कोरोना वायरस: वो बच्चे जो लिखना-पढ़ना भूल गए हैं, क्या होगा जब ये बच्चे स्कूल लौटेंगे?
राधिका कुमारी अपनी चॉक इतना कस के पकड़ती है कि मानो उसकी उंगलियों के ज़ोर से सारे अक्षर दिमाग़ से निकलकर फ़टाफ़ट काली तख़्ती पर आ जाएंगे.
पर वो धीरे-धीरे निकलते हैं और वो उनमें से कई की ठीक पहचान नहीं कर पाती.
राधिका हिंदी की वर्णमाला लिखने की कोशिश कर रही है. ये किसी दस साल के बच्चे के लिए मुश्किल नहीं होना चाहिए. पर उसके लिए है क्योंकि 17 महीने से वो पढ़ाई नहीं कर पाई है. ना ऑनलाइन, ना ऑफ़लाइन.
पूरे देश की तरह पिछले मार्च से जब कोविड की रोकथाम के लिए पहला लॉकडाउन लगा, उसके गांव का प्राइमरी स्कूल भी बंद है.
बड़े प्राइवेट स्कूल और उनमें जानेवाले बच्चे तो जल्दी ही ऑनलाइन पढ़ाई करने लगे पर कई सरकारी स्कूलों को दिक्क़त आई. बिना लैपटॉप, स्मार्टफ़ोन और इंटरनेट के उनके छात्र पिछड़ गए.
जैसे झारखंड के लातेहार ज़िले के दलित-आदिवासी गांव डुम्बी में रहनेवाली राधिका. पढ़ाई की ये खाई उसके गांव में बहुत गहरी दिखती है. डुम्बी गांव में इंटरनेट नहीं है.
केंद्र सरकार ने दूरदर्शन चैनल के माध्यम से और राज्य सरकारों ने अपने स्तर पर शिक्षा के कार्यक्रम प्रसारित करने शुरू किए हैं, लेकिन इस गांव के ज़्यादातर घरों में टेलीविज़न ही नहीं है.
अब जब कुछ राज्यों में स्कूल खुलने शुरू हुए हैं, अर्थशास्त्री ज़्यां ड्रेज़ ने राधिका के गांव के 36 बच्चों से मुलाक़ात कर उनके जैसे वंचित समुदायों में महामारी के दौरान आई शिक्षा की कमी के असर को समझने की कोशिश की.
सर्वे में बच्चों को पढ़ाई के लिए स्कूल से मिलनेवाली मदद, टीचर का घर आकर बच्चे को मिलना, ऑनलाइन क्लास, निजी स्तर पर की जा रही ट्यूशन और मां-बाप की साक्षरता दर इत्यादि की जानकारी इकट्ठा की गई.
ड्रेज़ ने कहा, "ये बहुत चौंकाने वाला था कि प्राइमरी स्कूल जानेवाले 36 बच्चों में से 30 एक शब्द तक पढ़ या लिख नहीं पाए."
ड्रेज़ के मुताबिक़, सर्वे में पाया गया कि ज़्यादातर प्राइमरी स्कूल के बच्चे पढ़ने-लिखने में पिछड़ गए हैं और पिछले डेढ़ साल में उन्हें पढ़ाई के लिए ना के बराबर मदद मिली थी.
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पढ़े नहीं पर पास हो गए
राधिका कहती है, "स्कूल में हिंदी और अंग्रेज़ी मेरे पसंदीदा विषय थे." पर राधिका को दोनों भाषाओं में ही अब कुछ ख़ास याद नहीं है.
वो अपने स्थानीय सरकारी प्राइमरी स्कूल में दूसरी क्लास की पढ़ाई पूरी कर रही थी जब कोविड महामारी फैलने लगी.
अब उसे आगे चौथी क्लास में बढ़ा दिया गया है जबकि पिछले डेढ़ साल में उसके पास पढ़ाई जारी रखने के कोई साधन नहीं थे.
भारत के शिक्षा के अधिकार क़ानून के तहत पांचवीं क्लास तक स्कूल किसी छात्र को फ़ेल नहीं कर सकते. इसका मक़सद बच्चों को सीखने का अच्छा माहौल देना और उन पर नंबर लाने का दबाव कम करना है.
लेकिन स्कूलों ने इस नियम का पालन महामारी के दौरान भी किया जबकि कई बच्चे इस वक्त में पढ़ाई से बिल्कुल महरूम रहे.
राधिका की पड़ोसन, सात साल की विनीता कुमारी का भी यही हाल है. वो पढ़-लिख नहीं पाती तो उसके पिता मदन सिंह नाराज़ होते हैं. लेकिन एक साल से बिना किसी टीचर की मदद के उसके लिए ये ख़ुद कर पाना बहुत मुश्किल है.
विनीता की नई किताबों को दिखाते हुए मदन सिंह कहते हैं कि उनके पास उसे पढ़ाने का वक्त नहीं क्योंकि उन्हें रोज़ी-रोटी कमाने के लिए घर से बाहर जाना होता है.
इस आदिवासी गांव में ज़्यादातर मां-बाप अशिक्षित हैं और पढ़ाई में अपने छोटे बच्चों की मदद नहीं कर पाते, यानी बच्चों का स्कूल बंद तो सीखना भी पूरी तरह से बंद.
