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कोरोना वायरस: लॉकडाउन से डर के साये में जीता आम आदमी

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क्या पिछले कुछ दिनों में आपके घर के राशन-पानी का ख़र्च बढ़ा है?

क्या आपके भी फ्रिज में इन दिनों सामान के ऊपर सामान रखा दिखता है?

क्या आपके किचन में भी आटा-दाल-चावल रखने की जगह पहले से दोगुनी भरी हुई है?

क्या आपको भी इस बात की चिंता सता रही है कि कोरोना संकट ख़त्म होने के बाद नौकरियों या आमदनी पर कोई असर तो नहीं पड़ेगा?

अगर हाँ, तो मेरे दिल का दर्द भी पढ़ ही लीजिए.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस दिन 'जनता कर्फ़्यू' की घोषणा की थी, मेरे दिमाग़ में ख़तरे की घंटी बजी थी. पीएम का संबोधन ख़त्म होने के पहले लैपटॉप खुल चुका था, 10-10 किलो आटे-चावल के पैक ऑर्डर हो रहे थे.

लेकिन दाल ऑर्डर करने के सेक्शन में जाते ही मेरे ओवर-कॉन्फ़िडेंस के परचखच्चे उड़ गए. अरहर और मसूर के सामने 'स्टॉक ख़त्म' लिखा हुआ था. कुछ यही हाल चिप्स, दो तरह के बिस्कुटों और कपड़े धोने वाले पाउडर के खानों में दिखा.

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पिछले कई सालों में ऐसा पहली बार हुआ था. यक़ीनन तमाम लोग आगे आने वाले वक़्त को मुझसे पहले भाँप चुके थे. "चलो, अभी तो एक ही दिन का (14 घंटे) जनता कर्फ़्यू है और वो भी एक दिन बाद", कहते हुए मैंने बीवी को दिलासा दी. अगले दिन अनाज वग़ैरह ख़रीद कर रख भी दिया.

जनता कर्फ़्यू पूरा हुआ और अगला दिन, यानी 23 मार्च, कोरोना वायरस के बढ़ते क़दमों को टटोलने में बीता. अगली शाम को पीएम ने 21 दिन के लॉकडाउन की घोषणा कर दी. घर पर थे तो तुरंत सब्ज़ी वग़ैरह लाकर फ्रिज में रखने की क़वायद पर निकल गए.

चार घंटे बाद यानी रात 12 बजे लॉकडाउन शुरू होना था. भिंडी के दाम 20 रुपए प्रति किलो बढ़े हुए थे, प्याज़ 40 रुपए किलो से बढ़कर 60 हो चुका था, जो सेब पिछले दिन 110 रुपए किलो मारा-मारा फिर रहा था, वो उस रात 160 का मिला.

दूध तो उस शाम पानी की तरह बिका. मेरे हाथ में आया सिर्फ़ डेढ़ लीटर तो क़दम सुपरस्टोर की तरफ़ बढ़े, जहाँ से दूध का टेट्रापैक (ये छह महीने तक चल जाता है) और पाउडरमिल्क ख़रीद कर रख लिए जाए. वरना बच्चों को जवाब क्या देंगे!

दिल्ली से सटे नोएडा के मेरे सेक्टर के बाशिंदों ने यहाँ भी मेरी 'दूरदर्शिता' को धो डाला. डेयरी उत्पाद के नाम पर सिर्फ़ दही के दो और पनीर का एक पैकेट मिला. सभी एटीएम मशीनों के आगे लम्बी क़तारें दिखीं. ज़ाहिर है लोगों के ज़ेहन में नोटबंदी के शुरुआती दिनों की यादें अभी ताज़ा हैं.

ज़माने बाद पैनिक बाइंग या सामान ख़त्म होने के डर से ढेर सारा और तुरंत ख़रीद डालने वाले मंज़र को देखा. स्कूल के दिनों में अगर कभी कर्फ़्यू लगता था तब दो-चार दिन यही आलम रहता था. लॉकडाउन की शुरुआत भी हो गई.

इस बीच केंद्र सरकार, राज्य सरकार और ज़िला प्रशासन की ओर से लगातार संदेश आते रहे कि अनाज-सब्ज़ियाँ-दूध-ब्रेड वग़ैरह की सप्लाई में कोई कमी नहीं आएगी. उधर दूसरी तरफ़ सब्ज़ियों के दाम कम होने के बजाय बढ़ ही गए हैं. चिकन और माँस-मछली के शौकीन तो और परेशान दिख रहे हैं, या तो उनका मनचाहा सामान मिल नहीं रहा, या फिर बहुत महंगा हो गया है.

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जब लॉकडाउन की शुरुआत हुई थी तब 30 अंडों की एक ट्रे 130 की मिल रही थी, इसी शुक्रवार सुबह मैंने मन मार कर उसी दुकान से वैसे ही सफ़ेद अंडों वाली ट्रे 210 में ख़रीदी है. क्या पता अंडे भी एक ही मुर्ग़ी के रहे हों.

भिंडी अब 110-120 रुपए किलो बिक रही है, हँसी-मज़ाक़ करते हुए, काला नमक छिड़कर खाने वाली ग़रीब ककड़ी का दाम है 80 रुपए किलो! अगर आप किराने/राशन की दुकान में जाइए तो अव्वल तो सभी सामान मिलते नहीं लेकिन जो मिलते हैं वे भी हम ज़्यादा से ज़्यादा ख़रीद रहे हैं.

