कोरोना वायरस: असम में मजदूरों को 'क्वारंटीन सेंटर' के बदले 'शेल्टर होम' में क्यों प्रशासन ने रखा?

दिलीप कुमार शर्मा

असम के स्वास्थ्य मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने हाल ही में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में साफ कहा था कि बाहरी राज्यों में फंसे लोग अगर प्रदेश में लौटते हैं तो उनकों 14 दिनों के लिए होम क्वारंटीन या फिर सरकार द्वारा बनाए गए क्वारंटीन सेंटर में रहना ही होगा. लेकिन जोरहाट जिले के नौकचारी में नगालैंड से करीब एक सौ किलोमीटर पैदल चलकर आए 361 मजदूरों को जिन स्कूलों में ठहराया गया है उन्हें जिला प्रशासन क्वारंटीन सेंटर नहीं बल्कि 'शेल्टर होम' बता रहा है.

दरअसल भारत सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय समेत राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र और गृह मंत्रालय ने कोविड-19 की बीमारी को देखते हुए क्वारंटीन सुविधाओं को लेकर कुछ दिशानिर्देश तय कर रखे है. क्वारंटीन सेंटर में साफ-सफाई से लेकर वहां काम करने वाले सभी कर्मियों को पीपीई किट उपलब्ध करवाना, सोशल डिसटेंसिंग का पालन करना और मनोचिकित्सक, लैब तकनीशियन की मौजूदगी जैसी बातें दिशानिर्देशों में है.

हालांकि नौकचारी की जिन तीन स्कूलों में इन मजदूरों को ठहराया गया है वहां क्वारंटीन सेंटर की ये सुविधाएं देखने को नहीं मिलतीं.

मरियानी के स्थानीय विधायक रूपज्योति कुर्मी जिला प्रशासन की व्यवस्था पर सवाल खड़ा करते है और यह आरोप लगाते हैं कि प्रशासन क्वारंटीन सुविधाओं को लेकर दिशानिर्देशों का पालन नहीं कर पा रहा है इसलिए अब इन क्वारंटीन सेंटरों को 'शेल्टर होम' बता रहा है.

दिलीप कुमार शर्मा

विधायक रूपज्योति कुर्मी ने बीबीसी से कहा,"क्वारंटीन को लेकर प्रशासन की तैयारियां बहुत कमजोर दिख रही हैं. इतने दिनों तक प्रशासन ने ऐसी कोई तैयारी नहीं की जिससे ऐसा लगे कि संकट के समय स्थिति को संभाल लिया जाएगा. जिला प्रशासन महज साढ़े तीन सौ मजदूरों के लिए क्वारंटीन सेंटर की व्यवस्था नहीं कर पा रहा है. जबकि हम सबने कोरोना वायरस के प्रभाव को रोकने के लिए असम के मुख्यमंत्री राहत कोष में अपनी तनख़्वाह दी है. राज्य सरकार के कर्मचारियों से लेकर प्राइवेट सेक्टर के लोगों ने वित्तीय मदद की है ताकि कोविड-19 की इस बीमारी से मुकाबला कर सकें."

विधायक ने आरोप लगाते हुए कहा,"ये मजदूर भूखे-प्यासे इतनी दूर पैदल चलकर यहां पहुंचे है लेकिन बीते पांच दिनों तक प्रशासन ने इनको गंभीरता से नहीं लिया. यहां न खाने-पीने की कोई अच्छी सुविधा थी और न ही रहने के लिए आवश्यक चीजें इन्हें दी गई. जब मैंने मीडिया के जरिए प्रशासन के कामकाज पर सवाल खड़े किए तब जाकर आज छठे दिन जिला उपायुक्त इनका हाल जानने यहां आई है.कोविड-19 बीमारी के इस संकट से भरे दौर में कहीं भी लोगों को शेल्टर होम में रखने की बात हमने नहीं सुनी है. नियम कहते हैं कि नगालैंड से वापस अपने राज्य में लौटे इन सभी मजदूरों को 14 दिनों के लिए क्वारंटीन सेंटर में रखना जरूरी है ताकि बाकि का समाज सुरक्षित रहे."

इन आरोपों के बारे में पूछने पर जोरहाट जिले की उपायुक्त रोशनी कोराती कहती हैं,"यह क्वारंटीन सेंटर नहीं है ये 'शेल्टर होम' है. यहां ऐसे कुल तीन सेंटर हैं जिनमें 361 लोगों को रखा गया है. जिला प्रशासन इनके खाने-पीने की सारी सुविधाएं कर रही हैं. दरअसल इस समय राज्य के भीतर लोगों को आने-जाने की अनुमति दी जा रही है. ये सभी लोग असम से ही आ रहे हैं. इनमें से अधिकतर लोग गेलेकी नामक जगह से आए है. नगालैंड से नहीं आए है. देखा जाए तो तकनीकि तौर पर यह राज्य के भीतर ही मूवमेंट कर रहे हैं. लिहाजा सरकार के साथ इस विषय में बात हो रही है. हम जल्द ही इनको घर भेजने की व्यवस्था करेंगे. फिलहाल ये सार लोग स्वस्थ है. किसी एक व्यक्ति में भी कोई लक्षण देखने को नहीं मिला है."

