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कोरोना वैक्सीन: दो साल बाद हम कितना जानते हैं इसके साइड इफ़ेक्ट्स के बारे में?

कोरोना वैक्सीन लेती हुई महिला
ANI
कोरोना वैक्सीन लेती हुई महिला

लंदन के साइंस म्यूज़ियम में एक प्रदर्शनी लगी है. यहां प्रदर्शित चीज़ों से पता चलता है कोरोना वैक्सीन की खोज से लेकर इसके निर्माण और पूरी दुनिया में इसका वितरण कितने बड़े पैमाने पर हुआ था.

इस एग्ज़ीबिशन के एक कोने में कुछ सिरिंज और इंजेक्शन की शीशियां एक कार्ड बोर्ड में रखी गई हैं. इनका इस्तेमाल 8 दिसंबर को किया गया था. कोरोना वैक्सीन की क्लीनिकल स्टडीज़ से अलग ये पहली बार था जब कोरोना का इंजेक्शन 90 साल की एक ब्रिटिश महिला मार्गरेट कीनन को दिया गया .

उस 8 दिसंबर से लेकर अब तक पूरी दुनिया में कोरोना वैक्सीन के करोड़ों डोज़ दिए जा चुके हैं. इसमें इम्यूनिटी बढ़ाने और कोरोना के नए वेरिएंट से बचाने वाली बूस्टर डोज़ भी शामिल है.

तो वैक्सीनेशन के इन दो सालों में हमने क्या सीखा? इस दौरान वैक्सीन के प्रभावी होने के जो डेटा सामने आए, उनसे क्या नतीजा निकलता है? अब तक हम कोरोना वैक्सीन के साइड इफ़ेक्ट को कितना जान पाए हैं?

अगर मोटे तौर पर कहें, तो अब तक आए रिसर्च के मुताबिक़, कोविड-19 के ख़िलाफ़ जितनी भी वैक्सीन्स को मंज़ूरी दी गई, उनकी वजह से पूरी दुनिया में अस्पताल में भर्ती होने वाले संक्रमितों की मौत की तादाद में कमी आई. अगर ये वैक्सीन नहीं होतीं तो महामारी का संकट पूरी दुनिया में इससे कई गुना ज़्यादा बड़ा होता.

इस दौरान कुछ वैक्सीन के साइड इफ़ेक्ट्स को लेकर भी कुछ बातें उठीं, कुछ चुनिंदा स्वास्थ्य संस्थानों और एजेंसियों ने वैक्सीन के गंभीर साइड इफ़ेक्ट्स को लेकर चिंता जताई. हालांकि ये अपवाद की तरह थे, फिर भी चलिए पड़ताल करते हैं आख़िर वैक्सीन के साइड इफ़ेक्ट्स का सच क्या है.

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Vaccine being applied in an unidentified person
Getty Images
Vaccine being applied in an unidentified person

असर जो ज़ाहिर तौर पर दिखे

कोरोना की वैक्सीन का सबसे बड़ा असर ये हुआ कि पूरी दुनिया में हॉस्पिटलाइज़ेशन और मौत की दर में कमी आई. जैसे-जैसे वैक्सीन की पहुंच बड़ी आबादी तक होती गई, गंभीर संक्रमण, अस्पतालों में भीड़ और मौतों की संख्या कम होती गई.

इसे लेकर कॉमनवेल्थ फ़ंड ने अमेरिका की येल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों से एक सर्वे कराया था. 13 दिसंबर को प्रकाशित हुई इस रिपोर्ट में वैज्ञानिकों ने ये समझने की कोशिश की है कि कोविड-19 के ख़िलाफ़ अगर कोई वैक्सीन डिवेलप नहीं हुई होती तो क्या होता?

इस सर्वे के नतीजों से ये साफ़ संकेत मिला कि अगर वैक्सीन नहीं आई होती तो अकेले अमेरिका में 2 सालों में मौजूदा आंकड़ों से 1.85 करोड़ ज्यादा लोग अस्पतालों में भर्ती हुए होते और 32 लाख लोगों की मौत हुई होती.

इसके अलावा ये भी पता चला कि वैक्सीन की वजह से अमेरिका में क़रीब 1.3 ट्रिलियन डॉलर के मेडिकल खर्च कम हुए. अगर मामले और बढ़ते तो ये राशि संक्रमित आबादी के इलाज में खर्च हो गई होती.

