Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

कोविड-19: कोरोना वायरस के कारण बढ़ सकते हैं डायबिटीज़ के मामले

कोरोना वायरस
Reuters
कोरोना वायरस

बात बीते साल सितंबर के महीने की है. कोविड-19 के गंभीर संक्रमण से जूझ रहे विपुल शाह मुंबई के एक अस्पताल में 11 दिनों तक भर्ती थे. 47 साल के विपुल को पहले से डायबिटीज़ की शिकायत नहीं थी इसलिए डॉक्टरों ने कोरोना संक्रमण के इलाज के लिए उन्हें स्टेरॉयड दिए.

कोरोनावायरस के संक्रमण के कारण फेफड़ों में सूजन आ जाती है जिसे कम करने के लिए डॉक्टर स्टेरॉयड का इस्तेमाल करते हैं. इसके ज़रिए व्यक्ति को कुछ हद तक शरीर में वायरस से लड़ रही रोग प्रतिरोधक शक्ति को होने वाले नुक़सान से भी बचाया जा सकता है.

लेकिन स्टेरॉयड का इस्तेमाल शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति को कम करता है. डायबिटीज़-ग्रस्त लोगों के अलावा आम कोविड-19 मरीज़ों के ख़ून में ये शुगर की मात्रा बढ़ा सकता है.

कोरोना संक्रमण से ठीक हुए विपुल को अब एक साल का वक्त हो चुका है, लेकिन वो अभी भी अपने ब्लड शुगर को नियंत्रित करने की दवाई ले रहे हैं.

पेशे से स्टॉक ट्रेडर विपुल शाह कहते हैं, "मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूं जो मेरी तरह कोविड-19 से ठीक होने के बाद डायबिटीज़ को कंट्रोल करने के लिए दवाई ले रहे हैं."

डायबिटीज़
Getty Images
डायबिटीज़

भारत में डायबिटीज़

डायबिटीज़ से जूझ रहे दुनिया के हर छह लोगों में से एक भारत में है. एक अनुमान के अनुसार भारत में 7.7 करोड़ डायबिटीज़ के मरीज़ हैं और इस मामले में भारत चीन के बाद दूसरे नंबर पर है. चीन में 11.6 करोड़ लोग इस बीमारी का शिकार हैं.

डॉक्टरों को कहना है कि ऐसे हज़ारों लोग हो सकते हैं जिनमें इस बीमारी की अब तक पता नहीं चल पाया है.

किसी व्यक्ति को डायबिटीज़ तब होता जब शरीर का अग्न्याशय यानी पैन्क्रियाज़ ख़ून में मौजूद ग्लूकोज़ (शुगर) को ख़त्म करने के लिए ज़रूरी मात्रा में इन्सुलिन नहीं बना पाता या फिर शरीर सही तरीके से इन्सुलिन का इस्तेमाल नहीं कर पाता. इस कारण ख़ून में ग्लूकोज़ की मात्रा बढ़ती जाती है जिसके कारण गंभीर ख़तरा पैदा हो जाता है. इसके कारण किडनी, आंखों या फिर दिल को नुक़सान पहुंच सकता है.

डायबिटीज़ उन बीमारियों में से एक है जिसके कारण कोरोना वायरस संक्रमित मरीज़ों में कोविड-19 गंभीर रूप अख्तियार कर सकता है. इसके अलावा मोटापा, हाई ब्लड प्रेशर और दिन और फेफड़ों की बीमारी के भी कोविड-19 के गंभीर होने का ख़तरा हो सकता है.

अब डाक्टरों को ये डर सता रहा है कि बड़ी संख्या में कोविड-19 से ठीक हुए मरीज़ों में एक नए तरह के डायबिटीज़ का ख़तरा बढ़ सकता है.

कोरोना वायरस
AFP
कोरोना वायरस

कोरोना और डायबिटीज़

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार भारत में अब तक 3.2 करोड़ लोग कोरोना वायरस की चपेट में आ चुके हैं और कुल संक्रमितों के मामले में अमरीका के बाद भारत दूसरे नंबर पर है.

