बंगाल में ममता के खिलाफ बीजेपी को मिल रहा है लेफ्ट कैडर्स का साथ, पढ़िए ग्राउंड रिपोर्ट

नई दिल्ली- कहते हैं कि राजनीति में कट्टर विरोधी भी गले लगते दिख जाएं तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। सियासी नफा-नुकसान के लिए यहां कुछ भी नामुमकिन नहीं है। यूपी में माया और मुलायम का ढाई दशकों बाद एक मंच पर एक लक्ष्य के लिए साथ आना तो एक बानगी भर है। अब तो दो अलग-अलग विरोधी विचारधाराएं भी एक मकसद से एक-दूसरे के साथ तालमेल से परहेज नहीं करतीं। मौजूदा लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल की जमीनी राजनीति में भी ऐसी ही स्थिति आ चुकी है। यहां लाल सलाम करने वाले लेफ्ट के कैडर्स (CPM workers) राइट विंग साथियों के साथ भगवा धारा में बहने को तैयार हैं। आइए समझने की कोशिश करते हैं कि बंगाल की राजनीति में हो रहा यह बदलाव ममता दीदी की दबंग राजनीति के लिए किस तरह से खतरे की घंटी है।

बंगाल में भगवे में मिल रहा है 'लाल'

बंगाल में भगवे में मिल रहा है 'लाल'

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक पश्चिम बंगाल की लड़ाई में अब बीजेपी को जमीनी स्तर पर सीपीएम कैडर्स (CPM cadres) का भी गुपचुप समर्थन मिल रहा है। बीजेपी और सीपीएम दोनों एक दूसरे की कट्टर विरोधी पार्टियां हैं। इनकी विचारधारा में कहीं से कोई तालमेल नहीं है। वे एक-दूसरे से नफरत करती हैं। लेकिन, मौजूदा समय में प्रदेश के जो हालात हैं, उसने टीएमसी (TMC) और ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) से निपटने के लिए उन्हें एक-दूसरे से सहयोग को मजबूर कर दिया है। भाजपा का संगठन हिंदी हार्टलैंड में जितना ही मजबूत है, वह बंगाल में अभी भी टीएमसी से (TMC) मात खा जाती है। सच कहें तो अभी भी बीजेपी से वहां कांग्रेस और लेफ्ट ज्यादा संगठित हैं। लेकिन, हाल के वर्षों में बीजेपी ने वहां धीरे-धीरे अपना वोट शेयर काफी बढ़ाया है। लेफ्ट के कैडर्स को अंदाजा है कि इस समय दीदी की दबंगता के सामने भाजपा ही टिक सकती है। शायद इसलिए उसके कैडर्स बीजेपी के बूथ लेवल वर्कर्स की मदद कर रहे हैं। बीजेपी के पोल मैनेजर्स (poll managers)आसानी से कबूल कर रहे हैं कि ग्राउंड लेवल पर वो 'अनएस्पेक्टेड क्वार्टर्स '(unexpected quarters) यानी सीपीएम (CPM) के कार्यकर्ताओं के भरोसे हैं।

बूथ लेवल 'लेफ्ट से राइट'

बूथ लेवल 'लेफ्ट से राइट'

सीपीएम (CPM) कार्यकर्ताओं को मौजूदा ममता सरकार में बढ़ते उत्पीड़न और सत्ताधारी पार्टी की बढ़ती ताकत से निपटने के लिए भगवाधारियों से हाथ मिलाने में ही भलाई नजर आ रही है। क्योंकि, लेफ्ट फ्रंट के दबदबे वाले 34 साल के शासन के बाद सीपीएम वर्कर्स (CPM workers) को सबसे ज्यादा बूथ एवं वार्ड स्तर पर ही टीएमसी कार्यकर्ताओं के खौफ का सामना करना पड़ रहा है। इसलिए जिन वार्ड्स (wards) में पार्टी के कैडर्स (cadres) का अभी भी थोड़ा-बहुत रसूख बचा हुआ है, वहां मौजूदा चुनाव में वे भाजपा को पोलिंग बूथ मैनेज करने से लेकर गुपचुप चुनाव प्रचार में भी जी-जान से सहायता पहुंचा रहे हैं।