सर्वे के नतीजों का विश्लेषण करने वाले वैज्ञानिकों के मुताबिक़, "अमेरिका में 12 दिसंबर 2020 के बाद से आठ करोड़ 20 लाख लोग कोरोना से संक्रमित हुए. इनमें से 48 लाख लोग अस्पताल में भर्ती हुए और सात लाख 98 हज़ार लोगों की मौत हुई.

अगर लोगों को वैक्सीन नहीं दी गई होती तो अमेरिका में डेढ़ गुना ज़्यादा लोगों को संक्रमण हुआ होता, 4 गुना ज़्यादा लोग अस्पताल में भर्ती किए गए होते और 4 गुना से ज़्यादा लोग मौत के शिकार हुए होते."

ब्राज़ीलियन सोसायटी ऑफ़ इम्यूनाइज़ेशन की वाइस प्रेसिडेंट डॉक्टर इसाबेल बल्लालाई भी मानती हैं, "वैक्सीन की वजह से मारे गए और ज़िंदा बचे लोगों के आंकड़ों के बीच बहुत बड़ा फ़र्क़ आया."

डॉक्टर इसाबेल का अपना देश ब्राज़ील भी दुनिया की सबसे ज़्यादा संक्रमित आबादी वाले देशों में से एक था, मगर यहां के वैक्सीनेशन प्रोग्राम की भी काफ़ी तारीफ़ हुई.

जनवरी 2021 में जब शुरुआती वैक्सीन को मंज़ूरी मिली थी, तब ब्राज़ील में कोरोना संक्रमण की हालत पूरे महामारी काल के चरम पर पहुंच चुकी थी.

ब्राज़ील के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़, 2021 के मार्च और अप्रैल के बीच हर रोज़ औसतन 72 हज़ार लोग कोरोना से संक्रमित हो रहे थे. इनमें से हर दिन क़रीब 3000 लोगों की मौत हो रही थी.

जैसे-जैसे दिन बीतते गए, ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को वैक्सीनेट किया जाता रहा. इस तरह हर दिन रिकॉर्ड गति से बढ़ने वाले संक्रमण और इसकी वजह से मरने वाले लोगों की तादाद कम होने लगी.

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Tray, syringe and vaccine
BBC
Tray, syringe and vaccine

वैक्सीन के साइड इफ़ेक्ट के बारे में क्या पता चला है?

डॉक्टर इसाबेल बल्लालाई बताती हैं, "जैसे-जैसे दिन गुज़र रहे हैं, ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को वैक्सीन की डोज़ दी जा रही है, इससे हम इनके सुरक्षित होने को लेकर आश्वस्त हो रहे हैं."

पिछले दो वर्षों में रेगुलेटरी एजेंसियां और सरकारी स्वास्थ्य संस्थाएं ये लगातार जानने की कोशिश कर रही हैं कि कोरोना की वैक्सीन लेने के बाद लोगों पर क्या असर पड़ता है. इसके लिए वैक्सीन लेने वाले लोगों की मॉनिटरिंग से लेकर बीमार होने पर पूरी जांच-पड़ताल की जाती रही. ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ सर्विस ने अपनी जांच में पाया कि "वैक्सीन के गंभीर साइड इफ़ेक्ट ना के बराबर सामने आए हैं."

वैक्सीन लेने वालों में जो साइड इफ़ेक्ट्स दिखे भी उनमें लक्षण कुछ ऐसे थे:-

  • इंजेक्शन ली जाने वाली जगह पर दर्द
  • हल्का बुखार और थकान
  • पूरे बदन में दर्द के साथ सिरदर्द
  • इन लक्षणों के साथ बीमार होने का एहसास

ब्रिटेन की सरकार ने भी माना कि जो भी साइड इफ़ेक्ट्स दिखे वो बहुत हल्के थे और ज़्यादा से ज़्यादा हफ़्ते भर तक बने रहे.

लेकिन हल्के-फुल्के साइड इफ़ेक्ट्स के अलावा उन लक्षणों के बारे में क्या कहा जाए जिसमें वैक्सीन के गंभीर दुष्परिणाम दिखे? इसमें सबसे ताज़ा आंकड़े अमेरिका के डिज़ीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन सेंटर (सीडीसी) ने प्रकाशित किए हैं.

