केजरीवाल का इस्तीफा बहुत कुछ कहता है

Delhi just a stepping stone for Arvind Kejriwal?
बैंगलोर। अरविंद केजरीवाल जो जनता की इच्छा से मुख्यमंत्री के तौर पर दिल्ली की सत्ता में आए ताकि जनता के मुददे पूरे हो सकें उनकी उम्मीदे पूरी हो सकें, समस्याओं का निदान हो सके, भ्रष्टाचार मिट सके पर अचानक ही दिल्ली के मुख्यमंत्री के इस्तीफे ने इसी जनता को सकते में ला दिया. अब भी यह बहस लोगों के बीच में मुखातिब है कि केजरी जी का यह फैसला सही है या गलत।

बहरहाल जो भी हुआ वो सशंकित अवश्य है पर आप पा्र्टी के छह हफ्तों के कार्यकाल पर एक नज़र डालना जरुरी भी बनता है. जरुरी इसलिए कि भले 49 दिनों के लिए ही सही पर आप ने कांग्रेस और भाजपा को बेचैन जरुर कर दिया। कुछ तो बाद जरुर थी आप पार्टी में की विधानसभा चुनाव में पार्टी दिल्ली की कुल सीटों में से दो-तिहाई सीट पर विजयी रही, आप के राष्ट्रीय लक्ष्य के लिए दिल्ली वो सीढ़ी थी जो उसे ऊंचाईयों तक पहुचाँ सकती थी।

सत्ता से सड़क तक

जो भी परिस्थितियाँ रही केजरीवाल ने सत्ता में आने के बाद भी अपने को कभी खास नहीं बनने दिया, न हीं उन्होंने उस आन्दोलन की राह ही छोडी जो भारत की व्यवस्था में उनके उदय का कारण रही।

अपने अल्पकालीन शासनकाल में पार्टी ने दिल्ली सरकार की स्वाभाविक कार्यप्रणाली की अपेक्षा भ्रष्टाचार के मुददे पर अधिक सक्रियता दिखाई जो कि उनके सत्ता में आने का मुख्य मुददा भी था।

इन 49 दिनों में सरकार और जनता के बीच जो एक प्रत्यक्ष संबंध दिखाई दिया वो पहले कभी नहीं दिखा। जनता के लिए जनता दरबार जहां वो सरकार के सामने बिना किसी बिचौलिये के हस्तांतरण के बेझिझक अपनी बात रख सके निश्चित तौर पर सही मायनों में जनतंत्र का प्रतिनिधित्व करता है जिसकी पहल केजरीवाल ने की।

नकल करने में भाजपा और कांग्रेस भी पीछे नहीं रहे

देखने में तो यह भी आया कि केजरीवाल की नकल करने में भाजपा और कांग्रेस भी पीछे नहीं रहे,.जैसे केजरीवाल का बादामी स्वेटर और मफलर एक आम आदमी के रुप में उनकी पहचान का ट्रेड मार्क बन गया वैसे ही देखादेखी मोदी ने भी कभी चाय पार्टी से तो राहुल की कूलियों के बीच उपस्थिति ने भी अपने लिए एक ट्रेड मार्क बनाने की पूरी को की।

इसके बाद यदि बात केजरीवाल के धरना प्रदर्शन की करें जिसकी मांग दिल्ली की पुलिस को दिल्ली सरकार के नियंत्रण में लाना था जिसके लिए आलोचकों ने उन्हें अराजक तक घोषित कर दिया वो भी केजरीवाल की राजनीति का एक विशिष्ट पहलू बनती दिखी।

यह अलग बात है कि आंदोलन दो दिन में ख़त्म हो गया पर आलोचक मुख्यमंत्री का ऐसा रुप देख कर उलझन में जरुर पड गए. कई परम्परावादियों के लिए यह नाराजगी का सबब भी बना पर केजरीवाल के कारण व्यवस्था में जो ठहराव दिखाई दिया उसे नजर अंदाज भी नहीं किया जा सकता।

केजरीवाल आलोचकों का शिकार हुए

वहीं एक बार फिर केजरीवाल आलोचकों का शिकार हुए जब उन्होंने देश के सबसे नामी उधोगपति और देस सबसे धनी मुकेश अंबानी पर गैस के उपभोक्ताओं के साथ जालसाज़ी का आरोप लगाया उनके खिलाफ एफा आइ आर दर्ज कराई।

और अंत में जनलोकपाल बिल जिसके कारण उन्होंने अपने पद से इस्तीफा भी दे दिया उनके एक अटल रवैये को दर्शाता है।यह सच है कि इन छह हफ्तों में केजरीवाल लगातार आलोचकों का शिकार रहे पर यह भी उतना ही बड़ा सच है कि जब भी सत्ता में व्यवस्था में कोई क्रान्तिकारी बदलाव करना होता है तो राहे इतनी आसान नहीं होती। पर हाँ इस कार्यकाल ने आगे आने वाले लोकसभा चुनाव और दिल्ली की सत्ता में वापसी पर आप पार्टी की स्थिति पर प्रश्न चिह्न जरुर खड़ा कर दिया है।

सवालों के घेरे में केजरीवाल

जो भी हुआ पर यह बात तो तय है कि राजनीति के इतिहास में केजरीवाल का नाम सदैव स्मरणीय रहेगा ठीक वैसे ही जैसे कभी जयप्रकाश नारायण का रहा। जो क्रान्तिकारी रवैया लोगों ने सालों पहले जे.पी में देखा था वही केजरीवाल में भी दिखा।

जे.पी ने भी 1975 के आपातकाल के समय सरकार को यह अहसास दिलाया था कि जनता सरकार बना सकती है तो गिरा भी सकती है वहीं रुख केजरीवाल में भी दिखा। जे.पी. के निशाने पर कांग्रेस थी यह स्पष्ट था पर केजरीवाल के संदर्भ में अभी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि वो किसके विरुद्ध हैं कांग्रेस या भाजपा।

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