कोलकाता उत्तर से ग्राउंड रिपोर्ट

कोलकाता उत्तर से ग्राउंड रिपोर्ट

कोलकाता उत्तर (Kolkata Uttar) लोकसभा क्षेत्र का ही उदाहरण लेते हैं। यहां कुल 1,862 पोलिंग बूथ हैं। बीजेपी के पास इनमें से सिर्फ 500 बूथों पर ही अपने कार्यकर्ता हैं। जबकि,वह दावा कर रही है कि इस बार उसके उम्मीदवार राहुल सिन्हा (Rahul Sinha) इस सीट पर टीएमसी के मौजूदा सांसद सुदीप बंधोपाध्याय (Sudip Bandopadhyay) को हरा सकते हैं। जानकारी के मुताबिक सीपीएम वर्कर्स ने यहां के बूथों पर बीजेपी को मदद देने का ऑफर दिया है और बीजेपी भी इसके लिए खुशी से तैयार है। बीजेपी के पोल मैनेजर्स सीपीएम कार्यकर्ताओं के साथ लगातार गुपचुप बैठकें कर रहे हैं और कुछ इलाकों में बिना नारेबाजी किए घर-घर जाकर कैंपेन (door-to-door campaigns) की योजनाएं बना रहे हैं। इनके बीच ये भी आपसी सहमति बनी है कि मतदान वाले दिन जिस बूथ पर बीजेपी का एजेंट मौजूद नहीं रहेगा, वहां लेफ्ट के कैडर ही उस पर निगरानी रखेंगे।

ममता को भी है खतरे की भनक

ममता को भी है खतरे की भनक

सीपीएम और बीजेपी कार्यकर्ताओं के बीच बूथ लेवल पर तालमेल से ममता खेमे में मची हड़कंप को भी महसूस किया जा सकता है। टीएमसी (TMC) सुप्रीमो अपनी हर रैली में इस खतरे से अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं को आगाह कर रही हैं। वो कहती हैं, "(सीपीएम कार्यकर्ता)...फिर से वही कर रहे हैं, उनसे सावधान रहें, वो हमारे दुश्मनों की मदद कर रहे हैं, सतर्क रहिए, अलर्ट रहिए।" वैसे यह देखना दिलचस्प होगा कि ममता अपने प्रदेश में लाल एवं भगवा की हो रही जुगलबंदी को रोकने के लिए जमीनी स्तर पर क्या काट निकालती हैं। क्योंकि, वाकई बंगाल में जो सीन बन रहा है, उससे दीदी के दिमाग में खतरे की घंटी जरूर बच रही होगी।

लेफ्ट के नेता भी परेशान

लेफ्ट के नेता भी परेशान

बीजेपी के एक नेता ने माना है कि त्रिपुरा में लेफ्ट के कार्यकर्ताओं के साथ काम करने का अनुभव उसके पास है। वहां टीएमसी के बढ़ते दबदबे के बीच एक समय जमीनी स्तर पर बीजेपी ने सीपीएम कार्यकर्ताओं के साथ तालमेल किया था। हालांकिं, आखिरकार माणिक सरकार की अगुवाई वाले लेफ्ट फ्रंट सरकार को बीजेपी के हाथों ही हार का सामना करना पड़ा। बंगाल में इन दिनों जो कुछ चल रहा है, उसकी सीपीएम पोलित ब्यूरो (CPM politburo) को भी भनक है। खुद माणिक सरकार भी इससे परेशान नजर आ रहे हैं। मंगलवार को बंगाल में एक सभा के दौरान उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं को हिदायत भी देने की कोशिश की थी। उन्होंने कहा था, "तृणमूल कांग्रेस से खुद को बचाने के लिए बीजेपी को चुनने की गलती मत कीजिए। त्रिपुरा को देखिए। सिर्फ 14 महीने में त्रिपुरा में क्या कर दिया है, जो टीएमसी के आतंक से कहीं ज्यादा है। उन्हें बुलावा मत दीजिए। यह बहुत ही बड़ी भूल होगी। यह खुदकुशी का फैसला होगा।"

'उन्नीसे हाफ, एकुसे साफ'

'उन्नीसे हाफ, एकुसे साफ'

सीपीएम नेतृत्व एसी कमरों में बैठकर चाहे जो भी रणनीति बना रहा हो, लेकिन बंगाल में उसके अपने ही कार्यकर्ता हाथ से निकलते जा रहे हैं। वैसे भी पार्टी बंगाल का अपना किला पहले ही गंवा चुकी है और जो बची हुई ताकत है वह भी बीजेपी उम्मीदवारों को जिताने के लिए खर्च हो रहा है। लेकिन, ग्राउंड लेवल पर ममता सरकार से शायद सीपीएम कार्यकर्ता इतने परेशान हैं कि वह दबी जुबान में सिर्फ एक ही नारा जप रहे हैं- 'उन्नीसे हाफ, एकुसे साफ'। यानी उनकी एक ही योजना है, बीजेपी की मदद से 2019 में टीएमसी की ताकत को आधा कर दें और 2021 के विधानसभा चुनाव आने तक उसे पूरी तरह से खत्म कर दें।

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