ब्रेड और दूध-दही तो रोज़ ही आता था. अब दोगुना आ रहा है क्योंकि डर है बाज़ार में ख़त्म न हो जाए. सप्लाई जो बाधित होती रहती है जब तब. दुकान में चिप्स और बिस्कुट वाली शेल्फ़ भरी देख कर मन को वैसी तसल्ली मिलती है जैसी ब्लडप्रेशर नापने वाली मशीन में 120/80 की रीडिंग देख कर. यहाँ भी ज़रूरत से ज़्यादा ख़रीद डालते हैं.

दवाइयाँ तो समझिए एक नहीं, अगले दो महीने की ख़रीद डालीं हैं. अगर दुकान वाले ने देने से मना न किया होता तो शायद तीन महीने की ख़रीद डालते. लॉकडाउन बढ़ने से जुड़े असमंजस में धीरे-धीरे कर के आटा-चावल भी इतना ख़रीद लिया है कि अब डर है कि हमसे पहले कहीं चूहे या घुन न खा डालें.

जब राशन की दुकानों में बर्तन धोने वाली बट्टी तीन दिन तक नहीं मिली तो टेंशन में कपड़े धोने वाला पाउडर भी ज़रूरत से ज़्यादा ख़रीद डाला. इस सब के बीच, लॉकडाउन के एक हफ़्ते बाद जब डेबिट कार्ड वाले मैसेज पर बची रक़म देखी तो अगले तीन दिन तक सिर्फ़ ज़रूरत भर का दूध ही ख़रीदा.

लेकिन तीन दिन बाद फिर वही बेचैनी कि कुछ ख़त्म न हो जाए, क्या पता कोरोना से निपटने वाला लॉकडाउन कितने दिन चलेगा.

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दाम बढ़ने या ज़्यादा ख़र्च करने की वजह

सोचा कुछ जानकारों से ही बात करके समझता हूँ कि ऐसा हो क्यों रहा है, या सिर्फ़ मेरे ही साथ हो रहा है क्या?

जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में अर्थशास्त्र के पूर्व प्रोफ़ेसर एके ख़ान के मुताबिक़, "पैनिक बाइंग एक ऐसा दौर होता है जो सबकी ज़िंदगी में कभी न कभी आता है. जैसे बच्चे छोटे होने पर माँ-बाप को दूध और डायपर जुटाकर रखने की बेचैनी बनी रहती है, कर्फ़्यू जैसी स्थिति में ऐसा अधिकांश लोगों के साथ होता है क्योंकि एक अनदेखी सी बंदिश रहती है. यही वजह है ख़र्च बढ़ने की. इसकी मात्रा और बढ़ेगी जब मुश्किल हालात लम्बे खिंचेंगे".

ज़ाहिर है, देशव्यापी लॉकडाउन की वाजिब वजह कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप से बचना रही है और अभी लॉकडाउन को दो हफ़्ते हुए हैं. यह सोचने वाली बात है कि जहाँ से कोरोना शुरू हुआ था वहाँ का लॉकडाउन 11 हफ़्ते बाद हटा है.

लेकिन पिछले एक महीने के दौरान, अनाज के अलावा, सब्ज़ियों के दाम लगभग दोगुने बढ़ चुके हैं. प्रमुख वजह यही है कि पूरे देश में ट्रकों के ट्रांसपोर्ट की लागत भी बढ़ी है और माल को राज्यों की सीमाओं से पार कराने की समय सीमा भी. दूसरी वजह है लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग के बीच सब्ज़ी चुनने, उसकी ढुलाई और दूर इलाक़ों में पहुँचाने में मुश्किल आ रही है. काम करने वाले मज़दूरों के चले जाने की वजह से पैकिंग वगैरह मुश्किल और महंगी हो गई है.

सब्ज़ियों के अलावा तमाम उपभोक्ता वस्तुएँ जैसे बिस्कुट या नमकीन वग़ैरह भी धीरे-धीरे दुकानों में कम लेकिन थोड़े महँगे दिखे हैं क्योंकि इनका उत्पादन फ़िलहाल ठप है. ज़ाहिर है, उपभोक्ता को जो भी चीज़ थोड़ी ज़्यादा दिखती है वो इस कठिन परिस्थिति में उसे स्टॉक या होर्ड कर के रख लेता है.

हालाँकि कुछ जानकारों के अनुसार लॉकडाउन के इस दौर में सिर्फ़ घरेलू ख़र्च ही बढ़ा है, दूसरे ख़र्चों में बचत भी हो रही है, मिसाल के तौर पर लोग घरों में बंद हैं तो गाड़ियों में पेट्रोल या डीज़ल नहीं डलवाना पड़ रहा है.

बैंकबाज़ार.कॉम के सीईओ और पर्सनल फ़ाइनेंस एक्सपर्ट आदिल शेट्टी बताते हैं, "लॉकडाउन के दौरान दरअसल ख़र्चों में गिरावट आई है क्योंकि शॉपिंग, बाहर खाने या सिनेमा देखने या फिर पब्लिक ट्रांसपोर्ट या काम पर जाने पर होने वाला ख़र्च पूरी तरह बंद है. ट्रैवल पाबंदी की वजह से न लोग सफ़र कर रहे हैं और न ही छुट्टियाँ मनाने निकल रहे हैं".

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