मुंबई में मौजूद डायबिटोलॉजिस्ट डॉक्टर राहुल बक्शी कहते हैं, "चिंता ये है कि कोरोना महामारी के ख़त्म होने के बाद कोविड-19 के कारण देश में डायबिटीज़ के मरीज़ों की सुनामी आ सकती है."

वो कहते हैं कि उनके पास आने वाले कोविड-19 मरीज़ों में से आठ से दस फीसदी को पहले डायबिटीज़ की शिकायत नहीं थी, लेकिन संक्रमण से ठीक होने के महीनों बाद भी उन्हें अपना ब्लड शुगर नियंत्रित करने के लिए दवाई लेनी पड़ रही है.

वो कहते हैं, "कुछ मरीज़ों में डायबिटीज़ अभी शुरूआती स्तर पर है. लेकिन कुछ लोगों को एक साल के बाद दवा लेने की ज़रूरत पड़ रही है."

दुनिया भर के डॉक्टर फिलहाल इस बात पर चर्चा कर रहे हैं कि क्या कोविड-19 के करण उन लोगों में डायबिटीज़ के मामले बढ़ रहे हैं जिन्हें पहले इसकी शिकायत नहीं थी.

जानकारों का मानना है कि इसकी बड़ी वजह कोविड-19 के इलाज में स्टेरॉयड का इस्तेमाल हो सकता है. एक तरफ वायरस से लड़ने के लिए शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति ज़रूरत से अधिक मात्रा में साइटोकाइन बनाती है और इस प्रक्रिया में थकने लगती है, तो दूसरी तरफ वायरस अग्न्याशय को प्रभावित करता है जो ब्लड शुगर को ख़त्म करने के लिए इन्सुलिन बनाती है.

ब्लड शुगर
AFP
ब्लड शुगर

ब्लैक फ़गस का कहर

हाल में म्यूकरमायकोसिस यानी "ब्लैक फंगस" के संक्रमण से ठीक हुए लोगों का इलाज कर रहे डॉक्टरों की एक पीर-रिव्यूड स्टडी प्रकाशित हुई है जो इस गंभीर विषय पर कुछ रोशनी डालती है.

भारत में अब तक ब्लैक फंगस यानी काली फफूंद के क़रीब 45 हज़़ार मामले दर्ज किए गए हैं. अधिकतर मामलों में ये फफूंद इंसान की नाक और आंख को प्रभावित करती है लेकिन कुछ मामलों में इसका संक्रमण मस्तिष्क तक फैल सकता है. इसका हमला अक्सर कोविड-19 से ठीक होने के 12 से 18 दिनों के बाद होता है.

इस स्टडी के अनुसार 127 में से तेरह यानी 10 फीसदी मरीज़ों में संक्रमण से पहले डायबिटीज़ नहीं था, लेकिन बाद में उन्हें डायबिटीज़ हो गया. ये जानना ज़रूरी है कि इनमें से सात मरीज़ों के इलाज में न तो स्टेरॉयड का इस्तेमाल किया गया था और न ही उन्हें ऑक्सीजन देने की ज़रूरत पड़ी थी.

शोध में शामिल एक शोधकर्ता और आंखों के सर्जन डॉक्टर अक्षय नायर कहते हैं, "लेकिन इन मरीज़ों में ब्लड शुगर की मात्रा अधिक दर्ज की गई थी. हम लोगों की चिंता इस कारण बढ़ रही है कि आने वाले सालों में डायबिटीज़ महामारी का रूप ले सकती है."

दिल्ली और चेन्नई के दो अस्पतालों में 555 मरीज़ों पर हुए एक और शोध में पाया गया है कि कोविड-19 के बाद जिन लोगों को डायबिटीज़ हुआ है उनमें ब्लड शुगर की मात्रा उन लोगों से अधिक थी जिन्हें पहले से ही डायबिटीज़ की शिकायत थी.

भारत में डायबिटीज़
AFP
भारत में डायबिटीज़

शोध जारी, क्या कहते हैं डॉक्टर?

