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IT कंसलटेंट आशुतोष आनंद: जिनकी कोशिशों ने कोरोना काल में बचाई कई जानें

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नई दिल्ली, 26 जून: कोरोना महामारी की दूसरी लहर के दौरान लोगों ने काफी मुश्किल वक्त देखा। ये ऐसा समय था जब ना अस्पतालों से रहे थे ना अपने ही बात करने को तैयार थे। ऐसे समय में कुछ लोग बिना किसी परिचय या जान पहचान के भी मदद को आगे आए लर मदद की। आईटी कंसलटेंट आशुतोष आनंद भी ऐसा ही नाम हैं। माय कोरोना स्टोरी में उनकी कोरोना के समय की कहानी उन्हीं की जुबानी-

covid story

वक़्त बहुत विकराल होता जा रहा था। चारो तरफ से सिर्फ और सिर्फ कोरोना से हुई तबाही की नकारात्मक खबरे आ रही थी। हर मंजर जैसे सहम सा गया था। इसी विकराल समय मे मैंने भी अपने कुछ नजदीकी और दूर के रिश्तेदारों को भी खोया। कुछ जानने वाले भी काल कवलित हुए। मुझे कुछ समझ नही आ रहा था। अचानक एक सुबह मेरे मित्र आलोक का कॉल आया और उसने घबराते हुए पूछा कि अपने किसी भी कांटेक्ट के माध्यम से पटना में 2 रेमडीसीवीर इंजेक्शन मिल सकता है क्या? ये जरूरत उसके चाचा के लिए आ पड़ी थी, जो उस वक्त नाजुक हालत में थे। मैंने उस वक़्त उससे कुछ वक्त माँगा और मदद करने का भरसक प्रयास करने का भरोसा भी दिया। इसी बीच उसके कुछ देर बात एक बहन का कॉल आया कि उनके एक परिचित की हालत नाजुक है उन्हें ऑक्सीजन चाहिए।

अब मन विचलित था पर कुछ तो करना था उनके लिए जो मेरी ओर आशा की निगाहों से देख रहे थे। मैं महादेव का नाम लेकर सोच रहा था कि कैसे इनकी मदद करू। सहसा एक विचार कौंधा.. मेरे सोशल मीडिया पे अच्छी पहुँच है, खासकर फेसबुक पर कुल 5000 फ्रेंड है, और अमूमन बहुत से लोग हर क्षेत्र के लोग मेरे से जुड़े हुए है। ये विचार आते ही अचानक मैंने सारी डिटेल्स अपने फेसबुक पोस्ट पर डालते हुए मदद की गुहार लगानी शुरू कर दी और महादेव की कृपा से लोगो ने मदद के लिए हाथ बढ़ाना भी शुरू कर दिया। उन दोनों जरूरतमंदों को मेरे माध्यम से मदद मिल गयी थी।

अब मैंने इस क्षेत्र में कुछ व्यापक करने का सोचा और मैं और मेरे भैया अजीत प्रकाश जो कि अमेरिका के नार्थ कैरोलिना यूनिवर्सिटी में साइंटिस्ट है उन्होंने मिलकर "कोविड पेशेंट हेल्पलाइन ग्रुप" के नाम से फेसबुक पर एक ग्रुप बना लिया जिसमे शुरुआत में सिर्फ मेरे फैमिली मेंबर जुड़े थे। देखते देखते कूल 4000 लोग हमारे ग्रुप से जुड़ गए और सबने एक दूसरे के लिए अपने अपने माध्यम से मदद करना शुरू कर दिया। ऐक दीपक से कई दीपक जलते गए। कुछ सेलिब्रिटी और कई चिकित्सक भी मुझसे जुड़े जिन्होंने मदद का न सिर्फ आस्वाशन दिया बल्कि मदद किया भी।

बचपन से मेरा सपना IAS बनने का था, जो सपना किसी कारणवश अपनी कमी की वजह से पूरा नही हो पाया पर हमेशा से मेरा मानना था कि आप भले कोई भी नौकरी करे पर समाज के लिए अगर कुछ अच्छा और सकारात्मक करने का सोचे तो एक आम इंसान भी बहुत बदलाव ला सकता है। आज जब मेरी वजह से किसी एक इंसान की जान बची है तो मैं समझता हूँ ये मेरे लिए बहुत बड़ी बात है। वैसे भी हम केवल माध्यम है..सब परमात्मा की कृपा है जिनकी कृपा से शायद किसी की मदद हो पाई और हो रही है। मैं एक गैर सरकारी संगठन ट्राइडेंट सेवा का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष भी हूँ, और हमारा अगला लक्ष्य बिहार के कुछ सुदूर देहात क्षेत्र में कोविड हॉस्पिटल की व्यवस्था करवाना है, जिसके लिए हम प्रयासरत भी है।

संदेश-अपने लिए तो सभी जीते है, बात तो तब हो जब आप जिस मिट्टी में जन्म लिए और एक दिन जिस मिट्टी में ही मिलना है , उस समाज के लिए उस मिट्टी के लिए सोचे, अपने इंसान होने को साबित करे और इंसानियत निभाये। यकीन मानो ये अगर सही से निभा लिया तो अपने आप पर गर्व करना.. और सोचना की इंसान बनाकर भगवान ने कोई गलती नही करी आपको... बस कर्म करते जाना है..कोशिश नही छोड़नी... बाकी सब उस परमपिता के हाथ मे है.. आगे की चिंता आपको नही करना। अगर आप भारत माता के सच्चे संतान हो तो ये प्रण करो कि इस कठिन समय मे जब चुनौतियां आसुरी ताकत की तरह सामने खड़े होकर हमारी परीक्षा ले रही है इस वक्त हम अपने दैवीय गुणों को अपना करके पीड़ित मानवता को बचाने के लिए यथासंभव कोशिश करेंगे। हमे चाहे जिस पेशे में हो अभी हमे एक वीर सिपाही की तरह अंतिम सांस तक भारत माता की रक्षा के लिए तन मन धन से समर्पित होकर अपनी आखिरी सांस तक लड़ना होगा।

कोरोना से तन टूट रहा था और परिवार पर आई आपदा से मन, फिर भी हिम्मत नहीं हारीकोरोना से तन टूट रहा था और परिवार पर आई आपदा से मन, फिर भी हिम्मत नहीं हारी

English summary
it consultant ashutosh anand help many through social media in coronavirus crisis
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