सीडीसी के आंकड़ों के मुताबिक़, वैक्सीन लेने के बाद जो अब तक के सबसे गंभीर साइड इफ़ेक्ट्स सामने आए, वो कुछ इस तरह से हैं:-

  • एनाफ़िलैक्सिज

वैक्सीन लेने के बाद गंभीर एलर्जिक रिऐक्शन, हर 10 लाख में से 5 लोगों में दिखा साइड इफ़ेक्ट

  • थ्रोम्बोइसिस

जैनसैन वैक्सीन के केस में ज़्यादा दिखा. हर 10 लाख में से 4 लोगों में दिखा साइड इफ़ेक्ट

  • जीबीएस

जैनसैन वैक्सीन के केस में ज़्यादा दिखा. 50 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों में दिखा साइड इफ़ेक्ट

  • मायोकार्डाइटिस और पेरिकार्डाइटिस

फ़ाइज़र की वैक्सीन लेने के बाद हृदय में सूजन. 12 से 15 उम्र वर्ग में प्रति 10 लाख डोज़ में 70 में दिखा. 16-18 वर्ग में प्रति 10 लाख में 106 और 18 से 24 में प्रति 10 लाख में 53.4 लोगों में पाया गया.

सीडीसी की रिपोर्ट के मुताबिक़, 'मायोकार्डाइटिस और पेरिकार्डाइटिस से पीड़ित लोगों के इलाज के दौरान दवाओं का असर जल्दी हुआ और वो कुछ ही दिन में ठीक भी हो गए.'

इस आधार पर रिपोर्ट में आगे कहा गया है- "कई अध्ययनों के नतीजे और सेफ़्टी मॉनिटरिंग सिस्टम्स की रिपोर्ट के आधार पर ये माना जा सकता है कि दी जा रही तमाम वैक्सीन सुरक्षित हैं."

जहां तक अमेरिका में कोरोना से हुई मौतों का सवाल है, तो यहां के आंकड़ों के मुताबिक़, 7 दिसंबर तक कोरोना वैक्सीन के 65 करोड़ 70 लाख डोज़ दिए जा चुके हैं. वैक्सीनेशन के बाद 17 हज़ार 800 लोगों की मौत हुई, जो अमेरिका के कुल मौतों का 0.0027% है.

वैक्सीन लेने के बाद हुई इन तमाम मौतों की गहन जांच हुई. इसमें पता चला कि सिर्फ़ नौ मौतें जैनसेन वैक्सीन लेने वालों की हुई.

डॉक्टर बल्लालाइ कहती हैं, 'दुनिया की कोई वैक्सीन नहीं है जिसमें कोई जोख़िम न हो.'

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Healthcare worker taking vaccine from ampoule
Getty Images
Healthcare worker taking vaccine from ampoule

वैक्सीनेशन के बाद अब आगे क्या?

2021 में वैक्सीन इस्तेमाल के लिए उपलब्ध होने के बावजूद कोरोना जैसी महामारी को पूरी तरह काबू करने की दिशा में कई चुनौतियां अभी बाकी हैं.

महामारी विशेषज्ञ एंड्रे रिबास कहते हैं, "अगर वैश्विक नज़रिए से देखें तो अभी ऐसे कई देश हैं जो इम्यूनाइज़ेशन से काफ़ी पीछे हैं."

हैती जैसे देश में सिर्फ़ 2 फ़ीसदी आबादी को ही वैक्सीन की शुरुआती डोज़ मिल सकी है. इसके अलावा अल्जीरिया में 15 फ़ीसदी, माली में 12 फ़ीसदी, कांगो में 4 फ़ीसदी और यमन में सिर्फ़ 2 फ़ीसदी लोगों को ही वैक्सीन की डोज़ लगी है.

डॉक्टर इसाबेल इस पर चिंता ज़ाहिर करते हुए कहती हैं, "ये चिंताजनक बात इसलिए है क्योंकि ज़्यादा लोगों के बीच संक्रमण फैलने की वजह से वायरस के ज़्यादा घातक वैरियंट पैदा होने का ख़तरा बढ़ जाता है."

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