डायबिटोलॉजिस्ट और शोध में शामिल डॉक्टर अनूप मिश्रा कहते हैं कि हालिया शोध में कोविड-19 और डायबीटिज़ के बीच नाता देखने को मिला है जो एक 'जटिल' तस्वीर पेश करता है.

जिन मरीज़ों में कोरोना संक्रमण के बाद डायबिटीज़ होने के मामले दर्ज किए गए हैं, उनमें इसकी पहचान के लिए कोविड-19 के इलाज के दौरान हीमोग्लोबिन ए1सी लेवल टेस्ट किया गया था जिसके ज़रिए तीन महीनों में शरीर में ब्लड शुगर की औसत मात्रा का पता लगाया जाता है.

ये भी संभव है कि इन मरीज़ों को पहले से ही डायबिटीज़ हो लेकिन पहले इसकी जांच नहीं की गई हो. या फिर इलाज के दौरान स्टेरॉयड के इस्तेमाल के कारण उन्हें डायबिटीज़ हुआ हो.

कुछ मरीज़ों के मामले में अस्पताल से छुट्टी के बाद उनके शरीर में ब्लड शुगर की मात्रा सामान्य होने लगी, लेकिन विपुल शाह के मामले में साल भर के बाद भी ऐसा नहीं हुआ.

डॉक्टर मिश्रा कहते हैं, "हमारा आकलन है कि ऐसे मरीज़ों में मोटापे की वजह से या फिर उनके परिवार में पहले से ही लोगों को डायबिटीज़ थी."

लेकिन मरीज़ों का एक समूह ऐसा भी है जिन्हें डायबिटीज़ इस कारण हुआ क्योंकि कोरोना वायरस ने उनके अग्नाशय को नुक़सान पहुंचाया. ऐसे मरीज़ों को टाइप वन (जिसमें शरीर इन्सुलिन नहीं बना पाता) और टाइप टू (जिसमें शरीर ज़रूरी मात्रा में इन्सुलिन नहीं बना पाता) डायबिटीज़ की शिकायत हो सकती है.

लंदन के इंपीरियल कॉलेज के प्रोफ़ेसर गाय रटर के अनुसार कोरोना वायरस का हमला अग्नाशय और इन्सुलिन बनाने वाले हिस्से पर होता है.

वो कहते हैं, "ऐसा लगता है कि ये वायरस शरीर के मुक़ाबले अग्नाशय में अलग तरह के रिसेप्टरों का इस्तेमाल करता है. साइटोकाइन स्टॉर्म के मुक़ाबले इन्सुलिन बनाने वाली कोशिकाओं पर इसका सीधा हमला होता है."

लेकिन अब तक ये स्पष्ट नहीं है कि कोविड-19 से ठीक हुए मरीज़ों में पाई गई डायबिटीज़ स्थायी है या नहीं.

प्रोफ़ेसर रटर कहते हैं, "मुझे संदेह है कि भारतीय नज़रिए से बड़ी समस्या ये है कि इतने अधिक लोगों को डायबिटीज़ होने के कारण यहां कोविड-19 से मृत्यु की संभावना उन देशों की तुलना में अधिक है, जहां वायरस का संक्रमण कम है."

डॉक्टरों का मानना है कि कोरोना महामारी ख़त्म होने पर देश में डायबीटिज़ के मरीज़ों की संख्या में इज़ाफा हो जाएगा.

कोरोनो माहामारी को फैलने से रोकने के लिए भारत में दो बार सख्त लॉकडाउन लगाया गया है और बड़ी संख्या में अभी भी लोग घरों में बंद हैं और घर से ही काम कर रहे हैं. ऐसे में लोग कम व्यायाम कर रहे हैं और कई लोग मानसिक तनाव और अवसाद से जूझ रहे हैं.

डॉक्टर मिश्रा कहते हैं, "मैं ऐसे लोगों में डायबिटीज़ के अधिक मामले देख रहा हूं, और मेरे लिए ये चिंता का विषय है."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+