भी दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है.”

लेकिन एयर प्यूरीफायर के प्रभावशाली होने या न होने के सवाल पर वे कहते हैं, “एयर प्यूरीफायर किसी जगह विशेष जैसे किसी कमरे की हवा में प्रदूषकों की संख्या कम कर सकता है. मान लीजिए कि आप एक कमरे में बैठे हैं, ऐसे में वहां आपको साँस लेने के लिए ऑक्सीजन की ज़रूरत पड़ेगी. लेकिन एयर प्यूरीफायर आपको ऑक्सीजन नहीं दे सकता. ऐसे में आपको इतनी जगह रखनी होगी कि बाहर से हवा अंदर आ सके. रूम में वेंटिलेशन की ज़रूरत होगी. ऐसे में एयर प्यूरीफायर को बाहर से अंदर आती हवा को शुद्ध करना होगा जो कि अपने आप में चुनौतीपूर्ण है.”

दिल्ली प्रदूषण: स्मॉग से बचाने में एयर प्यूरीफायर्स कितने कामयाब?

“आप दिन के 24 घंटे कमरे के अंदर नहीं बैठ सकते हैं. दिन के किसी भी वक़्त अगर एयर पॉल्युशन बहुत ज़्यादा हाई लेवल पर है और आप उसके संपर्क में आ जाते हैं तो उसका आप पर बुरा प्रभाव पड़ेगा. ऐसे में आपने भले ही कुछ घंटे साफ हवा में बिता लिए हों लेकिन इसका कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता है. एक और उदाहरण है कि जब आप ट्रैफिक में होते हैं तो थोड़ी सी देर ही अशुद्ध हवा में साँस लेने की वजह से आपको दिक्कत होने लगती है. ऐसे में बाहर की हवा को सुधारना हर हाल में ज़रूरी है.”

एयरप्यूरीफ़ायर खरीदने की आर्थिक क्षमता

चट्टोपाध्याय अपनी बात ख़त्म करते हुए एक दूसरे बिंदु की ओर इशारा करते हैं. वे कहते हैं कि एक बड़ा सवाल ये है कि भारत में कितने लोग अच्छी क्वालिटी का एयर प्यूरीफायर ख़रीद सकते हैं?

इस बात में दो राय नहीं है कि भारत की आबादी में एक बड़ा वर्ग है जो कि प्यूरीफायर ख़रीदने में सक्षम नहीं है. लेकिन धीरे धीरे जैसे एयर कंडीशन ने मध्य वर्ग के घरों में जगह बनाई है, ठीक उसी तरह एयर प्यूरीफायर अपनी जड़ें जमाता जा रहा है.

लोग अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार एयर प्यूरीफायर खरीद रहे हैं. लगभग 10 हज़ार रुपये की कीमत वाले एयर प्यूरीफायर की बिक्री अपेक्षाकृत ज़्यादा हो रही है.

मगर एम्स (दिल्ली) पल्मनोलॉजी विभाग के अध्यक्ष डॉ. अनंत मोहन मानते हैं कि इसे एक समाधान की तरह देखना बिलकुल ग़लत है.

वे कहते हैं, “एयर प्यूरीफायर के असर को लेकर साइंटिफिक जानकारी काफ़ी कम है. लेकिन वरिष्ठ नागरिकों, बच्चों और पहले से बीमार लोगों के लिए एयर प्यूरीफायर, (जब तक वे घर के अंदर हैं तब तक) उनके आसपास की हवा बाहर की तुलना में बेहतर कर सकता है. और कोई प्यूरीफायर कितना असरदार साबित होगा ये निर्भर करता है, उसके साइज़, इफिशिंएसी और कमरे के साइज़ पर, क्योंकि हर एयर प्यूरीफायर की क्षमता कमरे के साइज़ के मुताबिक़ अलग अलग होती है.”

“लेकिन घर से बाहर निकलते ही आप फिर प्रदूषित हवा के संपर्क में आ जाते हैं. और आप पूरे घर में एयर प्यूरीफायर नहीं लगा सकते. ऐसे में चूंकि अभी कोविड का दौर जारी है. और लोगों को घर पर रहने की सलाह दी जाती है. ऐसे में कुछ विशेष वर्गों (उम्र और बीमारी के आधार पर) के लिए एयर प्यूरीफायर काम कर सकता है. लेकिन इसे एक बड़ी आबादी के लिए घर के ज़रूरी सामान में शामिल करना मुश्किल होगा.”

दिल्ली प्रदूषण: स्मॉग से बचाने में एयर प्यूरीफायर्स कितने कामयाब?

एयर प्यूरीफायर के लिए तय मानकों की कमी?

लेकिन कम कीमत के प्यूरीफायर की बाज़ार में मौजूदगी को डॉ. अनंत मोहन चिंताजनक मानते हैं.

वे कहते हैं, “अब इस समय बाज़ार में इतनी तरह के प्यूरीफायर आ चुके हैं कि उनकी गुणवत्ता का नियंत्रण किया जाना बेहद ज़रूरी होगा. कुछ बड़ी कंपनियों के एयर प्यूरीफायर संभवत: गुणवत्ता वाले हों. लेकिन हम जानते हैं कि हर स्तर का माल बाज़ार में बिक जाता है. और जब ऐसे उत्पाद ख़रीदकर लोग ये सोचेंगे कि उन्होंने अपनी हवा की गुणवत्ता सुधार ली है तो ये पहले से ज़्यादा ख़तरनाक होगा. ऐसे में इस क्षेत्र में गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए कड़े नियमों की ज़रूरत होगी कि बिना क्वालिटी कंट्रोल के मार्केटिंग और बिक्री की अनुमति ही न दी जाए.”

“लेकिन ये सब करते हुए भी हमें ये नहीं मानना चाहिए कि एयर प्यूरीफायर एक ज़रूरी चीज़ हो गई है. ऐसा मानने का मतलब ये है कि हमने ये मान लिया है कि हमारी एयर क्वालिटी और ख़राब होती जाएगी और जाने दिया जाए. ऐसे में एयर प्यूरीफायर किसी चीज़ का समाधान नहीं है. समाधान बस एक है – पर्यावरण को ठीक करना.”

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