छोटे बच्चों को चाहिए मदद
ज़्यां ड्रेज़ के मुताबिक़, इन सबसे छोटे बच्चों के स्कूल छोड़ने तक की नौबत आ सकती है.
वो कहते हैं, "बड़ी क्लास में पहुंचने तक आप पढ़ना-लिखना सीख चुके होते हैं, आप थोड़ा पिछड़ भी जाएं तो आगे बढ़ना जारी रख सकते हैं. ख़ुद को और शिक्षित बना सकते हैं. लेकिन अगर आपने मूल पढ़ाई ही नहीं की है और आप पीछे छूट गए हैं, पर आपको आगे की क्लास में बढ़ा दिया गया है तो आप बहुत पिछड़ जाएंगे. ये स्कूल ही छोड़ देने के हालात पैदा कर सकता है."
ड्रेज़ अब कुछ और अर्थशास्त्रियों की मदद के साथ नौ राज्यों - असम, महाराष्ट्र, ओडिशा, दिल्ली, पंजाब, उत्तर प्रदेश, झारखंड, बिहार और मध्य प्रदेश - में 1,500 बच्चों का सर्वे कर रहे हैं.
उनके वॉलन्टियर घर-घर जाकर पांच से 14 साल की उम्र तक के बच्चों से बात कर उनकी साक्षरता दर आंकेंगे ताकि 2011 की जनगणना की दर से उसकी तुलना की जा सके.
लड़कों के लिए ट्यूशन
महामारी ने शिक्षा के लिए लड़के और लड़कियों को मिलने वाली मदद के अंतर को भी और गहरा कर दिया है.
कुछ परिवार ट्यूशन का ख़र्च उठा सकते हैं, लेकिन इनमें से ज़्यादातर ऐसा सिर्फ़ बेटों के लिए करते हैं.
राधिका का भाई विष्णु उससे एक साल छोटा है पर ट्यूशन की मदद से पढ़ने-लिखने और समझने में अपनी बहन से कहीं आगे.
राधिका की पांच बड़ी बहनें भी स्कूल जाती हैं पर पिछले साल उनमें से किसी ने भी कोई क्लास नहीं की - ऑनलाइन, ऑफ़लाइन या ट्यूशन.
बच्चों की मां कुंती देवी कहती हैं, "विष्णु की ट्यूशन पर हर महीने 250 रुपया लगता है, अब उसकी छह बहनों को पढ़ाने के लिए इतना पैसा कहां से लाएं."
ये सिर्फ़ राधिका के गांव की बात नहीं. कई परिवार लड़कों को बुढ़ापे का सहारा मानते हुए उन पर ख़र्च करना पसंद करते हैं, जबकि माना जाता है कि बेटियां शादी के बाद दूसरे घर चली जाएंगी.
शोध बताते हैं कि कम साधन वाले परिवारों में ज़्यादातर मां-बाप अपनी बेटियों को मुफ़्त शिक्षा देने वाले सरकारी स्कूल में दाख़िला दिलवाते हैं ताकि बेटों को प्राइवेट स्कूल भेज सकें.
छोटी बच्चियों पर असर
समयुक्ता सुब्रमणियन बाल शिक्षा के क्षेत्र में भारत की सबसे बड़ी गैर-सरकारी संस्था, 'प्रथम' में छोटे बच्चों के प्रोजेक्ट्स पर काम करती हैं.
वो कहती हैं, "अनजाने में ही राधिका जैसी लड़कियां ये विश्वास करने लगेंगी कि कुछ चीज़ें ऐसी हैं जो उसे चाहिए पर उसके छोटे भाई को ही मिलेंगी. ये उसके मन में घर कर जाएगा, उसके अत्म विश्वास पर असर पड़ेगा, वो ख़ुद को कम समझने लग सकती है."
अक्तूबर 2020 में प्रथम ने अपनी सालाना 'ऐनुअल स्टेट ऑफ़ एजुकेशन रिपोर्ट' (असर) के लिए एक सप्ताह के दौरान फ़ोन से देशव्यापी सर्वे किया. उन्होंने पाया कि उस अवधि में दो-तिहाई बच्चों को पढ़ाई-लिखाई के लिए किसी तरह की सामग्री या क्लास करने को नहीं मिली.
समयुक्ता सुब्रमणियन के मुताबिक़ स्कूल खुलने के बाद, टीचर्स को बच्चों के साथ खेल के बहाने सामूहिक ऐक्टिविटीज़ करनी चाहिए ताकि उन पर बहुत दबाव डाले बग़ैर उनकी शिक्षा के स्तर का अंदाज़ा लगाया जा सके.
उन्होंने कहा, "क्लासरूम में होने वाली पढ़ाई को हर बच्चे की सीखने की क्षमता के मुताबिक करना होगा, वर्ना बहुत से बच्चे जो पिछड़ गए हैं, वो बाकि बच्चों से क़दम नहीं मिला पाएंगे."
स्कूल लौटने के ज़िक्र भर से राधिका मुस्कुराने लगती हैं.
वो कहती हैं उसने स्कूल में खेलना और पढ़ाई, दोनों को बहुत याद किया है.
राधिका ने कहा, "मैं वो ताले वाला दरवाज़ा खोलकर अपनी बेंच पर बैठना चाहती हूं."
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