मणिपुर: चुनाव से पहले हत्या, तनाव और कर्फ्यू, क्या रंग लाएगी भाजपा-कांग्रेस की भिड़ंत ?
नई दिल्ली, 28 दिसंबर। अलगाववादी हिंसा के शिकार मणिपुर में अब राजनीतिक हिंसा की भी लपटें उठने लगी हैं। फरवरी-मार्च 2022 में विधानसभा के चुनाव होने हैं। लेकिन इसके पहले राजनीतिक हिंसा के कारण थौबल जिले के हेरोक गांव में कर्फ्यू की लगाने की नौबत आ गयी। जिलाधिकारी ने आसपास के गांवों में भी अशांति फैलने की आशंका जतायी है। इसके बाद सुरक्षा इंतजामों को और सख्त कर दिया गया है। मंगलवार की रात एक छात्र एन रोहित की गोलीमार कर हत्या कर दी गयी।

इस हमले में रोहित के पिता प्रेमचंद भी घायल हुए हैं। रोहित के बड़े भाई एन रोशन कांग्रेस के नेता हैं और इस बार उनके चुनाव लड़ने की चर्चा है। रोहित हत्याकांड में भाजपा विधायक थोकचोम राधेशाम के भाई थोकचोम पुत्रो सिंह समेत पांच लोगों ने सरेंडर कर दिया है। हेरोक बाजार में कुछ दिन पहले कांग्रेस और भाजपा के कार्यकर्ताओं के बीच मारपीट हुई थी। इसके बाद एन रोहित और उसके पिता पर गोलियां बरसायी गयीं।

भाजपा और कांग्रेस में वर्चस्व की लड़ाई
थौबल विधानसभा सीट पर कांग्रेस के दिग्गज नेता ओकराम इबोबी सिंह का कब्जा है। वे 2002 से 2017 तक लगातर तीन बार मणिपुर के मुख्यमंत्री रहे हैं। थौबल जिले की एक और सीट खंगाबोत पर भी कांग्रेस का कब्जा है। सूरज कुमार ओक्रम यहां से विधायक हैं। पिछले चुनाव में इन दोनों सीटों पर भाजपा की हार हुई थी। 2022 में भाजपा ने इन सीटों को जीतने के लिए पूरा जोर लगाया है। इस राजनीतिक प्रतिदंव्द्विता के बीच भाजपा और कांग्रेस कार्यकर्ताओं में तनतनी की स्थिति बन गयी है। माना जा रहा है कि राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई में ये घटना हुई है। कांग्रेस परिवार से आने वाले एन रोहित की हत्या में भाजपा विधायक के भाई और उनके समर्थकों को आरोपी बनाया गया है। मणिपुर में भाजपा की सरकार है। कांग्रेस, भाजपा को हरा कर फिर सत्ता में आना चाहती है। इसके पहले 15 साल तक उसी का शासन था। लेकिन कांग्रेस के 13 विधायकों के भाजपा में शामिल होने से उसमें एक हताशा है। इबोबी सिंह 73 साल के हो चुके हैं और अभी तक कांग्रेस उन्हीं पर निर्भर है।

मणिपुर में हिंसा
दो महीना पहले पूर्वी इंफाल के यारीपोक याम्बेम गांव में दो दलों के कार्यकर्ताओं के बीच झड़प हो गयी थी जिसमें छह लोग घायल हो गये थे। तब मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने कहा था कि राजनीतिक हिंसा में शामिल लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। 2012 में विधानसभा चुनाव के समय हिंसा में सात लोग मारे गये थे। म्यांमार बॉर्डर के पास चंदेल जिले के तांगपी गांव में अलगावलादियों ने एक मतदान केन्द्र पर हमला कर दिया था जिसमें सात लोग मारे गये थे। सेनापति जिलें में मतदान केन्द्र के पास बवाल होने पर पुलिस को गोलियां चलानी पड़ी थीं। 2022 चुनाव से पहले मणिपुर में एक बड़ा आतंकी हमला हो चुका है। म्यांमार की सीमा के पास आतंकियों ने असम राइफल्स के का काफिले पर हमला कर सात लोगों की हत्या कर दी थी। मणिपुर का चुराचांदपुर जिला म्यांमार की सीमा पर अवस्थित है। इस सीमा की सुरक्षा की जिम्मेवारी असम राइफल्स पर है। सुरक्षा के साथ-साथ उस पर सामाजिक सरोकार को बढ़ाने की भी जिम्मेवारी है। असम राइफल्स के अधिकारी आसपास के गांवों में जा कर स्थानीय लोगों के साथ गेट-टुगेदर करते हैं। उनका भरोसा जीतने के लिए रात में रुक कर छोटा-मोटा जलसा करते हैं। ये बात आतंकियों को अच्छी नहीं लगती। वे अपनी राजनीति को जिंदा रखने के लिए स्थानीय लोगों को भारतीय सेना और अर्धसैनिक बलों के खिलाफ भड़काते हैं। जब बात नहीं बनती तो वे सुरक्षा बलों पर हमला कर देते हैं। कर्नल विप्लव त्रिपाठी, उनकी पत्नी और बच्चे की हत्या इसी घृणित सोच का नतीजा था।

क्या कांग्रेस भाजपा को जवाब दे पाएगी ?
क्या हिंसा और तनाव के माहौल में राजनीति की राह आसान होगी ? क्या कांग्रेस, भाजपा को चुनौती दे पाएगी ? 2017 के चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी हो कर भी कांग्रेस सरकार नहीं बना पायी थी। उसके 28 विधायक जीते थे। जिसमें से 13 भाजपा में शामिल हो चुके हैं। पिछले साढ़े चार साल में कांग्रेस लगातार कमजोर होती जा रही है। मणिपुर की राजनीति के जानकारों का कहना है कि कांग्रेस के कमजोर होने से मणिपुर की रिजनल पार्टियां मजबूत हो रही हैं। मणिपुर की सीमा नगालैंड से मिलती है। नगालैंड की पार्टी, नगा पीपल्स फ्रंट ने मणिपुर में भी अपना आधार मजबूत कर लिया है। 2017 में उसके चार विधायक जीते थे। पीए संगमा की बनायी पार्टी नेशनल पीपल्स पार्टी ने भी यहां प्रभाव कायम किया है। पिछले चुनाव में उसे भी चार सीटें मिलीं थीं। दोनों ने मिल कर भाजपा की सरकार बनायी थी। लेकिन रिजनल पार्टियों का मजबूत होना भाजपा के लिए भी शुभ संकेत नहीं है। किसी मजबूत क्षेत्रीय गठबंधन के उभरने से भाजपा भी बेअसर हो जाएगी। वैसे बीरेन सिंह सरकार को घेरने के लिए कांग्रेस 'सरकार तारिबरा'( क्या भाजपा की सरकार सुनती है?) के नाम से एक डिजिटल कैंपेन चला रही है। दरअसल कांग्रेस ने भाजपा को जवाब देने के लिए ऐसा किया है। भाजपा ने लोगों को जोड़ने के लिए सोशल मीडिया पर 'सीएम दा हैसी' (चलो सीएम से बात करते हैं) कार्यक्रम चला रखा है।












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