कहीं आप भी कोरोना के ‘फॉल्स निगेटिव’ मरीज तो नहीं? जानें कैसे करेंगे पहचान

Not only in the country, many other cases have also been reported in other countries in which the patient was infected, but in the initial investigation, he could not confirm his corona due to negative reports.कहीं आप भी कोरोना के ‘फॉल्स निगेटिव’मरीज तो नहीं? जानें कैसे करेंगे पहचान

बेंगलुरु। भारत में कोरोना वायरस से अब तक 5 हजार 734 लोग संक्रमित हो चुके है और इस संक्रमण की चपेट में आए 473 लोगों की मौत हो चुकी हैं। ऐसा तब हो रहा हैं जब पूरे देश में 21 दिनों का लॉकडाउन जारी हैं। अभी तक आप ये ही समझ रहे होगे कि कोरोना टेस्‍ट अगर निगेटिव आई तो डरने की कोई बात नही है लेकिन ऐसा बिलकल नही हैं। कोरोना टेस्‍ट की रिपोर्ट अगर निगेटिव आ जाए इसका मतलब ये नहीं की आप इस कोरोना से सुरक्षित हैं।

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बता दें देश में ही नहीं अन्‍य देशों में भी ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं जिसमें रोगी संक्रमित तो था लेकिन शुरुआती जांच में उसकी रिपोर्ट निगेटिव आने के कारण उसे कोरोना होने की पुष्टि नहीं हो सकी। ऐसे कई मरीज थे जिन्हें खांसी, सांस में तकलीफ और तेज बुखार जैसे कोरोना कोविड-19 के लक्षणों थे और वो उससे परेशान थे। उनके लक्षणों के आधार पर जब कोविड 19 की जांच की गई तो उनकी रिपोर्ट निगेटिव आई लेकिन बाद में कोरोना पॉजिटिव पाए गए।

थोड़े समय बाद रिपोर्ट आई तो

थोड़े समय बाद रिपोर्ट आई तो

बता दें ऐसे मामले जिनमें रिपोर्ट निगेटिव आई उन पेसेन्‍ट को चिकित्सकों ने घर में रहने की सलाह देकर कोरोना के लक्षण और बढ़ने पर दोबारा आने की सलाह दी गई। वहीं कुछ दिन बाद उनकी हालत जब कंट्रोल से बाहर हुई तब वो डाक्टर के पास पहुंचे। उनकी दोबारा जांच करवाने के लिए सैंपल लिया गया और जब थोड़े समय बाद रिपोर्ट आई तो वह भी निगेटिव निकली। जबकि उनके सारी सिमटम कोरोना पॉजिटिव मरीज के जैसे थे।

फॉल्स निगेटिव' आने का ये होता है कारण

फॉल्स निगेटिव' आने का ये होता है कारण

डाक्टरों के अनुसार इसका पहला कारण सैंपल लेते वक्त नाक के बहुत भीतर से नासिक स्राव लेना होता है। इसके लिए स्वॉब को नाक में कई देर घुमाना भी होता है। कमजोर तकनीक भी ‘फॉल्स निगेटिव' का कारण हो सकती है। दरअसल, ऐसे मामले जो पहले निगेटिव थे फिर पॉजिटिव पाए गए या संक्रमित थे लेकिन उनकी जांच रिपोर्ट निगेटिव आई उन्हें फॉल्स निगेटिव कहा जाता है।

विशेषज्ञ मानते है ये वजह

विशेषज्ञ मानते है ये वजह

विशेषज्ञ का कहना हैं कि वर्तमान सयम में प्रचलित कोरोना टेस्‍ट प्रणाली से संभव है कि संक्रमण पकड़ में न आए। अभी पॉलीमेरेज चेन रिएक्शन यानी आरटी-पीसीआर से जांच हो रही है। इसके जरिए संक्रमण की शुरुआत में सांस में मौजूद वायरस कणों को पकड़ा जाता है। अमेरिकी संस्था सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (सीडीसी) का कहना है कि कई दफा जब कोई निगेटिव पाया जाता है तो इसका मतलब ये हो सकता है कि सैंपल लेते वक्त संक्रमण शुरू नहीं हुआ हो।

30 फीसदी तक आरई फॉल्स निगेटिव

30 फीसदी तक आरई फॉल्स निगेटिव

डाक्टर का कहना है कि अगर आपकी जब कोविड 19 जांच बता देगी कि आप संक्रमित नहीं हैं लेकिन कोरोना बीमारी के लक्षण मौजूद हो सकते हैं। हालांकि दुनिया भर में कई ऐसे मामले आए लेकिन ऐसा कोई डाटा नहीं एकत्र किया गया हैं। दुर्भाग्यवश ऐसे लोगों का कोई डाटा भी नहीं जुटाया जा रहा है। चीन के विशेषज्ञों का कहना है कि कोरोना संक्रमितों में 30 फीसदी फॉल्स निगेटिव भी हो सकते हैं। यही अंदेशा अन्‍य देशों के चिकित्‍सकों ने भी जताया है कि फॉल्स निगेटिव की तादाद ज्यादा भी हो सकती है।

अगर ऐसा हो तो क्या करें

अगर ऐसा हो तो क्या करें

विशेषज्ञ बताते हैं कि किसी भी जांच रिपोर्ट का अन्य साक्ष्यों से भी मिलान करना चाहिए। केवल एक जांच रिपोर्ट को सही मान लेना खतरे में डाल सकता है। अन्य डॉक्टरों से भी परामर्श कर जांच परिणामों की अपने लक्षणों से तुलना करानी चाहिए। यह मानकर चलें कि हम में से कोई भी संक्रमित हो सकता है, भले ही जांच रिपोर्ट निगेटिव आए।

वैज्ञानिकों की हैं ये राय

वैज्ञानिकों की हैं ये राय

वैज्ञानिकों के अनुसार वायरस को जड़ से खत्म करने के लिए आइसोलेशन के साथ बड़े पैमाने पर जांच की जरूरत है जिससे वायरस को पकड़ा जा सके जो लोगों में तो है लेकिन उनको इसका अहसास नहीं होता है। कोरोना पर शोध कर रहे शोधकर्ताओं का कहना है कि जब तक पहले संक्रमित की पहचान होती है तब तक दूसरा व्यक्ति उससे संक्रमित हो चुका होता है। वुहान के मरीजों पर हुए अध्ययन में पता चला है कि अधिकतर ऐसे लोगों से संक्रमित हुए जो पूरी तरह स्वस्थ दिख रहे थे लेकिन संक्रमित थे।

चीन में 80 प्रतिशत संक्रमितों को कोई लक्षण महसूस नहीं हुआ

चीन में 80 प्रतिशत संक्रमितों को कोई लक्षण महसूस नहीं हुआ

कोरोना की चपेट में 80 फीसदी लोग उन लोगों की वजह से आते हैं जिन्हें खुद में वायरस के होने का लक्षण पता ही नहीं होता। शंघाई स्थित जियाओ टॉन्ग स्कूल ऑफ मेडिसिन के शोध में वैज्ञानिकों को ये भी पता चला है कि औसतन 3.8 दिन में एक व्यक्ति दूसरे को संक्रमित करता है।

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