दिलीप कुमार शर्मा

नगालैंड में कोयला खुदाई का काम करने गए अधिकतर मजदूर असम के गोलाघाट और कार्बी-आंग्लोंग जिले के रहने वाले है. लॉकडाउन के कारण कोयला खदानों के मालिकों ने काम बंद कर दिया था और इस तरह ये सारे मजदूर वहां फंस गए थे. इन मजदूरों में से कइयों ने बीबीसी से बातचीत में साफ कहा है कि वे 22 अप्रैल को नगालैंड की अनाकी बस्ती से सुबह 3 बजे अपने घर के लिए पैदल निकले थे. बावजूद इसके जिला उपायुक्त इनके मूवमेंट को असम के भीतर बता रही है.

जब मैं बुधवार की रात करीब 10 बजे अपनी कार से मरियानी के रेलवे फाटक को पार कर रहा था उस समय मैंने कई मजदूरों को रेल पटरियों के बीच पैदल चलते हुए देखा. इन मजदूरों ने अपनी पीठ पर कपड़ों से भरे बैग टांग रखे थे. मैंने देखा कि वहां पहरा दे रहे दो होम गार्ड के जवानों नें भी उन्हें नहीं रोका. इसके बाद मैंने मरियानी थाने के प्रभारी को फोन कर इन मजदूरों के बारे में जानकारी दी तब जाकर 28 मजदूरों को रोका गया और फिर बस में बैठाकर इन लोगों को नौकचारी ले जाया गया. ये मजदूर एक सौ किलोमीटर से ज्यादा पैदल चलकर यहां तक आ गए थे लेकिन रास्ते में पुलिस ने इन्हें कहीं नहीं रोका.

नौकचारी उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में बने एक अस्थाई 'शेल्टर होम' में पिछले छह दिनों से ठहरे मनोज थापा (बदला हुआ नाम) ने फोन पर बताया,"लॉकडाउन के कारण नगालैंड में हमारा काम बंद हो गया था. इसलिए हम सबने नगालैंड से पैदल चलकर घर पहुंचने का निर्णय लिया. हम 22 अप्रेल की सुबह करीब 3 बजे नगालैंड से चले थे लेकिन उसी दिन शाम को नौकचारी में हमें लोगों ने रोक लिया. हमारे कुछ साथियों को मरियानी में रोका गया. हम खुद क्वारंटीन सेंटर में आना चाहते थे. क्योंकि तेज़ हवा और बारिश के कारण नगा पहाड़ में हमारी तंबू की बनी झोपड़ियां टूट गई थी. हमे मालूम था कि असम में आएंगे तो हमें 14 दिनों के लिए क्वारंटीन पर रखा जाएगा. लेकिन हम अपने राज्य में आना चाहते थे ताकि अगर कोई बीमारी हो तो इलाज मिल सके."

दिलीप कुमार शर्मा

क्वारंटीन सुविधाओं से जुड़े एक सवाल का जवाब देते हुए मनोज ने कहा,"हम मजदूर है हमें यह नहीं मालूम की क्वारंटीन सेंटर कैसे होते है. पहले दो दिन तो यहां खाने-पीने की थोड़ी असुविधा हुई थी लेकिन अब धीरे-धीरे दो टाइम खाना मिल रहा है. हम अपना खाना खुद ही बनाते है और कमरे-टॉयलेट की साफ सफाई भी खुद ही करते है. चिकत्सकों की एक टीम बीच -बीच में हमारी जांच करने आती है. दरअसल पैदल चलने से कई मजदूरों के पैर कट गए थे. यहां आने वाले चिकित्सक उन्हीं लोगों का इलाज कर रहें हैं और अब कुछ लोग ठीक भी हुए हैं."

इसी 'शेल्टर होम' में रह रहें एक और मजदूर संजय लिंबू (बदला हुआ नाम) ने फोन पर बताया,"हम नगालैंड की अनाकी बस्ती से पैदल घर के लिए निकले थे. रास्तें में पुलिस मिली थी परंतु किसी ने रोका नहीं. लेकिन नौकचरी में रोकने के बाद सरकार के लोग हमें यहां 14 दिन के लिए क्वारंटाइन में लेकर आ गए. हम यहां के एक कमरे में 13 लोग रहते है. यहां तैनात अधिकारी नहीं बता पा रहें है कि हमें कब घर भेजा जाएगा."

दिलीप कुमार शर्मा

एक सवाल का जवाब देते हुए संजय ने बताया,"नगालैंड में कोयला खुदाई का काम करने वाला एक मजदूर सप्ताह में करीब दो हजार रुपए कमा लेता है.लेकिन लॉकडाउन के कारण जब काम बंद हो गया तो खदान मालिक ने हमारा पूरा हिसाब नहीं किया."

असम सरकार लॉकडाउन के कारण राजस्थान के कोटा शहर में फंसे प्रदेश के 391 छात्रों को वापस लेकर आई है और उन सभी को गुवाहाटी के सरूसजाइ स्टेडियम में बनाए गए क्वारंटाइन सेंटर में 14 दिनों के लिए भेजा है.

स्वास्थ्य मंत्री सरमा ने उन छात्रों से मुलाकात के बाद एक ट्वीट कर इस बात की जानकारी दी. लेकिन नगालैंड से आए इन मजदूरों को क्वारंटाइन सेंटर में रखने को लेकर प्रशासन का जवाब दिशानिर्देशो के बिलकुल उलट दिखता है.

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